भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2149

न चाभिनन्दामि तवाधिराज्यं यतस्त्वमक्षेष्वहिताय सक्तः। स्वयं कृत्वा पापमनार्यजुष्ट- मस्माभिर्वा तर्तुमिच्छस्यरींस्त्वम्॥ १६॥ मैं तेरे राज्यका अभिनन्दन नहीं करता; क्योंकि तू अपना ही अहित करनेके लिये जूएमें आसक्त है। स्वयं नीच पुरुषोंद्वारा सेवित पापकर्म करके अब तू हमलोगोंके द्वारा शत्रुसेनारूपी समुद्रको पार करना चाहता है॥ १६॥

अक्षेषु दोषा बहवो विधर्माः श्रुतास्त्वया सहदेवोऽब्रवीद् यान्। तान् नैषि त्वं त्यक्तुमसाधुजुष्टां- स्तेन स्म सर्वे निरयं प्रपन्नाः॥ १७॥ जूआ खेलनेमें बहुत-से पापमय दोष बताये गये हैं, जिन्हें सहदेवने तुझसे कहा था और तूने सुना भी था, तो भी तू उन दुर्जनसेवित दोषोंका परित्याग न कर सका; इसीसे हम सब लोग नरकतुल्य कष्टमें पड़ गये॥ १७॥

सुखं त्वत्तो नाभिजानीम किंचिद् यतस्त्वमक्षैर्देवितुं सम्प्रवृत्तः। स्वयं कृत्वा व्यसनं पाण्डव त्व- मस्मांस्तीव्राः श्रावयस्यद्य वाचः॥ १८॥ पाण्डुकुमार! तुझसे थोड़ा-सा भी सुख मिला हो—यह हम नहीं जानते हैं; क्योंकि तू जूआ खेलनेके व्यसनमें पड़ा हुआ है। स्वयं यह दुर्व्यसन करके अब तू हमें कठोर बातें सुना रहा है॥ १८॥

शेतेऽस्माभिर्निहता शत्रुसेना छिन्नैर्गात्रैर्भूतितले नदन्ती। त्वया हि तत् कर्म कृतं नृशंसं यस्माद् दोषःकौरवाणां वधश्च॥ १९॥ हमारे द्वारा मारी गयी शत्रुओंकी सेना अपने कटे हुए अंगोंके साथ पृथ्वीपर पड़ी-पड़ी कराह रही है। तूने वह क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, जिससे पाप तो होगा ही; कौरववंशका विनाश भी हो जायगा॥ १९॥

हता उदीच्या निहताः प्रतीच्या नष्टाः प्राच्या दाक्षिणात्या विशस्ताः। कृतं कर्माप्रतिरूपं महद्भि- स्तेषां योधैरस्मदीयैश्च युद्धे॥ २०॥