भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2161

तव बुद्ध्या हि भद्रं ते वधस्तस्य दुरात्मनः ।
राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले—'श्रीकृष्ण! आज रणभूमिमें मैं कर्णका वध करूँगा, इसमें संशय नहीं है। आपका कल्याण हो। आपकी बुद्धिसे ही उस दुरात्माका वध होगा' ॥ २३ ½ ॥
एवमुक्तोऽब्रवीत् पार्थं केशवो राजसत्तम ॥ २४ ॥
शक्तोऽसि भरतश्रेष्ठ हन्तुं कर्णं महाबलम् ।
एष चापि हि मे कामो नित्यमेव महारथ ॥ २५ ॥
कथं भवान् रणे कर्णं निहन्यादिति सत्तम ।
नृपश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—'भरतश्रेष्ठ! तुम महाबली कर्णका वध करनेमें समर्थ हो। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महारथी वीर! मेरे मनमें भी सदा यही इच्छा बनी रहती है कि तुम रणभूमिमें कर्णको किसी तरह मार डालो' ॥ २४-२५ ½ ॥
भूयश्चोवाच मतिमान् माधवो धर्मनन्दनम् ॥ २६ ॥
युधिष्ठिरेमं बीभत्सुं त्वं सान्त्वयितुमर्हसि ।
अनुज्ञातुं च कर्णस्य वधायाद्य दुरात्मनः ॥ २७ ॥
फिर बुद्धिमान् भगवान् माधवने धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा—'महाराज! आप अर्जुनको सान्त्वना और दुरात्मा कर्णके वधके लिये आज्ञा प्रदान करें ॥
श्रुत्वा ह्यहमयं चैव त्वां कर्णशरपीडितम् ।
प्रवृत्तिं ज्ञातुमायाताविहावां पाण्डुनन्दन ॥ २८ ॥
'पाण्डुनन्दन! राजन्! आप कर्णके बाणोंसे बहुत पीड़ित हो गये हैं—यह सुनकर मैं और ये अर्जुन दोनों आपका समाचार जाननेके लिये यहाँ आये थे ॥ २८ ॥
दिष्ट्यासि राजन् न हतो दिष्ट्या न ग्रहणं गतः ।
परिसान्त्वय बीभत्सुं जयमाशाधि चानघ ॥ २९ ॥
'निष्पाप नरेश! सौभाग्यकी बात है कि (कर्णके द्वारा) न तो आप मारे गये और न पकड़े ही गये। अब आप अर्जुनको सान्त्वना दें और उन्हें विजयके लिये आशीर्वाद प्रदान करें' ॥ २९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

एह्योहि पार्थ बीभत्सो मां परिष्वज पाण्डव ।
वक्तव्यमुक्तोऽस्मि हितं त्वया क्षान्तं च तन्मया ॥ ३० ॥
**युधिष्ठिर बोले—**कुन्तीनन्दन! बीभत्सो! आओ, आओ! पाण्डुकुमार! मेरे हृदयसे लग जाओ। तुमने तो मेरे प्रति कहनेयोग्य और हितकी ही बात कही है तथा मैंने उसके लिये क्षमा भी कर दी ॥ ३० ॥
अहं त्वामनुजानामि जहि कर्णं धनंजय ।