भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2137

यद्यपि वैसे जानवरको व्याधने पहले कभी नहीं देखा था, तो भी उस समय उसने मार डाला। उस अंधे पशुके मारे जाते ही आकाशसे व्याधपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ४२ ॥ अप्सरोगीत्तवादित्रैर्नादितं च मनोरमम् । विमानमगमत् स्वर्गान्मृगव्याधनिनीषया ॥ ४३ ॥ साथ ही उस हिंसक पशुओंको मारनेवाले व्याधको ले जानेके लिये स्वर्गसे एक सुन्दर विमान उतर आया, जो अप्सराओंके गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे मुखरित होनेके कारण बड़ा मनोरम जान पड़ता था ॥ तद् भूतं सर्वभूतानामभावाय किलार्जुन । तपस्तप्त्वा वरं प्राप्तं कृतमन्धं स्वयम्भुवा ॥ ४४ ॥ अर्जुन! लोग कहते हैं कि उस जन्तुने पूर्वजन्ममें तप करके सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार कर डालनेके लिये वर प्राप्त किया था; इसीलिये ब्रह्माजीने उसे अन्धा बना दिया था ॥ ४४ ॥ तद्धत्वा सर्वभूतानामभावकृतनिश्चयम् । ततो बलाकः स्वर्गादेवं धर्मः सुदुर्विदः ॥ ४५ ॥ इस प्रकार समस्त प्राणियोंका अन्त कर देनेके निश्चयसे युक्त उस जन्तुको मारकर बलाक स्वर्गलोकमें चला गया; अतः धर्मका स्वरूप अत्यन्त दुर्ज्ञेय है ॥ ४५ ॥ कौशिकोऽप्यभवद् विप्रस्तपस्वी नो बहुश्रुतः । नदीनां संगमे ग्रामाद्दूरात् स किलावसत् ॥ ४६ ॥ इसी तरह कौशिक नामका एक तपस्वी ब्राह्मण था, जो बहुत पढ़ा-लिखा या शास्त्रज्ञ नहीं था। वह गाँवके पास ही नदियोंके संगमपर निवास करता था ॥ ४६ ॥ सत्यं मया सदा वाच्यमिति तस्याभवद् व्रतम् । सत्यवादीति विख्यातः स तदाऽऽसीद् धनंजय ॥ ४७ ॥ धनंजय! उसने यह नियम ले लिया था कि मैं सदा सत्य ही बोलूँगा। इसलिये उन दिनों वह सत्यवादीके नामसे विख्यात हो गया था ॥ ४७ ॥ अथ दस्युभयात् केचित् तदा तद् वनमाविशन् । तत्रापि दस्यवः क्रुद्धास्तानमार्गन्त यत्नतः ॥ ४८ ॥ एक दिनकी बात है, कुछ लोग लुटेरोंके भयसे छिपनेके लिये उस वनमें घुस गये; परंतु वे लुटेरे कुपित हो वहाँ भी उन लोगोंका यत्नपूर्वक अनुसंधान करने लगे ॥ ४८ ॥ अथ कौशिकमभ्येत्य प्राहुस्ते सत्यवादिनम् । कतमेन पथा याता भगवन् बहवो जनाः ॥ ४९ ॥ सत्येन पृष्टः प्रब्रूहि यदि तान् वेत्थ शंस नः ।