भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2165

आपृच्छ्य धर्मराजानं ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । सुमङ्गलस्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम् ॥ ८ ॥ महामना दारुकके द्वारा जोतकर लाये हुए उस रथको देखकर अर्जुन धर्मराजसे आज्ञा ले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कल्याणके आश्रयभूत उस परम मंगलमय उत्तम रथपर आरूढ हुए ॥ ७-८ ॥

तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिरः । आशिषोऽयुङ्क्त स ततः प्रायात् कर्णरथं प्रति ॥ ९ ॥ उस समय महाबुद्धिमान् धर्मराज राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको आशीर्वाद दिये। तत्पश्चात् उन्होंने कर्णके रथकी ओर प्रस्थान किया ॥ ९ ॥

तमायान्तं महेष्वासं दृष्ट्वा भूतानि भारत । निहतं मेनिरे कर्णं पाण्डवेन महात्मना ॥ १० ॥ भारत! महाधनुर्धर अर्जुनको आते देख समस्त प्राणियोंको यह विश्वास हो गया कि अब कर्ण महामनस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे अवश्य मारा जायगा ॥ १० ॥

बभूवुर्विमलाः सर्वा दिशो राजन् समन्ततः । चाषाश्च शतपत्राश्च क्रौञ्चाश्चैव जनेश्वर ॥ ११ ॥ प्रदक्षिणमकुर्वन्त तदा वै पाण्डुनन्दनम् । राजन्! सम्पूर्ण दिशाएँ सब ओरसे निर्मल हो गयी थीं। नरेश्वर! नीलकण्ठ, सारस और क्रौंच पक्षी पाण्डुनन्दन अर्जुनको दाहिने रखते हुए जाने लगे ॥ ११ १/२ ॥

बहवः पक्षिणो राजन् पुन्नामानः शुभाः शिवाः ॥ १२ ॥ त्वरयन्तोऽर्जुनं युद्धे हृष्टरूपा ववाशिरे । राजन्! पुरुष जातिवाले बहुत-से शुभकारक मंगलदायक पक्षी अर्जुनको युद्धके लिये उतावले करते हुए बड़े हर्षमें भरकर चहचहा रहे थे ॥ १२ १/२ ॥

कङ्का गृध्रा बकाः श्येना वायसाश्च विशाम्पते ॥ १३ ॥ अग्रतस्तस्य गच्छन्ति मांसहेतोर्भयानकाः । प्रजानाथ! कंक, गृध्र, बक, बाज और कौए आदि भयानक पक्षी मांसके लिये उनके आगे-आगे जा रहे थे ॥

निमित्तानि च धन्यानि पाण्डवस्य शशंसिरे ॥ १४ ॥ विनाशमरिसैन्यानां कर्णस्य च वधं प्रति । इस प्रकार बहुत-से शुभ शकुन पाण्डुपुत्र अर्जुनको उनके शत्रुओंके विनाश तथा कर्णके वधकी सूचना दे रहे थे ॥ १४ १/२ ॥

प्रयातस्याथ पार्थस्य महान् स्वेदो व्यजायत ॥ १५ ॥ चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं चेदं भविष्यति ।