महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2151, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअहं हनिष्ये स्वशरीरमेव प्रसह्य येनाहितमाचरं वै। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर अर्जुन अत्यन्त दुःखी हो उनसे इस प्रकार बोले—‘भगवन्! मैंने जिसके द्वारा हठपूर्वक भाईका अपमानरूप अहितकर कार्य कर डाला है, अपने उस शरीरको ही अब नष्ट कर डालूँगा’॥ २४ १/२ ॥
निशम्य तत् पार्थवचोऽब्रवीदिदं धनंजयं धर्मभृतां वरिष्ठः॥ २५॥ राजानमेनं त्वमितीदमुक्त्वा किं कश्मलं प्राविशः पार्थ घोरम्। त्वं चात्मानं हन्तुमिच्छस्वरिघ्न नेदं सद्भिः सेवितं वै किरीटिन्॥ २६॥ अर्जुनका यह वचन सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे कहा—‘पार्थ! राजा युधिष्ठिरको ‘तू’ ऐसा कहकर तुम इतने घोर दुःखमें क्यों डूब गये? शत्रुसूदन! क्या तुम आत्मघात करना चाहते हो? किरीटधारी वीर! साधुपुरुषोंने कभी ऐसा कार्य नहीं किया है॥ २५-२६॥
धर्मात्मानं भ्रातरं ज्येष्ठमद्य खड्गेन चैनं यदि हन्या नृवीर। धर्माद् भीतस्तत् कथं नाम ते स्यात् किंचोत्तरं वाकरिष्यस्त्वमेव॥ २७॥ ‘नरवीर! यदि आज धर्मसे डरकर तुमने अपने बड़े भाई इन धर्मात्मा युधिष्ठिरको तलवारसे मार डाला होता तो तुम्हारी कैसी दशा होती और इसके बाद तुम क्या करते?॥ २७॥
सूक्ष्मो धर्मो दुर्विदश्चापि पार्थ विशेषतोऽज्ञैः प्रोच्यमानं निबोध। हत्वाऽऽत्मानमात्मना प्राप्नुयास्त्वं वधाद् भ्रातुर्नरकं चातिघोरम्॥ २८॥ ‘कुन्तीनन्दन! धर्मका स्वरूप सूक्ष्म है। उसको जानना या समझना बहुत कठिन है। विशेषतः अज्ञानी पुरुषोंके लिये तो उसका जानना और भी मुश्किल है। अब मैं जो कुछ कहता हूँ उसे ध्यान देकर सुनो, भाईका वध करनेसे जिस अत्यन्त घोर नरककी प्राप्ति होती है, उससे भी भयानक नरक तुम्हें स्वयं ही अपनी हत्या करनेसे प्राप्त हो सकता है॥ २८॥
ब्रवीहि वाचाद्य गुणानिहात्मन- स्तथा हतात्मा भवितासि पार्थ। तथास्तु कृष्णेत्यभिनन्द्य तद्वचो