महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
न चाभिनन्दामि तवाधिराज्यं यतस्त्वमक्षेष्वहिताय सक्तः। स्वयं कृत्वा पापमनार्यजुष्ट- मस्माभिर्वा तर्तुमिच्छस्यरींस्त्वम्॥ १६॥ मैं तेरे राज्यका अभिनन्दन नहीं करता; क्योंकि तू अपना ही अहित करनेके लिये जूएमें आसक्त है। स्वयं नीच पुरुषोंद्वारा सेवित पापकर्म करके अब तू हमलोगोंके द्वारा शत्रुसेनारूपी समुद्रको पार करना चाहता है॥ १६॥
अक्षेषु दोषा बहवो विधर्माः श्रुतास्त्वया सहदेवोऽब्रवीद् यान्। तान् नैषि त्वं त्यक्तुमसाधुजुष्टां- स्तेन स्म सर्वे निरयं प्रपन्नाः॥ १७॥ जूआ खेलनेमें बहुत-से पापमय दोष बताये गये हैं, जिन्हें सहदेवने तुझसे कहा था और तूने सुना भी था, तो भी तू उन दुर्जनसेवित दोषोंका परित्याग न कर सका; इसीसे हम सब लोग नरकतुल्य कष्टमें पड़ गये॥ १७॥
सुखं त्वत्तो नाभिजानीम किंचिद् यतस्त्वमक्षैर्देवितुं सम्प्रवृत्तः। स्वयं कृत्वा व्यसनं पाण्डव त्व- मस्मांस्तीव्राः श्रावयस्यद्य वाचः॥ १८॥ पाण्डुकुमार! तुझसे थोड़ा-सा भी सुख मिला हो—यह हम नहीं जानते हैं; क्योंकि तू जूआ खेलनेके व्यसनमें पड़ा हुआ है। स्वयं यह दुर्व्यसन करके अब तू हमें कठोर बातें सुना रहा है॥ १८॥
शेतेऽस्माभिर्निहता शत्रुसेना छिन्नैर्गात्रैर्भूतितले नदन्ती। त्वया हि तत् कर्म कृतं नृशंसं यस्माद् दोषःकौरवाणां वधश्च॥ १९॥ हमारे द्वारा मारी गयी शत्रुओंकी सेना अपने कटे हुए अंगोंके साथ पृथ्वीपर पड़ी-पड़ी कराह रही है। तूने वह क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, जिससे पाप तो होगा ही; कौरववंशका विनाश भी हो जायगा॥ १९॥
हता उदीच्या निहताः प्रतीच्या नष्टाः प्राच्या दाक्षिणात्या विशस्ताः। कृतं कर्माप्रतिरूपं महद्भि- स्तेषां योधैरस्मदीयैश्च युद्धे॥ २०॥
उत्तर दिशाके वीर मारे गये, पश्चिमके योद्धाओंका संहार हो गया, पूर्वदेशके क्षत्रिय नष्ट हो गये और दक्षिणदेशीय योद्धा काट डाले गये। शत्रुओंके और हमारे पक्षके बड़े-बड़े योद्धाओंने युद्धमें ऐसा पराक्रम किया है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ २० ॥ त्वं देवितात्वत्कृते राज्यनाश- स्त्वत्सम्भवं नो व्यसनं नरेन्द्र । मास्मान् क्रूरैर्वाक्प्रतोदैस्तुदंस्त्वं भूयो राजन् कोपयेस्त्वल्पभाग्यः ॥ २१ ॥ नरेन्द्र! तू भाग्यहीन जुआरी है। तेरे ही कारण हमारे राज्यका नाश हुआ और तुझसे ही हमें घोर संकटकी प्राप्ति हुई। राजन्! अब तू अपने वचनरूपी चाबुकोंसे हमें पीड़ा देते हुए फिर कुपित न कर ॥ २१ ॥
संजय उवाच
एता वाचः परुषाः सव्यसाची स्थिरप्रज्ञः श्रावयित्वा तु रूक्षाः । बभूवासौ विमना धर्मभीरुः कृत्वा प्राज्ञः पातकं किंचिदेवम् ॥ २२ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! सव्यसाची अर्जुन धर्मभीरु हैं। उनकी बुद्धि स्थिर है तथा वे उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न हैं। उस समय राजा युधिष्ठिरको वैसी रूखी और कठोर बातें सुनाकर वे ऐसे अनमने और उदास हो गये, मानो कोई पातक करके इस प्रकार पछता रहे हों ॥ २२ ॥ तदानुतेपे सुरराजपुत्रो विनिःश्वसंश्चासिमथोद्धबर्ह । तमाह कृष्णः किमिदं पुनर्भवान् विकोशमाकाशनिभं करोत्यसिम् ॥ २३ ॥ ब्रवीहि मां त्वं पुनरुत्तरं वच- स्तथा प्रवक्ष्याम्यहमर्थसिद्धये । देवराजकुमार अर्जुनको उस समय बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने लंबी साँस खींचते हुए फिरसे तलवार खींच ली। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'अर्जुन! यह क्या? तुम आकाशके समान निर्मल इस तलवारको पुनः क्यों म्यानसे बाहर निकाल रहे हो? तुम मुझे मेरी बातका उत्तर दो। मैं तुम्हारा अभीष्ट अर्थ सिद्ध करनेके लिये पुनः कोई योग्य उपाय बताऊँगा' ॥ २३ १/२ ॥ इत्येवमुक्तः पुरुषोत्तमेन सुदुःखितः केशवमर्जुनोऽब्रवीत् ॥ २४ ॥
अहं हनिष्ये स्वशरीरमेव प्रसह्य येनाहितमाचरं वै। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर अर्जुन अत्यन्त दुःखी हो उनसे इस प्रकार बोले—‘भगवन्! मैंने जिसके द्वारा हठपूर्वक भाईका अपमानरूप अहितकर कार्य कर डाला है, अपने उस शरीरको ही अब नष्ट कर डालूँगा’॥ २४ १/२ ॥
निशम्य तत् पार्थवचोऽब्रवीदिदं धनंजयं धर्मभृतां वरिष्ठः॥ २५॥ राजानमेनं त्वमितीदमुक्त्वा किं कश्मलं प्राविशः पार्थ घोरम्। त्वं चात्मानं हन्तुमिच्छस्वरिघ्न नेदं सद्भिः सेवितं वै किरीटिन्॥ २६॥ अर्जुनका यह वचन सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे कहा—‘पार्थ! राजा युधिष्ठिरको ‘तू’ ऐसा कहकर तुम इतने घोर दुःखमें क्यों डूब गये? शत्रुसूदन! क्या तुम आत्मघात करना चाहते हो? किरीटधारी वीर! साधुपुरुषोंने कभी ऐसा कार्य नहीं किया है॥ २५-२६॥
धर्मात्मानं भ्रातरं ज्येष्ठमद्य खड्गेन चैनं यदि हन्या नृवीर। धर्माद् भीतस्तत् कथं नाम ते स्यात् किंचोत्तरं वाकरिष्यस्त्वमेव॥ २७॥ ‘नरवीर! यदि आज धर्मसे डरकर तुमने अपने बड़े भाई इन धर्मात्मा युधिष्ठिरको तलवारसे मार डाला होता तो तुम्हारी कैसी दशा होती और इसके बाद तुम क्या करते?॥ २७॥
सूक्ष्मो धर्मो दुर्विदश्चापि पार्थ विशेषतोऽज्ञैः प्रोच्यमानं निबोध। हत्वाऽऽत्मानमात्मना प्राप्नुयास्त्वं वधाद् भ्रातुर्नरकं चातिघोरम्॥ २८॥ ‘कुन्तीनन्दन! धर्मका स्वरूप सूक्ष्म है। उसको जानना या समझना बहुत कठिन है। विशेषतः अज्ञानी पुरुषोंके लिये तो उसका जानना और भी मुश्किल है। अब मैं जो कुछ कहता हूँ उसे ध्यान देकर सुनो, भाईका वध करनेसे जिस अत्यन्त घोर नरककी प्राप्ति होती है, उससे भी भयानक नरक तुम्हें स्वयं ही अपनी हत्या करनेसे प्राप्त हो सकता है॥ २८॥
ब्रवीहि वाचाद्य गुणानिहात्मन- स्तथा हतात्मा भवितासि पार्थ। तथास्तु कृष्णेत्यभिनन्द्य तद्वचो
धनंजयः प्राह धनुर्विनाम्य ॥ २९ ॥
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठं
शृणुष्व राजन्निति शक्रसूनुः ।
‘अतः पार्थ! अब तुम यहाँ अपनी ही वाणीद्वारा अपने गुणोंका वर्णन करो। ऐसा करनेसे यह मान लिया जायगा कि तुमने अपने ही हाथों अपना वध कर लिया।’ यह सुनकर अर्जुनने उनकी बातका अभिनन्दन करते हुए कहा—‘श्रीकृष्ण! ऐसा ही हो’। फिर इन्द्रकुमार अर्जुन अपने धनुषको नवाकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले—‘राजन्! सुनिये ॥ २९ १/२ ॥
न मादृशोऽन्यो नरदेव विद्यते
धनुर्धरो देवमृते पिनाकिनम् ॥ ३० ॥
अहं हि तेनानुमतो महात्मना
क्षणेन हन्यां सचराचरं जगत् ।
‘नरदेव! पिनाकधारी भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कोई भी मेरे समान धनुर्धर नहीं है। उन महात्मा महेश्वरने मेरी वीरताका अनुमोदन किया है। मैं चाहूँ तो क्षणभरमें चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्को नष्ट कर डालूँ ॥ ३० १/२ ॥
मया हि राजन् सदिगीश्वरा दिशो
विजित्य सर्वा भवतः कृता वशे ॥ ३१ ॥
स राजसूयश्च समाप्तदक्षिणः
सभा च दिव्या भवतो ममौरसा ।
‘राजन्! मैंने सम्पूर्ण दिशाओं और दिक्पालोंको जीतकर आपके अधीन कर दिया था। पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त राजसूययज्ञका अनुष्ठान तथा आपकी दिव्य सभाका निर्माण मेरे ही बलसे सम्भव हुआ है ॥ ३१ १/२ ॥
पाणौ पृषत्का निशिता ममैव
धनुश्च सज्यं विततं सबाणम् ॥ ३२ ॥
पादौ च मे सरथौ सध्वजौ च
न मादृशं युद्धगतं जयन्ति ।
‘मेरे ही हाथमें तीखे तीर और बाण तथा प्रत्यंचासहित विशाल धनुष हैं। मेरे चरणोंमें रथ और ध्वजाके चिह्न हैं। मेरे-जैसा वीर यदि युद्धभूमिमें पहुँच जाय तो उसे शत्रु जीत नहीं सकते ॥ ३२ १/२ ॥
हता उदीच्या निहताः प्रतीच्याः
प्राच्या निरस्ता दाक्षिणात्या विशस्ताः ॥ ३३ ॥
संशप्तकानां किंचिदेवास्ति शिष्टं
सर्वस्य सैन्यस्य हतं मयार्धम् ।
शेते मया निहता भारतीयं
चमू राजन् देवचमूप्रकाशा ॥ ३४ ॥
‘मेरे द्वारा उत्तर दिशाके वीर मारे गये, पश्चिमके योद्धाओंका संहार हो गया, पूर्वदेशके क्षत्रिय नष्ट हो गये और दक्षिणदेशीय योद्धा काट डाले गये। संशप्तकोंका भी थोड़ा-सा ही भाग शेष रह गया है। मैंने सारी कौरव-सेनाके आधे भागको स्वयं ही नष्ट किया है। राजन्! देवताओंकी सेनाके समान प्रकाशित होनेवाली भरतवंशियोंकी यह विशाल वाहिनी मेरे ही हाथों मारी जाकर रणभूमिमें सो रही है ॥ ३३-३४ ॥
ये चास्त्रज्ञास्तानहं हन्मि चास्त्रै-
स्तस्माल्लोकांन्नेह करोमि भस्मसात् ।
जैत्रं रथं भीममास्थाय कृष्ण
यावः शीघ्रं सूतपुत्रं निहन्तुम् ॥ ३५ ॥
‘जो अस्त्रविद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको मैं अस्त्रोंद्वारा मारता हूँ; इसीलिये मैं यहाँ सम्पूर्ण लोकोंको भस्म नहीं करता हूँ। श्रीकृष्ण! अब हम दोनों विजयशाली एवं भयंकर रथपर बैठकर सूतपुत्रका वध करनेके लिये शीघ्र ही चल दें ॥ ३५ ॥
राजा भवत्वद्य सुनिर्वृतोऽयं
कर्णं रणे नाशयितास्मि बाणैः ।
इत्येवमुक्त्वा पुनराह पार्थो
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् ॥ ३६ ॥
‘आज ये राजा युधिष्ठिर संतुष्ट हों। मैं रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा कर्णका नाश कर डालूँगा।’ यों कहकर अर्जुन पुनः धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे बोले— ॥ ३६ ॥
अद्यापुत्रा सूतमाता भवित्री
कुन्ती वाथो वा मया तेन वापि ।
सत्यं वदाम्यद्य न कर्णमाजौ
शरैरहत्वा कवचं विमोक्ष्ये ॥ ३७ ॥
‘आज मेरेद्वारा सूतपुत्रकी माता पुत्रहीन हो जायगी अथवा मेरी माता कुन्ती ही कर्णके द्वारा मुझ एक पुत्रसे हीन हो जायगी। मैं सत्य कहता हूँ, आज युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा कर्णको मारे बिना मैं कवच नहीं उतारूँगा ॥ ३७ ॥
संजय उवाच
इत्येवमुक्त्वा पुनरेव पार्थो
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् ।
विमुच्य शस्त्राणि धनुर्विसृज्य
कोशे च खड्गं विनिधाय तूर्णम् ॥ ३८ ॥
स व्रीडया नम्रशिराः किरीटी युधिष्ठिरं प्राञ्जलिरभ्युवाच । प्रसीद राजन् क्षम यन्मयोक्तं काले भवान् वेत्स्यति तन्नमस्ते ॥ ३९ ॥ **संजय कहते हैं—**महाराज! किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुन धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे पुनः ऐसा कहकर शस्त्र खोल, धनुष नीचे डाल और तलवारको तुरंत ही म्यानमें रखकर लज्जासे नतमस्तक हो हाथ जोड़ पुनः उनसे इस प्रकार बोले—‘राजन्! आप प्रसन्न हों। मैंने जो कुछ कहा है, उसके लिये क्षमा करें। समयपर आपको सब कुछ मालूम हो जायगा। इसलिये आपको मेरा नमस्कार है’॥ ३९॥
प्रसाद्य राजानममित्रसाहं स्थितोऽब्रवीच्चैव पुनः प्रवीरः । नेदं चिरात् क्षिप्रमिदं भविष्य- त्यावर्ततेऽसावभियामि चैनम् ॥ ४० ॥ इस प्रकार शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ राजा युधिष्ठिरको प्रसन्न करके प्रमुख वीर अर्जुन खड़े होकर फिर बोले—‘महाराज! अब कर्णके वधमें देर नहीं है। यह कार्य शीघ्र ही होगा। वह इधर ही आ रहा है; अतः मैं भी उसीपर चढ़ाई कर रहा हूँ’॥ ४०॥
याम्येष भीमं समरात् प्रमोक्तुं सर्वात्मना सूतपुत्रं च हन्तुम् । तव प्रियार्थं मम जीवितं हि ब्रवीमि सत्यं तदवेहि राजन् ॥ ४१ ॥ ‘राजन्! मैं अभी भीमसेनको संग्रामसे छुटकारा दिलाने और सब प्रकारसे सूतपुत्र कर्णका वध करनेके लिये जा रहा हूँ। मेरा जीवन आपका प्रिय करनेके लिये ही है। यह मैं सत्य कहता हूँ। आप इसे अच्छी तरह समझ लें’॥ ४१॥
इति प्रयास्यन्नुपगृह्य पादौ समुत्थितो दीप्ततेजाः किरीटी । एतच्छ्रुत्वा पाण्डवो धर्मराजो भ्रातुर्वाक्यं परुषं फाल्गुनस्य ॥ ४२ ॥ उत्थाय तस्माच्छयनादुवाच पार्थं ततो दुःखपरीतचेताः । इस प्रकार जानेके लिये उद्यत हो राजा युधिष्ठिरके चरण छूकर उद्दीप्त तेजवाले किरीटधारी अर्जुन उठ खड़े हुए। इधर अपने भाई अर्जुनका पूर्वोक्तरूपसे कठोर वचन सुनकर पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर दुःखसे व्याकुलचित्त होकर उस शय्यासे उठ गये और अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ ४२ ½ ॥
कृतं मया पार्थ यथा न साधु येन प्राप्तं व्यसनं वः सुघोरम् ॥ ४३ ॥ तस्माच्छिरश्छिन्धि ममेदमाद्य कुलान्तकस्याधमपूरुषस्य । पापस्य पापव्यसनान्वितस्य विमूढबुद्धेरल्सस्य भीरोः ॥ ४४ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! अवश्य ही मैंने अच्छा कर्म नहीं किया है, जिससे तुमलोगोंपर अत्यन्त भयंकर संकट आ पड़ा है। मैं कुलान्तकारी नराधम पापी, पापमय दुर्व्यसनमें आसक्त, मूढ़बुद्धि, आलसी और डरपोक हूँ; इसलिये आज तुम मेरा यह मस्तक काट डालो ॥ ४३-४४ ॥ वृद्धावमन्तुः परुषस्य चैव किं ते चिरं मे ह्यनुसृत्य रूक्षम् । गच्छाम्यहं वनमेवाद्य पापः सुखं भवान् वर्ततां मद्विहीनः ॥ ४५ ॥ ‘मैं बड़े बूढ़ोंका अनादर करनेवाला और कठोर हूँ। तुम्हें मेरी रूखी बातोंका दीर्घकालतक अनुसरण करनेकी क्या आवश्यकता है। मैं पापी आज वनमें ही चला जा रहा हूँ। तुम मुझसे अलग होकर सुखसे रहो ॥ ४५ ॥ योग्यो राजा भीमसेनो महात्मा क्लीबस्य वा मम किं राज्यकृत्यम् । न चापि शक्तः परुषाणि सोढुं पुनस्तवेमानि रुषान्वितस्य ॥ ४६ ॥ ‘महामनस्वी भीमसेन सुयोग्य राजा होंगे। मुझ कायरको राज्य लेनेसे क्या काम है? अब पुनः मुझमें तुम्हारे रोषपूर्वक कहे हुए इन कठोर वचनोंको सहनेकी शक्ति नहीं है ॥ ४६ ॥ भीमोऽस्तु राजा मम जीवितेन न कार्यमद्यावमतस्य वीर । इत्येवमुक्त्वा सहसोत्पपात राजा ततस्तच्छयनं विहाय ॥ ४७ ॥ इयेष निर्गन्तुमथो वनाय तं वासुदेवः प्रणतोऽभ्युवाच ॥ ४८ ॥ ‘वीर! भीमसेन राजा हों। आज इतना अपमान हो जानेपर मुझे जीवित रहनेकी आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर सहसा पलंग छोड़कर वहाँसे नीचे कूद
पड़े और वनमें जानेकी इच्छा करने लगे। तब भगवान् श्रीकृष्णने उनके चरणोंमें प्रणाम करके इस प्रकार कहा।।
राजन् विदितमेतद् वै यथा गाण्डीवधन्वनः । प्रतिज्ञा सत्यसंधस्य गाण्डीवं प्रति विश्रुता ॥ ४९ ॥
‘राजन्! आपको तो यह विदित ही है कि गाण्डीवधारी सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनने गाण्डीव धनुषके विषयमें कैसी प्रतिज्ञा कर रखी है? उनकी वह प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है ।।
ब्रूयाद् य एवं गाण्डीवमन्यस्मै देयमित्युत । वध्योऽस्य स पुमाँल्लोके त्वया चोक्तोऽयमीदृशम् ॥ ५० ॥
‘जो अर्जुनसे यह कह दे कि ‘तुम्हें अपना गाण्डीवधनुष दूसरेको दे देना चाहिये’ वह मनुष्य इस जगत्में उनका वध्य है।’ आपने आज अर्जुनसे ऐसी ही बात कह दी है ।।
ततः सत्यां प्रतिज्ञां तां पार्थेन प्रतिरक्षता । मच्छन्दादवमानोऽयं कृतस्तव महीपते ॥ ५१ ॥ गुरूणामवमानो हि वध इत्यभिधीयते ।
‘अतः भूपाल! अर्जुनने अपनी उस सच्ची प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए मेरी आज्ञासे आपका यह अपमान किया; क्योंकि गुरुजनोंका अपमान ही उनका वध कहा जाता है ।।
तस्मात् त्वं वै महाबाहो मम पार्थस्य चोभयोः ॥ ५२ ॥ व्यतिक्रममिमं राजन् सत्यसंरक्षणं प्रति ।
‘इसलिये महाबाहो! राजन्! मेरे और अर्जुन दोनोंके सत्यकी रक्षाके लिये किये गये इस अपराधको आप क्षमा करें ।। ५२ १/२ ।।
शरणं त्वां महाराज प्रपन्नौ स्व उभावपि ॥ ५३ ॥ क्षन्तुमर्हसि मे राजन् प्रणतस्याभियाचतः ।
‘महाराज! हम दोनों आपकी शरणमें आये हैं और मैं चरणोंमें गिरकर आपसे क्षमा-याचना करता हूँ; आप मेरे अपराधको क्षमा करें ।। ५३ १/२ ।।
राधेयस्याद्य पापस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ५४ ॥ सत्यं ते प्रतिजानामि हतं विद्ध्यद्य सूतजम् । यस्येच्छसि वधं तस्य गतमप्यस्य जीवितम् ॥ ५५ ॥
‘आज पृथ्वी पापी राधापुत्र कर्णके रक्तका पान करेगी। मैं आपसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, समझ लीजिये कि अब सूतपुत्र कर्ण मार दिया गया। आप जिसका वध चाहते हैं, उसका जीवन समाप्त हो गया’ ।।
इति कृष्णवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । ससम्भ्रमं हृषीकेशमुत्थाप्य प्रणतं तदा ॥ ५६ ॥ कृताञ्जलिस्ततो वाक्यमुवाचानन्तरं वचः ।
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने चरणोंमें पड़े हुए हृषीकेशको वेगपूर्वक उठाकर फिर दोनों हाथ जोड़कर यह बात कही— ।।
एवमेव यथाऽऽत्थ त्वमस्येषोऽतिक्रमो मम ।। ५७ ।।
अनुनीतोऽस्मि गोविन्द तारितश्चास्मि माधव ।
मोचिता व्यसनाद् घोराद् वयमद्य त्वयाच्युत ।। ५८ ।।
‘गोविन्द! आप जैसा कहते हैं, वह ठीक है। वास्तवमें मुझसे यह नियमका उल्लंघन हो गया है। माधव! आपने अनुनयद्वारा मुझे संतुष्ट कर दिया और संकटके समुद्रमें डूबनेसे बचा लिया। अच्युत! आज आपके द्वारा हमलोग घोर विपत्तिसे बच गये ।। ५७-५८ ।।
भवन्तं नाथमासाद्य ह्यावां व्यसनसागरात् ।
घोरादद्य समुत्तीर्णावुभावज्ञानमोहितौ ।। ५९ ।।
त्वद्बुद्धिप्लवमासाद्य दुःखशोकार्णवाद् वयम् ।
समुत्तीर्णाः सहामात्याः सनाथाः स्म त्वयाच्युत ।। ६० ।।
‘आज आपको अपना रक्षक पाकर हम दोनों संकटके भयानक समुद्रसे पार हो गये। हम दोनों ही अज्ञानसे मोहित हो रहे थे; परंतु आपकी बुद्धिरूपी नौकाका आश्रय लेकर दुःख-शोकके समुद्रसे मन्त्रियोंसहित पार हो गये। अच्युत! हम आपसे ही सनाथ हैं’ ।। ५९-६० ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरसमाश्वासने सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2158)
एकसप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश, अर्जुन और युधिष्ठिरका प्रसन्नतापूर्वक मिलन एवं अर्जुनद्वारा कर्णवधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरका आशीर्वाद
संजय उवाच
धर्मराजस्य तच्छ्रुत्वा प्रीतियुक्तं वचस्ततः ।
पार्थं प्रोवाच धर्मात्मा गोविन्दो यदुनन्दनः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! धर्मराजके मुखसे यह प्रेमपूर्ण वचन सुनकर यदुकुलको आनन्दित करनेवाले धर्मात्मा गोविन्द अर्जुनसे कुछ कहने लगे ॥ १ ॥
इति स्म कृष्णवचनात् प्रत्युच्चार्य युधिष्ठिरम् ।
बभूव विमनाः पार्थः किंचित् कृत्वेव पातकम् ॥ २ ॥
अर्जुन श्रीकृष्णके कहनेसे युधिष्ठिरके प्रति जो तिरस्कारपूर्ण वचन बोले थे, इसके कारण वे मन-ही-मन ऐसे उदास हो गये थे मानो कोई पाप कर बैठे हों ॥
ततोऽब्रवीद् वासुदेवः प्रहसन्निव पाण्डवम् ।
कथं नाम भवेदेतद् यदि त्वं पार्थ धर्मजम् ॥ ३ ॥
असिना तीक्ष्णधारेण हन्या धर्मे व्यवस्थितम् ।
त्वमित्युक्त्वाथ राजानमेवं कश्मलमाविशः ॥ ४ ॥
उनकी यह अवस्था देख भगवान् श्रीकृष्ण हँसते हुए-से उन पाण्डुकुमारसे बोले—'पार्थ! तुम तो राजाके प्रति केवल 'तू' कह देनेमात्रसे ही इस प्रकार शोकमें डूब गये हो। फिर यदि धर्ममें स्थित रहनेवाले धर्मकुमार युधिष्ठिरको तीखी धारवाले तलवारसे मार डालते, तब तुम्हारी दशा कैसी हो जाती? ॥ ३-४ ॥
हत्वा तु नृपतिं पार्थ अकरिष्यः किमुत्तरम् ।
एवं हि दुर्विदो धर्मो मन्दप्रज्ञैर्विशेषतः ॥ ५ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम राजाका वध करनेके पश्चात् क्या करते? इस तरह धर्मका स्वरूप सभीके लिये दुर्विज्ञेय है। विशेषतः उन लोगोंके लिये, जिनकी बुद्धि मन्द है, उसके सूक्ष्म स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है ॥ ५ ॥
स भवान् धर्मभीरुत्वाद् ध्रुवमैष्यन्महत्तमः ।
नरकं घोररूपं च भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वै वधात् ॥ ६ ॥
'अतः तुम धर्मभीरु होनेके कारण अपने ज्येष्ठ भाईके वधसे निश्चय ही घोर नरकरूप महान् अन्धकार (दुःख)-में डूब जाते ॥ ६ ॥
स त्वं धर्मभृतां श्रेष्ठं राजानं धर्मसंहितम् । प्रसादय कुरुश्रेष्ठमेतदत्र मतं मम ॥ ७ ॥ ‘इसलिये इस विषयमें मेरा विचार यह है कि तुम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपरायण कुरुश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरको प्रसन्न करो ॥ ७ ॥
प्रसाद्य भक्त्या राजानं प्रीते चैव युधिष्ठिरे । प्रयावस्त्वरितौ योद्धुं सूतपुत्ररथं प्रति ॥ ८ ॥ ‘राजा युधिष्ठिरको भक्तिभावसे प्रसन्न कर लो। जब वे प्रसन्न हो जायँ, तब हमलोग तुरंत ही युद्धके लिये सूतपुत्रके रथपर चढ़ाई करेंगे ॥ ८ ॥
हत्वा तु समरे कर्णं त्वमद्य निशितैः शरैः । विपुलां प्रीतिमाधत्स्व धर्मपुत्रस्य मानद ॥ ९ ॥ ‘मानद! आज तुम तीखे बाणोंसे समरभूमिमें कर्णका वध करके धर्मपुत्र युधिष्ठिरके हृदयमें अत्यन्त हर्षोल्लास भर दो ॥ ९ ॥
एतदत्र महाबाहो प्राप्तकालं मतं मम । एवं कृते कृतं चैव तव कार्यं भविष्यति ॥ १० ॥ ‘महाबाहो! मुझे तो इस समय यहाँ यही करना उचित जान पड़ता है। ऐसा कर लेनेपर तुम्हारा सारा कार्य सम्पन्न हो जायगा’ ॥ १० ॥
ततोऽर्जुनो महाराज लज्जया वै समन्वितः । धर्मराजस्य चरणौ प्रपद्य शिरसा नतः ॥ ११ ॥ उवाच भरतश्रेष्ठं प्रसीदेति पुनः पुनः । क्षमस्व राजन् यत्र प्रोक्तं धर्मकामेन भीरुणा ॥ १२ ॥ ‘महाराज! तब अर्जुन लज्जित हो धर्मराजके चरणोंमें गिरकर मस्तक नवाकर उन भरतश्रेष्ठ नरेशसे बारंबार बोले—‘राजन्! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये। मैंने धर्मपालनकी इच्छासे भयभीत होकर जो अनुचित वचन कहा है, उसके लिये क्षमा कीजिये’ ॥ ११-१२ ॥
दृष्ट्वा तु पतितं पद्भ्यां धर्मराजो युधिष्ठिरः । धनंजयमित्रघ्नं रुदन्तं भरतर्षभ ॥ १३ ॥ उत्थाय भ्रातरं राजा धर्मराजो धनंजयम् । समाश्लिष्य च सस्नेहं प्ररुरोद महीपतिः ॥ १४ ॥ भरतश्रेष्ठ! धर्मराज युधिष्ठिरने शत्रुसूदन, भाई धनंजयको अपने चरणोंपर गिरकर रोते देख बड़े स्नेहसे उठाकर हृदयसे लगा लिया। फिर वे भूपाल धर्मराज भी फूट-फूटकर रोने लगे ॥ १३-१४ ॥
रुदित्वा सुचिरं कालं भ्रातरौ सुमहाद्युती । कृतशौचौ महाराज प्रीतिमन्तौ बभूवतुः ॥ १५ ॥
महाराज! वे दोनों महातेजस्वी भाई दीर्घकालतक रोते रहे। इससे उनके मनकी मैल धुल गयी और वे दोनों भाई परस्पर प्रेमसे भर गये ॥ १५ ॥
तत आश्लिष्य तं प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय पाण्डवः ।
प्रीत्या परमया युक्तो विस्मयंश्च पुनः पुनः ॥ १६ ॥
अब्रवीत् तं महेष्वासं धर्मराजो धनंजयम् ।
तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न हो बारंबार मुसकराते हुए पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने महाधनुर्धर धनंजयको बड़े प्रेमसे हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा और उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १६ १/२ ॥
कर्णेन मे महाबाहो सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ १७ ॥
कवचं च ध्वजं चैव धनुः शक्तिर्हयाः शराः ।
शरैः कृत्ता महेष्वास यतमानस्य संयुगे ॥ १८ ॥
'महाधनुर्धर! महाबाहो! मैं युद्धमें यत्नपूर्वक लगा हुआ था, किंतु कर्णने सारी सेनाके देखते-देखते अपने बाणोंद्वारा मेरे कवच, ध्वज, धनुष, शक्ति, घोड़े और बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले हैं' ॥ १७-१८ ॥
सोऽहं ज्ञात्वा रणे तस्य कर्म दृष्ट्वा च फाल्गुन ।
व्यवसीदामि दुःखेन न च मे जीवितं प्रियम् ॥ १९ ॥
'फाल्गुन! रणभूमिमें उसके इस कर्मको देख और समझकर मैं दुःखसे पीड़ित हो रहा हूँ। मुझे अपना जीवन प्रिय नहीं रह गया है ॥ १९ ॥
न चेदद्य हि तं वीरं निहनिष्यसि संयुगे ।
प्राणानेव परित्यक्ष्ये जीवितार्थो हि को मम ॥ २० ॥
'यदि आज युद्धस्थलमें तुम वीर कर्णका वध नहीं करोगे तो मैं अपने प्राणोंका ही परित्याग कर दूँगा। फिर मेरे जीवनका प्रयोजन ही क्या है?' ॥ २० ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच विजयो भरतर्षभ ।
सत्येन ते शपे राजन् प्रसादेन तथैव च ।
भीमेन च नरश्रेष्ठ यमाभ्यां च महीपते ॥ २१ ॥
यथाद्य समरे कर्णं हनिष्यामि हतोऽपि वा ।
महीतले पतिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उत्तर दिया—'राजन्! नरश्रेष्ठ महीपाल! मैं आपसे सत्यकी, आपके कृपापूर्ण प्रसादकी, भीमसेनकी तथा नकुल और सहदेवकी शपथ खाकर सत्यके द्वारा अपने धनुषको छूकर कहता हूँ कि आज समरमें या तो कर्णको मार डालूँगा या स्वयं ही मारा जाकर पृथ्वीपर गिर जाऊँगा' ॥ २१-२२ ॥
एवमाभाष्य राजानमब्रवीन्माधवं वचः ।
अद्य कर्णं रणे कृष्ण सूदयिष्ये न संशयः ॥ २३ ॥
तव बुद्ध्या हि भद्रं ते वधस्तस्य दुरात्मनः ।
राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले—'श्रीकृष्ण! आज रणभूमिमें मैं कर्णका वध करूँगा, इसमें संशय नहीं है। आपका कल्याण हो। आपकी बुद्धिसे ही उस दुरात्माका वध होगा' ॥ २३ ½ ॥
एवमुक्तोऽब्रवीत् पार्थं केशवो राजसत्तम ॥ २४ ॥
शक्तोऽसि भरतश्रेष्ठ हन्तुं कर्णं महाबलम् ।
एष चापि हि मे कामो नित्यमेव महारथ ॥ २५ ॥
कथं भवान् रणे कर्णं निहन्यादिति सत्तम ।
नृपश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—'भरतश्रेष्ठ! तुम महाबली कर्णका वध करनेमें समर्थ हो। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महारथी वीर! मेरे मनमें भी सदा यही इच्छा बनी रहती है कि तुम रणभूमिमें कर्णको किसी तरह मार डालो' ॥ २४-२५ ½ ॥
भूयश्चोवाच मतिमान् माधवो धर्मनन्दनम् ॥ २६ ॥
युधिष्ठिरेमं बीभत्सुं त्वं सान्त्वयितुमर्हसि ।
अनुज्ञातुं च कर्णस्य वधायाद्य दुरात्मनः ॥ २७ ॥
फिर बुद्धिमान् भगवान् माधवने धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा—'महाराज! आप अर्जुनको सान्त्वना और दुरात्मा कर्णके वधके लिये आज्ञा प्रदान करें ॥
श्रुत्वा ह्यहमयं चैव त्वां कर्णशरपीडितम् ।
प्रवृत्तिं ज्ञातुमायाताविहावां पाण्डुनन्दन ॥ २८ ॥
'पाण्डुनन्दन! राजन्! आप कर्णके बाणोंसे बहुत पीड़ित हो गये हैं—यह सुनकर मैं और ये अर्जुन दोनों आपका समाचार जाननेके लिये यहाँ आये थे ॥ २८ ॥
दिष्ट्यासि राजन् न हतो दिष्ट्या न ग्रहणं गतः ।
परिसान्त्वय बीभत्सुं जयमाशाधि चानघ ॥ २९ ॥
'निष्पाप नरेश! सौभाग्यकी बात है कि (कर्णके द्वारा) न तो आप मारे गये और न पकड़े ही गये। अब आप अर्जुनको सान्त्वना दें और उन्हें विजयके लिये आशीर्वाद प्रदान करें' ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
एह्योहि पार्थ बीभत्सो मां परिष्वज पाण्डव ।
वक्तव्यमुक्तोऽस्मि हितं त्वया क्षान्तं च तन्मया ॥ ३० ॥
**युधिष्ठिर बोले—**कुन्तीनन्दन! बीभत्सो! आओ, आओ! पाण्डुकुमार! मेरे हृदयसे लग जाओ। तुमने तो मेरे प्रति कहनेयोग्य और हितकी ही बात कही है तथा मैंने उसके लिये क्षमा भी कर दी ॥ ३० ॥
अहं त्वामनुजानामि जहि कर्णं धनंजय ।
मन्युं च मा कृथाः पार्थ यन्मयोक्तोऽसि दारुणम् ॥ ३१ ॥
धनंजय! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, कर्णका वध करो। पार्थ! मैंने जो तुमसे कठोर वचन कहा है, उसके लिये खेद न करना ॥ ३१ ॥
संजय उवाच
ततो धनंजयो राजञ्शिरसा प्रणतस्तदा ।
पादौ जग्राह पाणिभ्यां भ्रातुर्ज्येष्ठस्य मारिष ॥ ३२ ॥
संजय कहते हैं—माननीय नरेश! तब धनंजयने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और दोनों हाथोंसे बड़े भाईके पैर पकड़ लिये ॥ ३२ ॥
तमुत्थाप्य ततो राजा परिष्वज्य च पीडितम् ।
मूर्ध्युपाघ्राय चैवैनमिदं पुनरुवाच ह ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् राजाने मन-ही-मन पीड़ाका अनुभव करनेवाले अर्जुनको उठाकर छातीसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघकर पुनः उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३३ ॥
धनंजय महाबाहो मानितोऽस्मि दृढं त्वया ।
माहात्म्यं विजयं चैव भूयः प्राप्नुहि शाश्वतम् ॥ ३४ ॥
‘महाबाहु धनंजय! तुमने मेरा बड़ा सम्मान किया है; अतः तुम्हारी महिमा बढ़े और तुम्हें पुनः सनातन विजय प्राप्त हो’ ॥ ३४ ॥
अर्जुन उवाच
अद्य तं पापकर्माणं सानुबन्धं रणे शरैः ।
नयाम्यन्तं समासाद्य राधेयं बलगर्वितम् ॥ ३५ ॥
अर्जुन बोले—महाराज! आज मैं अपने बलका घमंड रखनेवाले उस पापाचारी राधापुत्र कर्णको रणभूमिमें पाकर उसके सगे-सम्बन्धियोंसहित मृत्युके समीप भेज दूँगा ॥ ३५ ॥
येन त्वं पीडितो बाणैर्दृढमायम्य कार्मुकम् ।
तस्याद्य कर्मणः कर्णः फलमाप्स्यति दारुणम् ॥ ३६ ॥
राजन्! जिसने धनुषको दृढ़तापूर्वक खींचकर अपने बाणोंद्वारा आपको पीड़ित किया है, वह कर्ण आज अपने उस पापकर्मका अत्यन्त भयंकर फल पायेगा ॥ ३६ ॥
अद्य त्वामनुपश्यामि कर्णं हत्वा महीपते ।
सभाजयितुमाक्रन्दादिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३७ ॥
भूपाल! आज मैं कर्णको मारकर ही आपका दर्शन करूँगा और युद्धस्थलसे आपका अभिनन्दन करनेके लिये आऊँगा। यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ ॥ ३७ ॥
नाहत्वा विनिवर्तिष्ये कर्णमद्य रणाजिरात् ।
इति सत्येन ते पादौ स्पृशामि जगतीपते ॥ ३८ ॥
पृथ्वीपते! आज मैं कर्णको मारे बिना समरांगणसे नहीं लौटूँगा। इस सत्यके द्वारा मैं आपके दोनों चरण छूता हूँ।।
संजय उवाच
इति ब्रुवाणं सुमनाः किरीटिनं युधिष्ठिरः प्राह वचो बृहत्तरम् । यशोऽक्षयं जीवितमीप्सितं ते जयं सदा वीर्यमरिक्षयं तदा ।। ३९ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! ऐसी बातें कहनेवाले किरीटधारी अर्जुनसे युधिष्ठिरने प्रसन्नचित्त होकर यह महत्त्वपूर्ण बात कही—'वीर! तुम्हें अक्षय यश, पूर्ण आयु, मनोवांछित कामना, विजय तथा शत्रुनाशक पराक्रम—ये सदा प्राप्त होते रहें ।। ३९ ।।
प्रयाहि वृद्धिं च दिशन्तु देवता यथाहमिच्छामि तवास्तु तत् तथा । प्रयाहि शीघ्रं जहि कर्णमाहवे पुरंदरो वृत्रमिवात्मवृद्धये ।। ४० ।।
'जाओ, देवता तुम्हें अभ्युदय प्रदान करें। मैं तुम्हारे लिये जैसा चाहता हूँ, वैसा ही सब कुछ तुम्हें प्राप्त हो। आगे बढ़ो और युद्धस्थलमें शीघ्र ही कर्णको मार डालो। ठीक उसी तरह, जैसे देवराज इन्द्रने अपने ही ऐश्वर्यकी वृद्धिके लिये वृत्रासुरका नाश किया था' ।। ४० ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनप्रतिज्ञायामेकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनका प्रतिज्ञाविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2164)
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना
संजय उवाच
प्रसाद्य धर्मराजानं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
पार्थः प्रोवाच गोविन्दं सूतपुत्रवधोद्यतः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिरको प्रसन्न करके अर्जुन सूतपुत्र कर्णका वध करनेके लिये उद्यत हो प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णसे बोले— ॥ १ ॥
कल्पतां मे रथो भूयो युज्यन्तां च हयोत्तमाः ।
आयुधानि च सर्वाणि सज्जन्तां मे महारथे ॥ २ ॥
उपावृत्ताश्च तुरगाः शिक्षिताश्चाश्वसादिभिः ।
रथोपकरणैः सज्जा उपायान्तु त्वरान्विताः ॥ ३ ॥
प्रयाहि शीघ्रं गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया ।
‘गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायँ। अश्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये’ ॥ २-३ ½ ॥
एवमुक्तो महाराज फाल्गुनेन महात्मना ॥ ४ ॥
उवाच दारुकं कृष्णः कुरु सर्वं यथाब्रवीत् ।
अर्जुनो भरतश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ ५ ॥
महाराज! महात्मा अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकसे कहा—‘सारथे! समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ भरतभूषण अर्जुनने जैसा कहा है, उसके अनुसार सारी तैयारी करो’ ॥ ४-५ ॥
आज्ञप्तस्त्वथ कृष्णेन दारुको राजसत्तम ।
योजयामास स रथं वैयाघ्रं शत्रुतापनम् ॥ ६ ॥
सज्जं निवेदयामास पाण्डवस्य महात्मनः ।
नृपश्रेष्ठ! श्रीकृष्णके इस प्रकार आदेश देनेपर दारुकने व्याघ्र-चर्मसे आच्छादित तथा शत्रुओंको तपानेवाले रथको जोतकर तैयार कर दिया और महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आकर निवेदन किया कि ‘आपका रथ सब सामग्रियोंसे सुसज्जित है’ ॥ ६ ½ ॥
युक्तं तु तं रथं दृष्ट्वा दारुकेण महात्मना ॥ ७ ॥
आपृच्छ्य धर्मराजानं ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । सुमङ्गलस्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम् ॥ ८ ॥ महामना दारुकके द्वारा जोतकर लाये हुए उस रथको देखकर अर्जुन धर्मराजसे आज्ञा ले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कल्याणके आश्रयभूत उस परम मंगलमय उत्तम रथपर आरूढ हुए ॥ ७-८ ॥
तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिरः । आशिषोऽयुङ्क्त स ततः प्रायात् कर्णरथं प्रति ॥ ९ ॥ उस समय महाबुद्धिमान् धर्मराज राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको आशीर्वाद दिये। तत्पश्चात् उन्होंने कर्णके रथकी ओर प्रस्थान किया ॥ ९ ॥
तमायान्तं महेष्वासं दृष्ट्वा भूतानि भारत । निहतं मेनिरे कर्णं पाण्डवेन महात्मना ॥ १० ॥ भारत! महाधनुर्धर अर्जुनको आते देख समस्त प्राणियोंको यह विश्वास हो गया कि अब कर्ण महामनस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे अवश्य मारा जायगा ॥ १० ॥
बभूवुर्विमलाः सर्वा दिशो राजन् समन्ततः । चाषाश्च शतपत्राश्च क्रौञ्चाश्चैव जनेश्वर ॥ ११ ॥ प्रदक्षिणमकुर्वन्त तदा वै पाण्डुनन्दनम् । राजन्! सम्पूर्ण दिशाएँ सब ओरसे निर्मल हो गयी थीं। नरेश्वर! नीलकण्ठ, सारस और क्रौंच पक्षी पाण्डुनन्दन अर्जुनको दाहिने रखते हुए जाने लगे ॥ ११ १/२ ॥
बहवः पक्षिणो राजन् पुन्नामानः शुभाः शिवाः ॥ १२ ॥ त्वरयन्तोऽर्जुनं युद्धे हृष्टरूपा ववाशिरे । राजन्! पुरुष जातिवाले बहुत-से शुभकारक मंगलदायक पक्षी अर्जुनको युद्धके लिये उतावले करते हुए बड़े हर्षमें भरकर चहचहा रहे थे ॥ १२ १/२ ॥
कङ्का गृध्रा बकाः श्येना वायसाश्च विशाम्पते ॥ १३ ॥ अग्रतस्तस्य गच्छन्ति मांसहेतोर्भयानकाः । प्रजानाथ! कंक, गृध्र, बक, बाज और कौए आदि भयानक पक्षी मांसके लिये उनके आगे-आगे जा रहे थे ॥
निमित्तानि च धन्यानि पाण्डवस्य शशंसिरे ॥ १४ ॥ विनाशमरिसैन्यानां कर्णस्य च वधं प्रति । इस प्रकार बहुत-से शुभ शकुन पाण्डुपुत्र अर्जुनको उनके शत्रुओंके विनाश तथा कर्णके वधकी सूचना दे रहे थे ॥ १४ १/२ ॥
प्रयातस्याथ पार्थस्य महान् स्वेदो व्यजायत ॥ १५ ॥ चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं चेदं भविष्यति ।
युद्धके लिये प्रस्थान करनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनके शरीरमें बड़े जोरसे पसीना छूटने लगा तथा मन-ही-मन भारी चिन्ता होने लगी कि 'यह सब कैसे होगा?' ॥ १५½ ॥ ततो गाण्डीवधन्वानमब्रवीन्मधुसूदनः ॥ १६ ॥ दृष्ट्वा पार्थं तथा यान्तं चिन्तापरिगतं तदा । रथमें बैठकर चलते समय गाण्डीवधारी अर्जुनको चिन्तामग्न देख भगवान् श्रीकृष्णने उनसे इस प्रकार कहा ।।
वासुदेव उवाच गाण्डीवधन्वन् संग्रामे ये त्वया धनुषा जिताः ॥ १७ ॥ न तेषां मानुषो जेता त्वदन्य इह विद्यते । श्रीकृष्ण बोले—गाण्डीवधारी अर्जुन! तुमने अपने धनुषसे जिन-जिन वीरोंपर विजय पायी है, उन्हें जीतनेवाला इस संसारमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य नहीं है ॥ १७½ ॥ दृष्ट्वा हि बहवः शूराः शक्रतुल्यपराक्रमाः ॥ १८ ॥ त्वां प्राप्य समरे शूरं ते गताः परमां गतिम् । मैंने देखा है इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत-से शूरवीर समरांगणमें तुझ शौर्यसम्पन्न वीरके पास आकर परम गतिको प्राप्त हो गये ॥ १८½ ॥ को हि द्रोणं च भीष्मं च भगदत्तं च मारिष ॥ १९ ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजं च सुदक्षिणम् । श्रुतायुषं महावीर्यमच्युतायुषमेव च । प्रत्युद्गम्य भवेत् क्षेमी यो न स्यात् त्वमिव प्रभो ॥ २० ॥ प्रभो! आर्य! जो तुम्हारे-जैसा वीर न हो, ऐसा कौन पुरुष द्रोणाचार्य, भीष्म, भगदत्त, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण, महापराक्रमी श्रुतायु तथा अच्युतायुका सामना करके सकुशल रह सकता था ।। तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि लाघवं बलमेव च । असंमोहश्च युद्धेषु विज्ञानस्य च संततिः ॥ २१ ॥ वेधः पातश्च लक्ष्येषु योगश्चैव तथार्जुन । भवान् देवान् सगन्धर्वान् हन्यात् सह चराचरान् ॥ २२ ॥ तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र हैं, तुममें फुर्ती है, बल है, युद्धके समय तुम्हें घबराहट नहीं होती, तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका विस्तृत ज्ञान है तथा लक्ष्यको वेधने तथा गिरानेकी कला ज्ञात है। अर्जुन! लक्ष्यको वेधते समय तुम्हारा चित्त एकाग्र रहता है। गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा चराचर प्राणियोंको तुम एक साथ मार सकते हो ॥ २१-२२ ॥ पृथिव्यां तु रणे पार्थ न योद्धा त्वत्समः पुमान् । धनुर्ग्राहा हि ये केचित् क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ २३ ॥
आ देवात् त्वत्समं तेषां न पश्यामि शृणोमि च ।
कुन्तीकुमार! इस भूमण्डलपर दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान योद्धा नहीं है। यहाँसे देवलोकतक धनुष धारण करनेवाले जो कोई भी रणदुर्मद क्षत्रिय हैं, उनमेंसे किसीको भी मैं तुम्हारे समान न तो देखता हूँ और न सुनता ही हूँ ॥
ब्रह्मणा च प्रजाः सृष्ट्वा गाण्डीवं च महत् धनुः ॥ २४ ॥
येन त्वं युध्यसे पार्थ तस्मान्नास्ति त्वया समः ।
पार्थ! ब्रह्माजीने सम्पूर्ण प्रजाकी सृष्टि की है और उन्होंने ही उस विशाल धनुष गाण्डीवकी भी रचना की है, जिसके द्वारा तुम युद्ध करते हो; अतः तुम्हारी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २४ १/२ ॥
अवश्यं तु मया वाच्यं यत् पथ्यं तव पाण्डव ॥ २५ ॥
मावमंस्था महाबाहो कर्णमाहवशोभिनम् ।
पाण्डुनन्दन! तो भी जो बात तुम्हारे लिये हितकर हो, उसे बता देना मैं आवश्यक समझता हूँ। महाबाहो! संग्राममें शोभा पानेवाले कर्णकी अवहेलना न करना ॥
कर्णो हि बलवान् दृप्तः कृतास्त्रश्च महारथः ॥ २६ ॥
कृती च चित्रयोधी च देशकालस्य कोविदः ।
क्योंकि कर्ण बलवान्, अभिमानी, अस्त्रविद्याका विद्वान्, महारथी, युद्धकुशल, विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाला तथा देशकालको समझनेवाला है ॥ २६ १/२ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपाच्छृणु पाण्डव ॥ २७ ॥
त्वत्समं त्वद्विशिष्टं वा कर्णं मन्ये महारथम् ।
परमं यत्नमास्थाय त्वया वध्यो महाहवे ॥ २८ ॥
पाण्डुनन्दन! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, संक्षेपसे ही सुन लो। मैं महारथी कर्णको तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर मानता हूँ। अतः महासमरमें महान् प्रयत्न करके तुम्हें उसका वध करना होगा ॥ २७-२८ ॥
तेजसा वह्निसदृशो वायुवेगसमो जवे ।
अन्तकप्रतिमः क्रोधे सिंहसंहननो बली ॥ २९ ॥
कर्ण तेजमें अग्निके सदृश, वेगमें वायुके समान, क्रोधमें यमराजके तुल्य, सुदृढ़ शरीरमें सिंहके सदृश तथा बलवान् है ॥ २९ ॥
अष्टरत्निर्महाबाहुर्व्यूढोरस्कः सुदुर्जयः ।
अभिमानी च शूरश्च प्रवीरः प्रियदर्शनः ॥ ३० ॥
उसके शरीरकी ऊँचाई आठ रत्नि* (एक सौ अड़सठ अंगुल) है। उसकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है। उसे जीतना अत्यन्त कठिन है। वह अभिमानी, शौर्यसम्पन्न, प्रमुख वीर और प्रियदर्शन (सुन्दर) है ॥
सर्वयोधगुणैर्युक्तो मित्राणामभयंकरः ।
सततं पाण्डवद्वेषी धार्तराष्ट्रहिते रतः ॥ ३१ ॥
उसमें योद्धाओंके सभी गुण हैं। वह अपने मित्रोंको अभय देनेवाला है तथा दुर्योधनके हितमें तत्पर रहकर पाण्डवोंसे सदा द्वेष रखता है ॥ ३१ ॥
सर्वैरवध्यो राधेयो देवैरपि सवासवैः ।
ऋते त्वामिति मे बुद्धिस्तदद्य जहि सूतजम् ॥ ३२ ॥
मेरा तो ऐसा विचार है कि राधापुत्र कर्ण तुम्हें छोड़कर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अवध्य है; अतः तुम आज सूतपुत्रका वध करो ॥ ३२ ॥
देवैरपि हि संयत्तैर्बिभ्रद्भिर्मांसशोणितम् ।
अशक्यः स रथो जेतुं सर्वैरपि युयुत्सभिः ॥ ३३ ॥
समस्त देवता भी यदि रक्त-मांसयुक्त शरीरको धारण करके युद्धकी अभिलाषा लेकर विजयके लिये प्रयत्नशील हो रणभूमिमें आ जायँ तो उनके लिये रथसहित कर्णको जीतना असम्भव है ॥ ३३ ॥
दुरात्मानं पापवृत्तं नृशंसं
दुष्टप्रज्ञं पाण्डवेयेषु नित्यम् ।
हीनस्वार्थं पाण्डवेयैर्विरोधे
हत्वा कर्णं निश्चितार्थो भवाद्य ॥ ३४ ॥
अतः आज तुम दुरात्मा, पापाचारी, क्रूर, पाण्डवोंके प्रति सदा दुर्भावना रखनेवाले और किसी स्वार्थके बिना ही पाण्डव-विरोधमें तत्पर हुए कर्णका वध करके सफलमनोरथ हो जाओ ॥ ३४ ॥
तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं
निष्कालिकं कालवशं नयाद्य ।
तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं
हत्वा प्रीतिं धर्मराजे कुरुष्व ॥ ३५ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र अपनेको कालके वशमें नहीं समझता है। तुम उसे आज ही कालके अधीन कर दो। रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णको मारकर धर्मराज युधिष्ठिरको प्रसन्न करो ॥ ३५ ॥
जानामि ते पार्थ वीर्यं यथावद्
दुर्वारणीयं च सुरासुरैश्च ।
सदावजानाति हि पाण्डुपुत्रा-
नसौ दर्पात् सूतपुत्रो दुरात्मा ॥ ३६ ॥
पार्थ! मैं तुम्हारे उस बल-पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ, जिसका निवारण करना देवताओं और असुरोंके लिये भी कठिन है। दुरात्मा सूतपुत्र कर्ण घमंडमें आकर सदा