भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2139

अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ॥ ५७ ॥ सिद्धान्त यह है कि जिस कार्यमें हिंसा न हो, वही धर्म है। महर्षियोंने प्राणियोंकी हिंसा न होने देनेके लिये ही उत्तम धर्मका प्रवचन किया है ॥ ५७ ॥ धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः । यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥ ५८ ॥ धर्म ही प्रजाको धारण करता है और धारण करनेके कारण ही उसे धर्म कहते हैं। इसलिये जो धारण—प्राण-रक्षासे युक्त हो—जिसमें किसी भी जीवकी हिंसा न की जाती हो, वही धर्म है। ऐसा ही धर्म-शास्त्रोंका सिद्धान्त है ॥ ५८ ॥ येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धर्ममिच्छन्ति कर्हिचित् । अकूजनेन मोक्षं वा नानुकूजेत् कथंचन ॥ ५९ ॥ जो लोग अन्यायपूर्वक दूसरोंके धन आदिका अपहरण कर लेना चाहते हैं, वे कभी अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये दूसरोंसे सत्यभाषणरूप धर्मका पालन कराना चाहते हों तो वहाँ उनके समक्ष मौन रहकर उनसे पिण्ड छुड़ानेकी चेष्टा करे, किसी तरह कुछ बोले ही नहीं ॥ अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरन्नप्यकूजतः । श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं तत् सत्यमविचारितम् ॥ ६० ॥ किंतु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय अथवा न बोलनेसे लुटेरोंको संदेह होने लगे तो वहाँ असत्य बोलना ही ठीक है। ऐसे अवसरपर उस असत्यको ही बिना विचारे सत्य समझो ॥ ६० ॥ यः कार्येभ्यो व्रतं कृत्वा तस्य नानोपपादयेत् । न तत्फलमवाप्नोति एवमाहुर्मनीषिणः ॥ ६१ ॥ जो मनुष्य किसी कार्यके लिये प्रतिज्ञा करके उसका प्रकारान्तरसे उपपादन करता है, वह दम्भी होनेके कारण उसका फल नहीं पाता, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है ॥ प्राणात्यये विवाहे वा सर्वज्ञातिवधात्यये । नर्मण्यभिप्रवृत्ते वा न च प्रोक्तं मृषा भवेत् ॥ ६२ ॥ अधर्मं नात्र पश्यन्ति धर्मतत्त्वार्थदर्शिनः । प्राणसंकटकालमें, विवाहमें, समस्त कुटुम्बियोंके प्राणान्तका समय उपस्थित होनेपर तथा हँसी-परिहास आरम्भ होनेपर यदि असत्य बोला गया हो तो वह असत्य नहीं माना जाता। धर्मके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् उक्त अवसरोंपर मिथ्या बोलनेमें पाप नहीं समझते ॥ यः स्तेनैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथैरपि ॥ ६३ ॥ श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं तत् सत्यमविचारितम् ।