महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना
संजय उवाच
युधिष्ठिरेणैवमुक्तः कौन्तेयः श्वेतवाहनः ।
असिं जग्राह संक्रुद्धो जिघांसुर्भर्तर्षभम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर श्वेतवाहन कुन्तीकुमार अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरको मार डालनेकी इच्छासे तलवार उठा ली ॥ १ ॥
तस्य कोपं समुद्वीक्ष्य चित्तज्ञः केशवस्तदा ।
उवाच किमिदं पार्थ गृहीतः खड्ग इत्युत ॥ २ ॥
उस समय उनका क्रोध देखकर सबके मनकी बात जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्णने पूछा—'पार्थ! यह क्या? तुमने तलवार कैसे उठा ली? ॥ २ ॥
न हि पश्यामि योद्धव्यं त्वया किञ्चिद् धनंजय ।
ते ग्रस्ता धार्तराष्ट्रा हि भीमसेनेन धीमता ॥ ३ ॥
'धनंजय! यहाँ तुम्हें किसीके साथ युद्ध करना हो, ऐसा तो नहीं दिखायी देता; क्योंकि धृतराष्ट्रके पुत्रोंको बुद्धिमान् भीमसेनने कालका ग्रास बना रखा है ॥ ३ ॥
अपयातोऽसि कौन्तेय राजा द्रष्टव्य इत्यपि ।
स राजा भवता दृष्टः कुशली च युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम तो यह सोचकर युद्धसे हट आये थे कि राजा युधिष्ठिरका दर्शन कर लूँ। सो तुमने राजाका दर्शन कर लिया। राजा युधिष्ठिर सब प्रकारसे सकुशल हैं ॥ ४ ॥
स दृष्ट्वा नृपशार्दूलं शार्दूलसमविक्रमम् ।
हर्षकाले च सम्प्राप्ते किमिदं मोहकारितम् ॥ ५ ॥
'सिंहके समान पराक्रमी नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको स्वस्थ देखकर जब तुम्हारे लिये हर्षका अवसर आया है, ऐसे समयमें यह मोहकारित कौन-सा कृत्य होने जा रहा है? ॥ ५ ॥
न तं पश्यामि कौन्तेय यस्ते वध्यो भविष्यति ।
प्रहर्तुमिच्छसे कस्मात् किं वा ते चित्तविभ्रमः ॥ ६ ॥
'कुन्तीनन्दन! मैं किसी ऐसे मनुष्यको भी यहाँ नहीं देखता, जो तुम्हारे द्वारा वध करनेके योग्य हो। फिर तुम प्रहार क्यों करना चाहते हो? तुम्हारे चित्तमें भ्रम तो नहीं हो गया
है? ॥ ६ ॥ कस्माद् भवान् महाखड्गं परिगृह्णाति सत्वरः । तत् त्वां पृच्छामि कौन्तेय किमिदं ते चिकीर्षितम् ॥ ७ ॥ परामृशसि यत् क्रुद्धः खड्गमद्भुतविक्रम । ‘पार्थ! तुम क्यों इतने उतावले होकर विशाल खड्ग हाथमें ले रहे हो। अद्भुत पराक्रमी वीर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, इस समय तुम्हें यह क्या करनेकी इच्छा हुई है, जिससे कुपित होकर तलवार उठा रहे हो?’ ॥ ७ १/२ ॥ एवमुक्तस्तु कृष्णेन प्रेक्षमाणो युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥ अर्जुनः प्राह गोविन्दं क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर अर्जुनने क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए सर्पके समान युधिष्ठिरकी ओर देखकर श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ८ १/२ ॥ अन्यस्मै देहि गाण्डीवमिति मां योऽभिचोदयेत् ॥ ९ ॥ छिन्द्यामहं तस्य शिर इत्युपांशुव्रतं मम । तदुक्तं मम चानेन राज्ञामितपराक्रम ॥ १० ॥ समक्षं तव गोविन्द न तत् क्षन्तुमिहोत्सहे । तस्मादेनं वधिष्यामि राजानं धर्मभीरुकम् ॥ ११ ॥ ‘जो मुझसे यह कह दे कि तुम अपना गाण्डीव धनुष दूसरेको दे दो, उसका मैं सिर काट लूँगा।’ मैंने मन-ही-मन यह प्रतिज्ञा कर रखी है। अनन्त पराक्रमी गोविन्द! आपके सामने ही इन महाराजने मुझसे वह बात कही है, अतः मैं इन्हें क्षमा नहीं कर सकता; इन धर्मभीरु नरेशका वध करूँगा ॥ ९—११ ॥ प्रतिज्ञां पालयिष्यामि हत्वैनं नरसत्तमम् । एतदर्थं मया खड्गो गृहीतो यदुनन्दन ॥ १२ ॥ ‘यदुनन्दन! इन नरश्रेष्ठका वध करके मैं अपनी प्रतिज्ञाका पालन करूँगा; इसीलिये मैंने यह खड्ग हाथमें लिया है ॥ १२ ॥ सोऽहं युधिष्ठिरं हत्वा सत्यस्यानृण्यतां गतः । विशोको विज्वरश्चापि भविष्यामि जनार्दन ॥ १३ ॥ ‘जनार्दन! मैं युधिष्ठिरका वध करके उस सच्ची प्रतिज्ञाके भारसे उऋण हो शोक और चिन्तासे मुक्त हो जाऊँगा ॥ १३ ॥ किं वा त्वं मन्यसे प्राप्तमस्मिन् काल उपस्थिते । त्वमस्य जगतस्तात वेत्थ सर्वं गतागतम् ॥ १४ ॥ तत् तथा प्रकरिष्यामि यथा मां वक्ष्यते भवान् । ‘तात! आप इस अवसरपर क्या करना उचित समझते हैं? आप ही इस जगत्के भूत और भविष्यको जानते हैं, अतः आप मुझे जैसी आज्ञा देंगे, वैसा ही करूँगा’ ॥ १४ १/२ ॥
संजय उवाच
धिग् धिगित्येव गोविन्दः पार्थमुक्त्वाब्रवीत् पुनः ॥ १५ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे ‘धिक्कार है! धिक्कार है!!’ ऐसा कहकर पुनः इस प्रकार बोले ॥ १५ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
इदानीं पार्थ जानामि न वृद्धाः सेवितास्त्वया ।
काले न पुरुषव्याघ्र संरम्भं यद् भवानगात् ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! इस समय मैं समझता हूँ कि तुमने वृद्ध पुरुषोंकी सेवा नहीं की है। पुरुषसिंह! इसीलिये तुम्हें बिना अवसरके ही क्रोध आ गया है ॥ १६ ॥
न हि धर्मविभागज्ञः कुर्यादेवं धनंजय ।
यथा त्वं पाण्डवाद्येह धर्मभीरुरपण्डितः ॥ १७ ॥
पाण्डुपुत्र धनंजय! जो धर्मके विभागको जाननेवाला है, वह कभी ऐसा नहीं कर सकता, जैसा कि यहाँ आज तुम करना चाहते हो। वास्तवमें तुम धर्मभीरु होनेके साथ ही बुद्धिहीन भी हो ॥ १७ ॥
अकार्याणां क्रियाणां च संयोगं यः करोति वै ।
कार्याणामक्रियाणां च स पार्थ पुरुषाधमः ॥ १८ ॥
पार्थ! जो करनेयोग्य होनेपर भी असाध्य हों तथा जो साध्य होनेपर भी निषिद्ध हों ऐसे कर्मोंसे जो सम्बन्ध जोड़ता है, वह पुरुषोंमें अधम माना गया है ॥ १८ ॥
अनुसृत्य तु ये धर्मं कथयेयुरुपस्थिताः ।
समासविस्तरविदां न तेषां वेत्सि निश्चयम् ॥ १९ ॥
जो स्वयं धर्मका अनुसरण एवं आचरण करके शिष्योंद्वारा उपासित होकर उन्हें धर्मका उपदेश देते हैं; धर्मके संक्षेप एवं विस्तारको जाननेवाले उन गुरुजनोंका इस विषयमें क्या निर्णय है, इसे तुम नहीं जानते ॥ १९ ॥
अनिश्चयज्ञो हि नरः कार्याकार्यविनिश्चये ।
अवशो मुह्यते पार्थ यथा त्वं मूढ एव तु ॥ २० ॥
पार्थ! उस निर्णयको न जाननेवाला मनुष्य कर्तव्य और अकर्तव्यके निश्चयमें तुम्हारे ही समान असमर्थ, विवेकशून्य एवं मोहित हो जाता है ॥ २० ॥
न हि कार्यमकार्यं वा सुखं ज्ञातुं कथंचन ।
श्रुतेन ज्ञायते सर्वं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥ २१ ॥
कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान किसी तरह भी अनायास ही नहीं हो जाता है। वह सब शास्त्रसे जाना जाता है और शास्त्रका तुम्हें पता ही नहीं है ॥ २१ ॥
अविज्ञानाद् भवान् यच्च धर्मं रक्षति धर्मवित् ।
प्राणिनां त्वं वधं पार्थ धार्मिको नावबुध्यसे ॥ २२ ॥
कुन्तीनन्दन! तुम अज्ञानवश अपनेको धर्मज्ञ मानकर जो धर्मकी रक्षा करने चले हो, उसमें प्राणिहिंसाका पाप है, यह बात तुम्हारे-जैसे धार्मिककी समझमें नहीं आती है ॥ २२ ॥
प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान् मतो मम ।
अनृतां वा वदेद् वाचं न तु हिंस्यात् कथंचन ॥ २३ ॥
तात! मेरे विचारसे प्राणियोंकी हिंसा न करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है। किसीकी प्राणरक्षाके लिये झूठ बोलना पड़े तो बोल दे, किंतु उसकी हिंसा किसी तरह न होने दे ॥ २३ ॥
स कथं भ्रातरं ज्येष्ठं राजानं धर्मकोविदम् ।
हन्याद् भवान् नरश्रेष्ठ प्राकृतोऽन्यः पुमानिव ॥ २४ ॥
नरश्रेष्ठ! तुम दूसरे गवाँर मनुष्यके समान अपने बड़े भाई धर्मज्ञ नरेशका वध कैसे करोगे? ॥ २४ ॥
अयुध्यमानस्य वधस्तथाशत्रोश्च मानद ।
पराङ्मुखस्य द्रवतः शरणं चापि गच्छतः ॥ २५ ॥
कृताञ्जलेः प्रपन्नस्य प्रमत्तस्य तथैव च ।
न वधः पूज्यते सद्भिस्तच्च सर्वं गुरौ तव ॥ २६ ॥
मानद! जो युद्ध न करता हो, शत्रुता न रखता हो, संग्रामसे विमुख होकर भागा जा रहा हो, शरणमें आता हो, हाथ जोड़कर आश्रयमें आ पड़ा हो तथा असावधान हो, ऐसे मनुष्यका वध करना श्रेष्ठ पुरुष अच्छा नहीं समझते हैं। तुम्हारे बड़े भाईमें उपर्युक्त सभी बातें हैं ॥ २५-२६ ॥
त्वया चैवं व्रतं पार्थ बालेनेव कृतं पुरा ।
तस्मादधर्मसंयुक्तं मौर्ख्यात् कर्म व्यवस्यसि ॥ २७ ॥
पार्थ! तुमने नासमझ बालकके समान पहले कोई प्रतिज्ञा कर ली थी, इसीलिये तुम मूर्खतावश अधर्मयुक्त कार्य करनेको तैयार हो गये हो ॥ २७ ॥
स गुरुं पार्थ कस्मात् त्वं हन्तुकामोऽभिधावसि ।
असम्प्रधार्य धर्माणां गतिं सूक्ष्मां दुरत्ययाम् ॥ २८ ॥
कुन्तीकुमार! बताओ तो तुम धर्मके सूक्ष्म एवं दुर्बोध स्वरूपका अच्छी तरह विचार किये बिना ही अपने ज्येष्ठ भ्राताका वध करनेके लिये कैसे दौड़ पड़े? ॥
इदं धर्मरहस्यं च तव वक्ष्यामि पाण्डव ।
यद् ब्रूयात् तव भीष्मो हि पाण्डवो वा युधिष्ठिरः ॥ २९ ॥
विदुरो वा तथा क्षत्ता कुन्ती वापि यशस्विनी ।
तत् ते वक्ष्यामि तत्त्वेन निबोधैतद् धनंजय ॥ ३० ॥
पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हें यह धर्मका रहस्य बता रहा हूँ। धनंजय! पितामह भीष्म, पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर, विदुरजी अथवा यशस्विनी कुन्तीदेवी—ये लोग तुम्हें धर्मके जिस तत्त्वका उपदेश कर सकते हैं, उसीको मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ। इसे ध्यान देकर सुनो॥ २९-३०॥
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।
तत्त्वेनैव सुदुर्ज्ञेयं पश्य सत्यमनुष्ठितम् ॥ ३१ ॥
सत्य बोलना उत्तम है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है; परंतु यह समझ लो कि सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए सत्यके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान अत्यन्त कठिन होता है॥ ३१॥
भवेत् सत्यमवक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेत् ॥ ३२ ॥
जहाँ मिथ्या बोलनेका परिणाम सत्य बोलनेके समान मंगलकारक हो अथवा जहाँ सत्य बोलनेका परिणाम असत्यभाषणके समान अनिष्टकारी हो, वहाँ सत्य नहीं बोलना चाहिये। वहाँ असत्य बोलना ही उचित होगा॥ ३२॥
विवाहकाले रतिसम्प्रयोगे
प्राणात्यये सर्वधनापहारे ।
विप्रस्य चार्थे ह्यनृतं वदेत
पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ ३३ ॥
विवाहकालमें, स्त्रीप्रसंगके समय, किसीके प्राणोंपर संकट आनेपर, सर्वस्वका अपहरण होते समय तथा ब्राह्मणकी भलाईके लिये आवश्यकता हो तो असत्य बोल दे; इन पाँच अवसरोंपर झूठ बोलनेसे पाप नहीं होता॥ ३३॥
सर्वस्वस्यापहारे तु वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
तत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेत् ॥ ३४ ॥
तादृशं पश्यते बालो यस्य सत्यमनुष्ठितम् ।
जब किसीका सर्वस्व छीना जा रहा हो तो उसे बचानेके लिये झूठ बोलना कर्तव्य है। वहाँ असत्य ही सत्य और सत्य ही असत्य हो जाता है। जो मूर्ख है, वही यथाकथंचित् व्यवहारमें लाये हुए एक-जैसे सत्यको सर्वत्र आवश्यक समझता है॥ ३४ १/२॥
भवेत् सत्यमवक्तव्यं न वक्तव्यमनुष्ठितम् ।
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ॥ ३५ ॥
केवल अनुष्ठानमें लाया गया असत्यरूप सत्य बोलनेयोग्य नहीं होता, अतः वैसा सत्य न बोले। पहले सत्य और असत्यका अच्छी तरह निर्णय करके जो परिणाममें सत्य हो उसका पालन करे। जो ऐसा करता है, वही धर्मका ज्ञाता है॥ ३५॥
किमाश्चर्यं कृतप्रज्ञः पुरुषोऽपि सुदारुणः ।
सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं बलाकोऽन्धवधादिव ॥ ३६ ॥ जिसकी बुद्धि शुद्ध (निष्काम) है, वह पुरुष यदि अत्यन्त कठोर होकर भी, जैसे अंधे पशुको मार देनेसे बलाक नामक व्याध पुण्यका भागी हुआ था, उसी प्रकार महान् पुण्य प्राप्त कर ले तो क्या आश्चर्य है? ॥
किमाश्चर्यं पुनर्मूढो धर्मकामो ह्यपण्डितः । सुमहत् प्राप्नुयात् पापमापगास्विव कौशिकः ॥ ३७ ॥ इसी तरह जो धर्मकी इच्छा तो रखता है, पर है मूर्ख और अज्ञानी, वह नदियोंके संगमपर बसे हुए कौशिक मुनिकी भाँति यदि अज्ञानपूर्वक धर्म करके भी महान् पापका भागी हो जाय तो क्या आश्चर्य है? ॥ ३७ ॥
अर्जुन उवाच
आचक्ष्व भगवन्नेतद् यथा विन्दाम्यहं तथा । बलाकस्यानुसम्बन्धं नदीनां कौशिकस्य च ॥ ३८ ॥ **अर्जुन बोले—**भगवन्! बलाक नामक व्याध और नदियोंके संगमपर रहनेवाले कौशिक मुनिकी कथा कहिये, जिससे मैं इस विषयको अच्छी तरह समझ सकूँ ॥
वासुदेव उवाच
पुरा व्याधोऽभवत् कश्चिद् बलाको नाम भारत । यात्रार्थं पुत्रदारस्य मृगान् हन्ति न कामतः ॥ ३९ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**भारत! प्राचीनकालमें बलाक नामसे प्रसिद्ध एक व्याध रहता था, जो अपनी स्त्री और पुत्रोंकी जीवनरक्षाके लिये ही हिंसक पशुओंको मारा करता था, कामनावश नहीं ॥ ३९ ॥
वृद्धौ च मातापितरौ बिभर्त्यन्यांश्च संश्रितान् । स्वधर्मनिरतो नित्यं सत्यवागनसूयकः ॥ ४० ॥ वह बूढ़े माता-पिता तथा अन्य आश्रित जनोंका पालन-पोषण किया करता था। सदा अपने धर्ममें लगा रहता, सत्य बोलता और किसीकी निन्दा नहीं करता था ॥
स कदाचिन्मृगं लिप्सुर्नाभ्यविन्दन्मृगं क्वचित् । अपः पिबन्तं ददृशे श्वापदं घ्राणचक्षुषम् ॥ ४१ ॥ एक दिन वह पशुको मार लानेके लिये वनमें गया; किंतु कहीं किसी हिंसक पशुको न पा सका। इतनेहीमें उसे एक पानी पीता हुआ हिंसक जानवर दिखायी दिया, जो अंधा था, नाकसे सूंघकर ही आँखका काम निकाला करता था ॥ ४१ ॥
अदृष्टपूर्वमपि तत् सत्त्वं तेन हतं तदा । अन्धे हते ततो व्योम्नः पुष्पवर्षं पपात च ॥ ४२ ॥
यद्यपि वैसे जानवरको व्याधने पहले कभी नहीं देखा था, तो भी उस समय उसने मार डाला। उस अंधे पशुके मारे जाते ही आकाशसे व्याधपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ४२ ॥ अप्सरोगीत्तवादित्रैर्नादितं च मनोरमम् । विमानमगमत् स्वर्गान्मृगव्याधनिनीषया ॥ ४३ ॥ साथ ही उस हिंसक पशुओंको मारनेवाले व्याधको ले जानेके लिये स्वर्गसे एक सुन्दर विमान उतर आया, जो अप्सराओंके गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे मुखरित होनेके कारण बड़ा मनोरम जान पड़ता था ॥ तद् भूतं सर्वभूतानामभावाय किलार्जुन । तपस्तप्त्वा वरं प्राप्तं कृतमन्धं स्वयम्भुवा ॥ ४४ ॥ अर्जुन! लोग कहते हैं कि उस जन्तुने पूर्वजन्ममें तप करके सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार कर डालनेके लिये वर प्राप्त किया था; इसीलिये ब्रह्माजीने उसे अन्धा बना दिया था ॥ ४४ ॥ तद्धत्वा सर्वभूतानामभावकृतनिश्चयम् । ततो बलाकः स्वर्गादेवं धर्मः सुदुर्विदः ॥ ४५ ॥ इस प्रकार समस्त प्राणियोंका अन्त कर देनेके निश्चयसे युक्त उस जन्तुको मारकर बलाक स्वर्गलोकमें चला गया; अतः धर्मका स्वरूप अत्यन्त दुर्ज्ञेय है ॥ ४५ ॥ कौशिकोऽप्यभवद् विप्रस्तपस्वी नो बहुश्रुतः । नदीनां संगमे ग्रामाद्दूरात् स किलावसत् ॥ ४६ ॥ इसी तरह कौशिक नामका एक तपस्वी ब्राह्मण था, जो बहुत पढ़ा-लिखा या शास्त्रज्ञ नहीं था। वह गाँवके पास ही नदियोंके संगमपर निवास करता था ॥ ४६ ॥ सत्यं मया सदा वाच्यमिति तस्याभवद् व्रतम् । सत्यवादीति विख्यातः स तदाऽऽसीद् धनंजय ॥ ४७ ॥ धनंजय! उसने यह नियम ले लिया था कि मैं सदा सत्य ही बोलूँगा। इसलिये उन दिनों वह सत्यवादीके नामसे विख्यात हो गया था ॥ ४७ ॥ अथ दस्युभयात् केचित् तदा तद् वनमाविशन् । तत्रापि दस्यवः क्रुद्धास्तानमार्गन्त यत्नतः ॥ ४८ ॥ एक दिनकी बात है, कुछ लोग लुटेरोंके भयसे छिपनेके लिये उस वनमें घुस गये; परंतु वे लुटेरे कुपित हो वहाँ भी उन लोगोंका यत्नपूर्वक अनुसंधान करने लगे ॥ ४८ ॥ अथ कौशिकमभ्येत्य प्राहुस्ते सत्यवादिनम् । कतमेन पथा याता भगवन् बहवो जनाः ॥ ४९ ॥ सत्येन पृष्टः प्रब्रूहि यदि तान् वेत्थ शंस नः ।
उन्होंने सत्यवादी कौशिक मुनिके पास आकर पूछा—‘भगवन्! बहुत-से लोग जो इधर ही आये हैं, किस रास्तेसे गये हैं? मैं सत्यकी साक्षीसे पूछता हूँ। यदि आप उन्हें जानते हों तो बताइये’॥ ४९ १/२ ॥
स पृष्टः कौशिकः सत्यं वचनं तानुवाच ह ॥ ५० ॥
बहुवृक्षलतागुल्ममेतद् वनमुपाश्रिताः ।
इति तान् ख्यापयामास तेभ्यस्तत्त्वं स कौशिकः ॥ ५१ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर कौशिक मुनिने उन्हें सच्ची बात बता दी—‘इस वनमें जहाँ बहुत-से वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ हैं, वहीं वे गये हैं।’ इस प्रकार कौशिकने उन दस्युओंको यथार्थ बात बता दी॥
ततस्ते तान् समासाद्य क्रूरा जघ्नुरिति श्रुतिः ।
तेनाधर्मेण महता वाग्दुरुक्तेन कौशिकः ॥ ५२ ॥
गतः स कष्टं नरकं सूक्ष्मधर्मेष्वकोविदः ।
तब उन निर्दयी डाकुओंने उन सबका पता पाकर उन्हें मार डाला, ऐसा सुना गया है। इस तरह वाणीका दुरुपयोग करनेसे कौशिकको महान् पाप लगा, जिससे उसे नरकका कष्ट भोगना पड़ा; क्योंकि वह धर्मके सूक्ष्म स्वरूपको समझनेमें कुशल नहीं था॥ ५२ १/२ ॥
यथा चाल्पश्रुतो मूढो धर्माणांमविभागवित् ॥ ५३ ॥
वृद्धानपृष्ट्वा संदेहं महच्छ्वभ्रमिवार्हति ।
जिसे शास्त्रोंका बहुत थोड़ा ज्ञान है, जो विवेकशून्य होनेके कारण धर्मोंके विभागको ठीक-ठीक नहीं जानता, वह मनुष्य यदि वृद्ध पुरुषोंसे अपने संदेह नहीं पूछता तो अनुचित कर्म कर बैठनेके कारण वह महान् नरकके सदृश कष्ट भोगनेके योग्य हो जाता है॥ ५३ १/२ ॥
तत्र ते लक्षणोद्देशः कश्चिदेवं भविष्यति ॥ ५४ ॥
दुष्करं परमं ज्ञानं तर्केणानुव्यवस्यति ।
श्रुतेर्धर्म इति ह्येके वदन्ति बहवो जनाः ॥ ५५ ॥
धर्माधर्मके निर्णयके लिये तुम्हें संक्षेपसे कोई संकेत बताना पड़ेगा, जो इस प्रकार होगा। कुछ लोग परम ज्ञानरूप दुष्कर धर्मको तर्कके द्वारा जाननेका प्रयत्न करते हैं; परंतु एक श्रेणीके बहुसंख्यक मनुष्य ऐसा कहते हैं कि धर्मका ज्ञान वेदोंसे होता है॥ ५४-५५॥
तत् ते न प्रत्यसूयामि न च सर्वं विधीयते ।
प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ॥ ५६ ॥
किंतु मैं तुम्हारे निकट इन दोनों मतोंके ऊपर कोई दोषारोपण नहीं करता; परंतु केवल वेदोंके द्वारा सभी धर्म-कर्मोंका विधान नहीं होता; इसीलिये धर्मज्ञ महर्षियोंने समस्त प्राणियोंके अभ्युदय और निःश्रेयसके लिये उत्तम धर्मका प्रतिपादन किया है॥ ५६॥
यत् स्यादहिंसासंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ।
अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ॥ ५७ ॥ सिद्धान्त यह है कि जिस कार्यमें हिंसा न हो, वही धर्म है। महर्षियोंने प्राणियोंकी हिंसा न होने देनेके लिये ही उत्तम धर्मका प्रवचन किया है ॥ ५७ ॥ धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः । यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥ ५८ ॥ धर्म ही प्रजाको धारण करता है और धारण करनेके कारण ही उसे धर्म कहते हैं। इसलिये जो धारण—प्राण-रक्षासे युक्त हो—जिसमें किसी भी जीवकी हिंसा न की जाती हो, वही धर्म है। ऐसा ही धर्म-शास्त्रोंका सिद्धान्त है ॥ ५८ ॥ येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धर्ममिच्छन्ति कर्हिचित् । अकूजनेन मोक्षं वा नानुकूजेत् कथंचन ॥ ५९ ॥ जो लोग अन्यायपूर्वक दूसरोंके धन आदिका अपहरण कर लेना चाहते हैं, वे कभी अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये दूसरोंसे सत्यभाषणरूप धर्मका पालन कराना चाहते हों तो वहाँ उनके समक्ष मौन रहकर उनसे पिण्ड छुड़ानेकी चेष्टा करे, किसी तरह कुछ बोले ही नहीं ॥ अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरन्नप्यकूजतः । श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं तत् सत्यमविचारितम् ॥ ६० ॥ किंतु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय अथवा न बोलनेसे लुटेरोंको संदेह होने लगे तो वहाँ असत्य बोलना ही ठीक है। ऐसे अवसरपर उस असत्यको ही बिना विचारे सत्य समझो ॥ ६० ॥ यः कार्येभ्यो व्रतं कृत्वा तस्य नानोपपादयेत् । न तत्फलमवाप्नोति एवमाहुर्मनीषिणः ॥ ६१ ॥ जो मनुष्य किसी कार्यके लिये प्रतिज्ञा करके उसका प्रकारान्तरसे उपपादन करता है, वह दम्भी होनेके कारण उसका फल नहीं पाता, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है ॥ प्राणात्यये विवाहे वा सर्वज्ञातिवधात्यये । नर्मण्यभिप्रवृत्ते वा न च प्रोक्तं मृषा भवेत् ॥ ६२ ॥ अधर्मं नात्र पश्यन्ति धर्मतत्त्वार्थदर्शिनः । प्राणसंकटकालमें, विवाहमें, समस्त कुटुम्बियोंके प्राणान्तका समय उपस्थित होनेपर तथा हँसी-परिहास आरम्भ होनेपर यदि असत्य बोला गया हो तो वह असत्य नहीं माना जाता। धर्मके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् उक्त अवसरोंपर मिथ्या बोलनेमें पाप नहीं समझते ॥ यः स्तेनैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथैरपि ॥ ६३ ॥ श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं तत् सत्यमविचारितम् ।
जो झूठी शपथ खानेपर भी लुटेरोंके साथ बन्धनमें पड़नेसे छुटकारा पा सके, उसके लिये वहाँ असत्य बोलना ही ठीक है। उसे बिना विचारे सत्य समझना चाहिये ।। ६३ ½ ।। न च तेभ्यो धनं देयं शक्ये सति कथंचन ।। ६४ ।। पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् । जहाँतक वश चले, किसी तरह उन लुटेरोंको धन नहीं देना चाहिये; क्योंकि पापियोंको दिया हुआ धन दाताको भी दुःख देता है ।। ६४ ½ ।। तस्माद् धर्मार्थमनृतमुक्त्वा नानृतभाग् भवेत् ।। ६५ ।। एष ते लक्षणोद्देशो मयोद्दिष्टो यथाविधि । यथाधर्मं यथाबुद्धि मयाद्य वै हितार्थिना ।। ६६ ।। एतच्छ्रुत्वा ब्रूहि पार्थ यदि वध्यो युधिष्ठिरः । अतः धर्मके लिये झूठ बोलनेपर मनुष्य असत्यभाषणके दोषका भागी नहीं होता। अर्जुन! मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ, इसलिये आज मैंने अपनी बुद्धि और धर्मके अनुसार संक्षेपसे तुम्हारे लिये यह विधिपूर्वक धर्माधर्मके निर्णयका संकेत बताया है। यह सुनकर अब तुम्हीं बताओ, क्या अब भी राजा युधिष्ठिर तुम्हारे वध्य हैं ।। ६५-६६ ½ ।।
अर्जुन उवाच
यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महामतिः ।। ६७ ।। हितं चैव यथास्माकं तथैतद् वचनं तव । **अर्जुन बोले—**प्रभो! कोई बहुत बड़ा विद्वान् और परम बुद्धिमान् मनुष्य जैसा उपदेश दे सकता है तथा जिसके अनुसार आचरण करनेसे हमलोगोंका हित हो सकता है, वैसा ही आपका यह भाषण हुआ है ।। भवान् मातृसमोऽस्माकं तथा पितृसमोऽपि च ।। ६८ ।। गतिश्च परमा कृष्ण त्वमेव च परायणम् । श्रीकृष्ण! आप हमारे माता-पिताके तुल्य हैं। आप ही परमगति और परम आश्रय हैं ।। ६८ ½ ।। न हि ते त्रिषु लोकेषु विद्यतेऽविदितं क्वचित् ।। ६९ ।। तस्माद् भवान् परं धर्मं वेद सर्वं यथातथम् । तीनों लोकोंमें कहीं कोई भी ऐसी बात नहीं है जो आपको विदित न हो; अतः आप ही परम धर्मको सम्पूर्ण और यथार्थरूपसे जानते हैं ।। ६९ ½ ।। अवध्यं पाण्डवं मन्ये धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।। ७० ।। अस्मिंस्तु मम संकल्पे ब्रूहि किंचिदनुग्रहम् । इदं वा परमात्रैव शृणु हृत्स्थं विवक्षितम् ।। ७१ ।।
अब मैं पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको वधके योग्य नहीं मानता। मेरी इस मानसिक प्रतिज्ञाके विषयमें आप ही कोई अनुग्रह (भाईका वध किये बिना ही प्रतिज्ञाकी रक्षाका उपाय) बताइये। मेरे मनमें जो यहाँ कहनेयोग्य उत्तम बात है, इसे पुनः सुन लीजिये ।। ७०-७१ ।।
जानासि दाशार्ह मम व्रतं त्वं यो मां ब्रूयात् कश्चन मानुषेषु । अन्यस्मै त्वं गाण्डिवं देहि पार्थ त्वत्तोऽस्त्रैर्वा वीर्यतो वा विशिष्टः ।। ७२ ।। हन्यामहं केशव तं प्रसह्म भीमो हन्यात् तूबरकेति चोक्तः । तन्मे राजा प्रोक्तवांस्ते समक्षं धनुर्देहीत्यसकृद् वृष्णिवीर ।। ७३ ।।
दाशार्हकुलनन्दन! आप तो यह जानते ही हैं कि मेरा व्रत क्या है? मनुष्योंमेंसे जो कोई भी मुझसे यह कह दे कि ‘पार्थ! तुम अपना गाण्डीव धनुष किसी दूसरे ऐसे पुरुषको दे दो जो अस्त्रोंके ज्ञान अथवा बलमें तुमसे बढ़कर हो; तो केशव! मैं उसे बलपूर्वक मार डालूँ।’ इसी प्रकार भीमसेनको कोई ‘मूँछ-दाढ़ीरहित’ कह दे तो वे उसे मार डालेंगे, वृष्णिवीर! राजा युधिष्ठिरने आपके सामने ही बारंबार मुझसे कहा है कि ‘तुम अपना धनुष दूसरेको दे दो’ ।। ७२-७३ ।।
तं हन्यां चेत् केशव जीवलोके स्थाता नाहं कालमप्यल्पमात्रम् । ध्यात्वा नूनं ह्येनसा चापि मुक्तो वधं राज्ञो भ्रष्टवीर्यो विचेताः ।। ७४ ।।
केशव! यदि मैं युधिष्ठिरको मार डालूँ तो इस जीव-जगत्मे थोड़ी देर भी मैं जीवित नहीं रह सकता। यदि किसी तरह पापसे छूट जाऊँ तो भी राजा युधिष्ठिरके वधका चिन्तन करके जी नहीं सकता। निश्चय ही इस समय मैं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर पराक्रमशून्य और अचेत-सा हो गया हूँ ।। ७४ ।।
यथा प्रतिज्ञा मम लोकबुद्धौ भवेत् सत्या धर्मभृतां वरिष्ठ । यथा जीवेत् पाण्डवोऽहं च कृष्ण तथा बुद्धिं दातुमप्यर्हसि त्वम् ।। ७५ ।।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! संसारके लोगोंकी समझमें जिस प्रकार मेरी प्रतिज्ञा सच्ची हो जाय और जिस प्रकार पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर और मैं दोनों जीवित रह सकें, वैसी कोई सलाह आप मुझे देनेकी कृपा करें ।। ७५ ।।
वासुदेव उवाच
राजा श्रान्तो विक्षतो दुःखितश्च कर्णेन संख्ये निशितैर्बाणसंघैः । यश्चानिशं सूतपुत्रेण वीर शरैर्भृशं ताडितोऽयुध्यमानः ॥ ७६ ॥ **श्रीकृष्णने कहा—**वीर! राजा युधिष्ठिर थक गये हैं। कर्णने युद्धस्थलमें अपने तीखे बाणसमूहोंद्वारा इन्हें क्षत-विक्षत कर दिया है, इसलिये ये बहुत दुःखी हैं। इतना ही नहीं, जब ये युद्ध नहीं कर रहे थे, उस समय भी सूतपुत्रने इनके ऊपर लगातार बाणोंकी वर्षा करके इन्हें अत्यन्त घायल कर दिया था ॥ ७६ ॥
अतस्त्वमेतेन सरोषमुक्तो दुःखान्वितेनेदमयुक्तरूपम् । अकोपितो ह्येष यदि स्म संख्ये कर्णं न हन्यादिति चाब्रवीत् सः ॥ ७७ ॥ इसीलिये दुःखी होनेके कारण इन्होंने तुम्हारे प्रति रोषपूर्वक ये अनुचित बातें कही हैं। इन्होंने यह भी सोचा है कि यदि अर्जुनको क्रोध न दिलाया गया तो ये युद्धमें कर्णको नहीं मार सकेंगे, इस कारणसे भी वैसी बातें कह दी हैं ॥ ७७ ॥
जानाति तं पाण्डव एष चापि पापं लोके कर्णमसह्यमन्यैः । ततस्त्वमुक्तो भृशरोषितेन राज्ञा समक्षं परुषाणि पार्थ ॥ ७८ ॥ ये पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर जानते हैं कि संसारमें पापी कर्णका सामना करना तुम्हारे सिवा दूसरोंके लिये असम्भव है। पार्थ! इसीलिये अत्यन्त रोषमें भरे हुए राजाने मेरे सामने तुम्हें कटु वचन सुनाये हैं ॥ ७८ ॥
नित्योद्युक्ते सततं चाप्रसह्ये कर्णे द्यूतं ह्यद्य रणे निबद्धम् । तस्मिन् हते कुरवो निर्जिताः स्यु- रेवं बुद्धिः पार्थिवे धर्मपुत्रे ॥ ७९ ॥ कर्ण नित्य-निरन्तर युद्धके लिये उद्यत और शत्रुओंके लिये असह्य है। आज रणभूमिमें हार-जीतका जूआ कर्णपर ही अवलम्बित है। कर्णके मारे जानेपर अन्य कौरव शीघ्र ही परास्त हो सकते हैं। धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें ऐसा ही विचार काम कर रहा था ॥
ततो वधं नार्हति धर्मपुत्र- स्त्वया प्रतिज्ञार्जुन पालनीया । जीवन्नयं येन मृतो भवेद्धि
तन्मे निबोधेह तवानुरूपम् ॥ ८० ॥ अर्जुन! इसलिये धर्मपुत्र युधिष्ठिर वधके योग्य नहीं हैं। इधर तुम्हें अपनी प्रतिज्ञाका पालन भी करना है। अतः जिस उपायसे ये जीवित रहते हुए भी मरेके समान हो जायँ, वही तुम्हारे अनुरूप होगा। उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ८० ॥
यदा मानं लभते माननार्ह- स्तदा स वै जीवति जीवलोके । यदावमानं लभते महान्तं तदा जीवन्मृत इत्युच्यते सः ॥ ८१ ॥ इस जीवजगत्में माननीय पुरुष जबतक सम्मान पाता है, तभीतक वह वास्तवमें जीवित है। जब वह महान् अपमान पाने लगता है, तब वह जीते-जी मरा हुआ कहलाता है ॥ ८१ ॥
सम्मानितः पार्थिवोऽयं सदैव त्वया च भीमेन तथा यमाभ्याम् । वृद्धैश्च लोके पुरुषैश्च शूरै- स्तस्यापमानं कलया प्रयुङ्क्ष्व ॥ ८२ ॥ तुमने, भीमसेनने, नकुल-सहदेवने तथा अन्य वृद्ध पुरुषों एवं शूरवीरोंने जगत्में राजा युधिष्ठिरका सदा सम्मान किया है; किंतु इस समय तुम उनका थोड़ा-सा अपमान कर दो ॥ ८२ ॥
त्वमित्यत्रभवन्तं हि ब्रूहि पार्थ युधिष्ठिरम् । त्वमित्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति भारत ॥ ८३ ॥ पार्थ! तुम युधिष्ठिरको सदा आप कहते आये हो, आज उन्हें 'तू' कह दो। भारत! यदि किसी गुरुजनको 'तू' कह दिया जाय तो यह साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें उसका वध ही हो जाता है ॥ ८३ ॥
एवमाचर कौन्तेय धर्मराजे युधिष्ठिरे । अधर्मयुक्तं संयोगं कुरुष्वैनं कुरूद्वह ॥ ८४ ॥ कुन्तीनन्दन! तुम धर्मराज युधिष्ठिरके प्रति ऐसा ही बर्ताव करो। कुरुश्रेष्ठ! उनके लिये इस समय अधर्मयुक्त वाक्यका प्रयोग करो ॥ ८४ ॥
अथर्वाङ्गिरसी ह्येषा श्रुतीनामुत्तमा श्रुतिः । अविचार्यैव कार्यैषा श्रेयस्कामैर्नरैः सदा ॥ ८५ ॥ जिसके देवता अथर्वा और अंगिरा हैं, ऐसी एक श्रुति है, जो सब श्रुतियोंमें उत्तम है। अपनी भलाई चाहनेवाले मनुष्योंको सदा बिना विचारे ही इस श्रुतिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये ॥ ८५ ॥
अवधेन वधः प्रोक्तो यद् गुरुस्त्वमिति प्रभुः ।
तद् ब्रूहि त्वं यन्मयोक्तं धर्मराजस्य धर्मवित् ॥ ८६ ॥ उस श्रुतिका भाव यह है—'गुरुको तू कह देना उसे बिना मारे ही मार डालना है।' तुम धर्मज्ञ हो तो भी जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार धर्मराजके लिये 'तू' शब्दका प्रयोग करो ॥ ८६ ॥
वधं ह्ययं पाण्डव धर्मराज-
स्त्वत्तोऽयुक्तं वेत्स्यते चैवमेषः ।
ततोऽस्य पादावभिवाद्य पश्चात्
समं ब्रूयाः सान्त्वयित्वा च पार्थम् ॥ ८७ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम्हारे द्वारा किये गये इस अनुचित शब्दके प्रयोगको सुनकर ये धर्मराज अपना वध हुआ ही समझेंगे। इसके बाद तुम इनके चरणोंमें प्रणाम करके इन्हें सान्त्वना देते हुए क्षमा माँग लेना और इनके प्रति न्यायोचित वचन बोलना ॥ ८७ ॥
भ्राता प्राज्ञस्तव कोपं न जातु
कुर्याद् राजा धर्ममवेक्ष्य चापि ।
मुक्तोऽनृताद् भ्रातृवधाच्च पार्थ
हृष्टः कर्णं त्वं जहि सूतपुत्रम् ॥ ८८ ॥
कुन्तीनन्दन! तुम्हारे भाई राजा युधिष्ठिर समझदार हैं। ये धर्मका ख्याल करके भी तुमपर कभी क्रोध नहीं करेंगे। इस प्रकार तुम मिथ्याभाषण और भ्रातृ-वधके पापसे मुक्त हो बड़े हर्षके साथ सूतपुत्र कर्णका वध करना ॥ ८८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कृष्णार्जुनसंवादे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवादविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2145)
सप्ततितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना
संजय उवाच
इत्येवमुक्तस्तु जनार्दनेन
पार्थः प्रशस्याथ सुहृद्वचस्तत् ।
ततोऽब्रवीदर्जुनो धर्मराज-
मनुक्तपूर्वं परुषं प्रसह्य ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनने हितैषी सखाके उस वचनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर वे हठपूर्वक धर्मराजके प्रति ऐसे कठोर वचन कहने लगे, जैसे उन्होंने पहले कभी नहीं कहे थे ॥ १ ॥
अर्जुन उवाच
मा त्वं राजन् व्याहर व्याहरस्व
यस्तिष्ठसे क्रोशमात्रे रणाद् वै ।
भीमस्तु मामर्हति गर्हणाय
यो युध्यते सर्वलोकप्रवीरैः ॥ २ ॥
**अर्जुन बोले—**राजन्! तू तो स्वयं ही युद्धसे भागकर एक कोस दूर आ बैठा है, अतः तू मुझसे न बोल, न बोल। हाँ, भीमसेनको मेरी निन्दा करनेका अधिकार है, जो कि समस्त संसारके प्रमुख वीरोंके साथ अकेले ही जूझ रहे हैं ॥
काले हि शत्रून् परिपीड्य संख्ये
हत्वा च शूरान् पृथिवीपतींस्तान् ।
रथप्रधानोत्तमनागमुख्यान्
सादिप्रवेकानमितांश्च वीरान् ॥ ३ ॥
यः कुञ्जराणामधिकं सहस्रं
हत्वा नदंस्तुमुलं सिंहनादम् ।
काम्बोजानामयुतं पर्वतीयान्
मृगान् सिंहो विनिहत्येव चाजौ ॥ ४ ॥
सुदुष्करं कर्म करोति वीरः
कर्तुं यथा नार्हसि त्वं कदाचित् । रथादवप्लुत्य गदां परामृशं- स्तया निहन्त्यश्वरथद्विपान् रणे ॥ ५ ॥ वरासिना चापि नराश्वकुञ्जरां- स्तथा रथाङ्गैर्धनुषा दहत्यरीन् । प्रमृद्य पद्भ्यामहितान् निहन्ति पुनस्तु दोर्भ्यां शतमन्युविक्रमः ॥ ६ ॥ महाबलो वैश्रवणान्तकोपमः प्रसह्य हन्ता द्विषतामनीकिनीम् । स भीमसेनोऽर्हति गर्हणां मे न त्वं नित्यं रक्ष्यसे यः सुहृद्भिः ॥ ७ ॥ जो यथासमय शत्रुओंको पीड़ा देते हुए युद्धस्थलमें उन समस्त शौर्यसम्पन्न भूपतियों, प्रधान-प्रधान रथियों, श्रेष्ठ गजराजों, प्रमुख अश्वारोहियों, असंख्य वीरों, सहस्रसे भी अधिक हाथियों, दस हजार काम्बोजदेशीय अश्वों तथा पर्वतीय वीरोंका वध करके जैसे मृगोंको मारकर सिंह दहाड़ रहा हो, उसी प्रकार भयंकर सिंहनाद करते हैं, जो वीर भीमसेन हाथमें गदा ले रथसे कूदकर उसके द्वारा रणभूमिमें हाथी, घोड़ों एवं रथोंका संहार करते हैं तथा ऐसा अत्यन्त दुष्कर पराक्रम प्रकट कर रहे हैं जैसा कि तू कभी नहीं कर सकता, जिनका पराक्रम इन्द्रके समान है, जो उत्तम खड्ग, चक्र और धनुषके द्वारा हाथी, घोड़ों, पैदल-योद्धाओं तथा अन्यान्य शत्रुओंको दग्ध किये देते हैं और जो पैरोंसे कुचलकर दोनों हाथोंसे वैरियोंका विनाश करते हैं, वे महाबली, कुबेर और यमराजके समान पराक्रमी एवं शत्रुओंकी सेनाका बलपूर्वक संहार करनेमें समर्थ भीमसेन ही मेरी निन्दा करनेके अधिकारी हैं। तू मेरी निन्दा नहीं कर सकता; क्योंकि तू अपने पराक्रमसे नहीं, हितैषी सुहृदोंद्वारा सदा सुरक्षित होता है ॥ ३—७ ॥
महारथान् नागवरान् हयांश्च पदातिमुख्यानपि च प्रमथ्य । एको भीमो धार्तराष्ट्रेषु मग्नः स मामुपालब्धुमरिंदमोऽर्हति ॥ ८ ॥ जो शत्रुपक्षके महारथियों, गजराजों, घोड़ों और प्रधान-प्रधान पैदल योद्धाओंको भी रौंदकर दुर्योधनकी सेनाओंमें घुस गये हैं, वे एकमात्र शत्रुदमन भीमसेन ही मुझे उलाहना देनेके अधिकारी हैं ॥ ८ ॥
कलिङ्गवङ्गाङ्कनिषादमागधान् सदामदानीलबलाहकोपमान् । निहन्ति यः शत्रुगजाननेकान्
स मामुपालब्धुमरिंदमोऽर्हति ॥ ९ ॥
जो कलिंग, वंग, अंग, निषाद और मगध देशोंमें उत्पन्न सदा मदमत्त रहनेवाले तथा काले मेघोंकी घटाके समान दिखायी देनेवाले शत्रुपक्षीय अनेकानेक हाथियोंका संहार करते हैं, वे शत्रुदमन भीमसेन ही मुझे उलाहना देनेके अधिकारी हैं ॥ ९ ॥
स युक्तमास्थाय रथं हि काले
धनुर्विधुन्वन् शरपूर्णमुष्टिः ।
सृजत्यसौ शरवर्षाणि वीरो
महाहवे मेघ इवाम्बुधाराः ॥ १० ॥
वीरवर भीमसेन यथासमय जुते हुए रथपर आरूढ़ हो धनुष हिलाते हुए मुट्ठीभर बाण निकालते और जैसे मेघ जलकी धारा गिराते हैं, उसी प्रकार महासमरमें बाणोंकी वर्षा करते हैं ॥ १० ॥
शतान्यष्टौ वारणानामपश्यं
विशातितैः कुम्भकराग्रहस्तैः ।
भीमेनाजौ निहतान्यद्य बाणैः
स मां क्रूरं वक्तुमर्हत्यरिघ्नः ॥ ११ ॥
मैंने देखा है आज भीमसेनने युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके आठ सौ हाथियोंको उनके कुम्भस्थल, शुण्ड और शुण्डाग्रभाग काटकर मार डाला है, वे शत्रुहन्ता भीमसेन ही मुझसे कठोर वचन कहनेके अधिकारी हैं ॥ ११ ॥
(नकुलेन राजन् गजवाजियोधा
हताश्च शूराः सहसा समेत्य ।
त्यक्त्वा प्राणान् समरे युद्धकाङ्क्षी
स मामुपालब्धुमरिंदमोऽर्हति ॥
राजन्! नकुलने समरभूमिमें प्राणोंका मोह छोड़कर सहसा आगे बढ़-बढ़कर बहुत-से हाथी, घोड़े और शूरवीर योद्धाओंका वध किया है। युद्धकी अभिलाषा रखनेवाला वह शत्रुदमन वीर भी मुझे उलाहना दे सकता है।
कृतं कर्म सहदेवेन दुष्करं
यो युध्यते परसैन्यावमर्दी ।
न चाब्रवीत् किंचिदिहागतो बली
पश्यान्तरं तस्य चैवात्मनश्च ॥
सहदेवने भी दुष्कर कर्म किया है। शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाला वह बलवान् वीर निरन्तर युद्धमें लगा रहता है। वह भी यहाँ आया था, किंतु कुछ भी न बोला। देख ले, तुझमें और उसमें कितना अन्तर है।
धृष्टद्युम्नः सात्यकिर्द्रौपदेया
युधामन्युश्चोत्तमौजाः शिखण्डी । एते च सर्वे युधि सम्प्रपीडिता- स्ते मामुपालब्धुमर्हन्ति न त्वम् ॥) धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके पुत्र, युधामन्यु, उत्तमौजा और शिखण्डी—ये सभी वीर युद्धमें अत्यन्त पीड़ा सहन करते आये हैं; अतः ये ही मुझे उपालम्भ दे सकते हैं, तू नहीं।
बलं तु वाचि द्विजसत्तमानां क्षात्रं बुधा बाहुबलं वदन्ति । त्वं वाग्बलो भारत निष्ठुरश्च त्वमेव मां वेत्थ यथाबलोऽहम् ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका बल उनकी वाणीमें होता है और क्षत्रियका बल उनकी दोनों भुजाओंमें; परंतु तेरा बल केवल वाणीमें है, तू निष्ठुर है; मैं जैसा बलवान् हूँ, उसे तू ही अच्छी तरह जानता है ॥ १२ ॥
यते हि नित्यं तव कर्तुमिष्टं दारैः सुतैर्जीवितेनात्मना च । एवं यन्मां वाग्विशिखेन हंसि त्वत्तः सुखं न वयं विद्म किंचित् ॥ १३ ॥ मैं सदा स्त्री, पुत्र, जीवन और यह शरीर लगाकर तेरा प्रिय कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रयत्नशील रहता हूँ। ऐसी दशामें भी तू मुझे अपने वाग्बाणोंसे मार रहा है; हमलोग तुझसे थोड़ा-सा भी सुख न पा सके ॥ १३ ॥
मां मावमंस्था द्रौपदीतल्पसंस्थो महारथान् प्रतिहन्मि त्वदर्थे । तेनातिशङ्की भारत निष्ठुरोऽसि त्वत्तः सुखं नाभिजानामि किंचित् ॥ १४ ॥ तू द्रौपदीकी शय्यापर बैठा-बैठा मेरा अपमान न कर। मैं तेरे ही लिये बड़े-बड़े महारथियोंका संहार कर रहा हूँ। इसीसे तू मेरे प्रति अधिक संदेह करके निष्ठुर हो गया है। तुझसे कोई सुख मिला हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ १४ ॥
प्रोक्तः स्वयं सत्यसंधेन मृत्यु- स्तव प्रियार्थं नरदेव युद्धे । वीरः शिखण्डी द्रौपदोऽसौ महात्मा मयाभिगुप्तेन हतश्च तेन ॥ १५ ॥ नरदेव! तेरा प्रिय करनेके लिये सत्यप्रतिज्ञ भीष्मजीने युद्धमें महामनस्वी वीर द्रुपदकुमार शिखण्डीको अपनी मृत्यु बताया था। मेरे ही द्वारा सुरक्षित होकर शिखण्डीने उन्हें मारा है ॥ १५ ॥
न चाभिनन्दामि तवाधिराज्यं यतस्त्वमक्षेष्वहिताय सक्तः। स्वयं कृत्वा पापमनार्यजुष्ट- मस्माभिर्वा तर्तुमिच्छस्यरींस्त्वम्॥ १६॥ मैं तेरे राज्यका अभिनन्दन नहीं करता; क्योंकि तू अपना ही अहित करनेके लिये जूएमें आसक्त है। स्वयं नीच पुरुषोंद्वारा सेवित पापकर्म करके अब तू हमलोगोंके द्वारा शत्रुसेनारूपी समुद्रको पार करना चाहता है॥ १६॥
अक्षेषु दोषा बहवो विधर्माः श्रुतास्त्वया सहदेवोऽब्रवीद् यान्। तान् नैषि त्वं त्यक्तुमसाधुजुष्टां- स्तेन स्म सर्वे निरयं प्रपन्नाः॥ १७॥ जूआ खेलनेमें बहुत-से पापमय दोष बताये गये हैं, जिन्हें सहदेवने तुझसे कहा था और तूने सुना भी था, तो भी तू उन दुर्जनसेवित दोषोंका परित्याग न कर सका; इसीसे हम सब लोग नरकतुल्य कष्टमें पड़ गये॥ १७॥
सुखं त्वत्तो नाभिजानीम किंचिद् यतस्त्वमक्षैर्देवितुं सम्प्रवृत्तः। स्वयं कृत्वा व्यसनं पाण्डव त्व- मस्मांस्तीव्राः श्रावयस्यद्य वाचः॥ १८॥ पाण्डुकुमार! तुझसे थोड़ा-सा भी सुख मिला हो—यह हम नहीं जानते हैं; क्योंकि तू जूआ खेलनेके व्यसनमें पड़ा हुआ है। स्वयं यह दुर्व्यसन करके अब तू हमें कठोर बातें सुना रहा है॥ १८॥
शेतेऽस्माभिर्निहता शत्रुसेना छिन्नैर्गात्रैर्भूतितले नदन्ती। त्वया हि तत् कर्म कृतं नृशंसं यस्माद् दोषःकौरवाणां वधश्च॥ १९॥ हमारे द्वारा मारी गयी शत्रुओंकी सेना अपने कटे हुए अंगोंके साथ पृथ्वीपर पड़ी-पड़ी कराह रही है। तूने वह क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, जिससे पाप तो होगा ही; कौरववंशका विनाश भी हो जायगा॥ १९॥
हता उदीच्या निहताः प्रतीच्या नष्टाः प्राच्या दाक्षिणात्या विशस्ताः। कृतं कर्माप्रतिरूपं महद्भि- स्तेषां योधैरस्मदीयैश्च युद्धे॥ २०॥
उत्तर दिशाके वीर मारे गये, पश्चिमके योद्धाओंका संहार हो गया, पूर्वदेशके क्षत्रिय नष्ट हो गये और दक्षिणदेशीय योद्धा काट डाले गये। शत्रुओंके और हमारे पक्षके बड़े-बड़े योद्धाओंने युद्धमें ऐसा पराक्रम किया है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ २० ॥ त्वं देवितात्वत्कृते राज्यनाश- स्त्वत्सम्भवं नो व्यसनं नरेन्द्र । मास्मान् क्रूरैर्वाक्प्रतोदैस्तुदंस्त्वं भूयो राजन् कोपयेस्त्वल्पभाग्यः ॥ २१ ॥ नरेन्द्र! तू भाग्यहीन जुआरी है। तेरे ही कारण हमारे राज्यका नाश हुआ और तुझसे ही हमें घोर संकटकी प्राप्ति हुई। राजन्! अब तू अपने वचनरूपी चाबुकोंसे हमें पीड़ा देते हुए फिर कुपित न कर ॥ २१ ॥
संजय उवाच
एता वाचः परुषाः सव्यसाची स्थिरप्रज्ञः श्रावयित्वा तु रूक्षाः । बभूवासौ विमना धर्मभीरुः कृत्वा प्राज्ञः पातकं किंचिदेवम् ॥ २२ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! सव्यसाची अर्जुन धर्मभीरु हैं। उनकी बुद्धि स्थिर है तथा वे उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न हैं। उस समय राजा युधिष्ठिरको वैसी रूखी और कठोर बातें सुनाकर वे ऐसे अनमने और उदास हो गये, मानो कोई पातक करके इस प्रकार पछता रहे हों ॥ २२ ॥ तदानुतेपे सुरराजपुत्रो विनिःश्वसंश्चासिमथोद्धबर्ह । तमाह कृष्णः किमिदं पुनर्भवान् विकोशमाकाशनिभं करोत्यसिम् ॥ २३ ॥ ब्रवीहि मां त्वं पुनरुत्तरं वच- स्तथा प्रवक्ष्याम्यहमर्थसिद्धये । देवराजकुमार अर्जुनको उस समय बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने लंबी साँस खींचते हुए फिरसे तलवार खींच ली। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'अर्जुन! यह क्या? तुम आकाशके समान निर्मल इस तलवारको पुनः क्यों म्यानसे बाहर निकाल रहे हो? तुम मुझे मेरी बातका उत्तर दो। मैं तुम्हारा अभीष्ट अर्थ सिद्ध करनेके लिये पुनः कोई योग्य उपाय बताऊँगा' ॥ २३ १/२ ॥ इत्येवमुक्तः पुरुषोत्तमेन सुदुःखितः केशवमर्जुनोऽब्रवीत् ॥ २४ ॥