भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2143

तन्मे निबोधेह तवानुरूपम् ॥ ८० ॥ अर्जुन! इसलिये धर्मपुत्र युधिष्ठिर वधके योग्य नहीं हैं। इधर तुम्हें अपनी प्रतिज्ञाका पालन भी करना है। अतः जिस उपायसे ये जीवित रहते हुए भी मरेके समान हो जायँ, वही तुम्हारे अनुरूप होगा। उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ८० ॥

यदा मानं लभते माननार्ह- स्तदा स वै जीवति जीवलोके । यदावमानं लभते महान्तं तदा जीवन्मृत इत्युच्यते सः ॥ ८१ ॥ इस जीवजगत्में माननीय पुरुष जबतक सम्मान पाता है, तभीतक वह वास्तवमें जीवित है। जब वह महान् अपमान पाने लगता है, तब वह जीते-जी मरा हुआ कहलाता है ॥ ८१ ॥

सम्मानितः पार्थिवोऽयं सदैव त्वया च भीमेन तथा यमाभ्याम् । वृद्धैश्च लोके पुरुषैश्च शूरै- स्तस्यापमानं कलया प्रयुङ्क्ष्व ॥ ८२ ॥ तुमने, भीमसेनने, नकुल-सहदेवने तथा अन्य वृद्ध पुरुषों एवं शूरवीरोंने जगत्में राजा युधिष्ठिरका सदा सम्मान किया है; किंतु इस समय तुम उनका थोड़ा-सा अपमान कर दो ॥ ८२ ॥

त्वमित्यत्रभवन्तं हि ब्रूहि पार्थ युधिष्ठिरम् । त्वमित्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति भारत ॥ ८३ ॥ पार्थ! तुम युधिष्ठिरको सदा आप कहते आये हो, आज उन्हें 'तू' कह दो। भारत! यदि किसी गुरुजनको 'तू' कह दिया जाय तो यह साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें उसका वध ही हो जाता है ॥ ८३ ॥

एवमाचर कौन्तेय धर्मराजे युधिष्ठिरे । अधर्मयुक्तं संयोगं कुरुष्वैनं कुरूद्वह ॥ ८४ ॥ कुन्तीनन्दन! तुम धर्मराज युधिष्ठिरके प्रति ऐसा ही बर्ताव करो। कुरुश्रेष्ठ! उनके लिये इस समय अधर्मयुक्त वाक्यका प्रयोग करो ॥ ८४ ॥

अथर्वाङ्गिरसी ह्येषा श्रुतीनामुत्तमा श्रुतिः । अविचार्यैव कार्यैषा श्रेयस्कामैर्नरैः सदा ॥ ८५ ॥ जिसके देवता अथर्वा और अंगिरा हैं, ऐसी एक श्रुति है, जो सब श्रुतियोंमें उत्तम है। अपनी भलाई चाहनेवाले मनुष्योंको सदा बिना विचारे ही इस श्रुतिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये ॥ ८५ ॥

अवधेन वधः प्रोक्तो यद् गुरुस्त्वमिति प्रभुः ।