भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2136

सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं बलाकोऽन्धवधादिव ॥ ३६ ॥ जिसकी बुद्धि शुद्ध (निष्काम) है, वह पुरुष यदि अत्यन्त कठोर होकर भी, जैसे अंधे पशुको मार देनेसे बलाक नामक व्याध पुण्यका भागी हुआ था, उसी प्रकार महान् पुण्य प्राप्त कर ले तो क्या आश्चर्य है? ॥

किमाश्चर्यं पुनर्मूढो धर्मकामो ह्यपण्डितः । सुमहत् प्राप्नुयात् पापमापगास्विव कौशिकः ॥ ३७ ॥ इसी तरह जो धर्मकी इच्छा तो रखता है, पर है मूर्ख और अज्ञानी, वह नदियोंके संगमपर बसे हुए कौशिक मुनिकी भाँति यदि अज्ञानपूर्वक धर्म करके भी महान् पापका भागी हो जाय तो क्या आश्चर्य है? ॥ ३७ ॥

अर्जुन उवाच

आचक्ष्व भगवन्नेतद् यथा विन्दाम्यहं तथा । बलाकस्यानुसम्बन्धं नदीनां कौशिकस्य च ॥ ३८ ॥ **अर्जुन बोले—**भगवन्! बलाक नामक व्याध और नदियोंके संगमपर रहनेवाले कौशिक मुनिकी कथा कहिये, जिससे मैं इस विषयको अच्छी तरह समझ सकूँ ॥

वासुदेव उवाच

पुरा व्याधोऽभवत् कश्चिद् बलाको नाम भारत । यात्रार्थं पुत्रदारस्य मृगान् हन्ति न कामतः ॥ ३९ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**भारत! प्राचीनकालमें बलाक नामसे प्रसिद्ध एक व्याध रहता था, जो अपनी स्त्री और पुत्रोंकी जीवनरक्षाके लिये ही हिंसक पशुओंको मारा करता था, कामनावश नहीं ॥ ३९ ॥

वृद्धौ च मातापितरौ बिभर्त्यन्यांश्च संश्रितान् । स्वधर्मनिरतो नित्यं सत्यवागनसूयकः ॥ ४० ॥ वह बूढ़े माता-पिता तथा अन्य आश्रित जनोंका पालन-पोषण किया करता था। सदा अपने धर्ममें लगा रहता, सत्य बोलता और किसीकी निन्दा नहीं करता था ॥

स कदाचिन्मृगं लिप्सुर्नाभ्यविन्दन्मृगं क्वचित् । अपः पिबन्तं ददृशे श्वापदं घ्राणचक्षुषम् ॥ ४१ ॥ एक दिन वह पशुको मार लानेके लिये वनमें गया; किंतु कहीं किसी हिंसक पशुको न पा सका। इतनेहीमें उसे एक पानी पीता हुआ हिंसक जानवर दिखायी दिया, जो अंधा था, नाकसे सूंघकर ही आँखका काम निकाला करता था ॥ ४१ ॥

अदृष्टपूर्वमपि तत् सत्त्वं तेन हतं तदा । अन्धे हते ततो व्योम्नः पुष्पवर्षं पपात च ॥ ४२ ॥