महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2203, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंते वा सर्वे भीमसेनं तुदन्तु ॥ २१ ॥ आज युद्धस्थलमें समस्त कौरव धराशायी हो जायँ अथवा बालकोंसे लेकर वृद्धोंतक सब लोग मुझ भीमसेनको ही रणभूमिमें गिरा हुआ बतावें! मैं अकेला ही उन समस्त कौरवोंको मार गिराऊँगा अथवा वे ही सब लोग मुझ भीमसेनको पीड़ित करें ॥ २१ ॥
आशास्तारः कर्म चाप्युत्तमं ये तन्मे देवाः केवलं साधयन्तु । आयात्विहाद्यार्जुनः शत्रुघाती शक्रस्तूर्णं यज्ञ इवोपहूतः ॥ २२ ॥ जो उत्तम कर्मोंका उपदेश देनेवाले हैं, वे देवता-लोग मेरा केवल एक कार्य सिद्ध कर दें। जैसे यज्ञमें आवाहन करनेपर इन्द्रदेव तुरंत पदार्पण करते हैं, उसी प्रकार शत्रुघाती अर्जुन यहाँ शीघ्र ही आ पहुँचे ॥ २२ ॥
(पश्यस्व पश्यस्व विशोक मे त्वं बलं परेषामभिघातभिन्नम् । नानास्वरान् पश्य विमुच्य सर्वे तथा द्रवन्ते बलिनो धार्तराष्ट्राः ॥) विशोक! देखो, देखो, मेरा बल। मेरे आघातोंसे शत्रुओंकी सेना विदीर्ण हो उठी है। देखो, धृतराष्ट्रके सभी बलवान् पुत्र नाना प्रकारके आर्तनाद करते हुए भागने लगे हैं।
ईक्षस्वैतां भारतीं दीर्यमाणा- मेते कस्माद् विद्रवन्ते नरेन्द्राः । व्यक्तं धीमान् सव्यसाची नराग्र्यः सैन्यं ह्येतच्छादयत्याशु बाणैः ॥ २३ ॥ सारथे! इस कौरव-सेनापर तो दृष्टिपात करो। इसमें भी दरार पड़ती जा रही है। ये राजालोग क्यों भाग रहे हैं? इससे तो स्पष्ट जान पड़ता है कि बुद्धिमान् नरश्रेष्ठ अर्जुन आ गये। वे ही अपने बाणोंद्वारा शीघ्रता-पूर्वक इस सेनाको आच्छादित कर रहे हैं ॥ २३ ॥
पश्य ध्वजांश्च द्रवतो विशोक नागान् हयान् पत्तिसंघांश्च संख्ये । रथान् विर्कीर्णान् शरशक्तिताडितान् पश्यस्वैतान् रथिनश्चैव सूत ॥ २४ ॥ विशोक! युद्धस्थलमें भागते हुए रथोंकी ध्वजाओं, हाथियों, घोड़ों और पैदलसमूहोंको देखो। सूत! बाणों और शक्तियोंसे प्रताड़ित होकर बिखरे पड़े हुए इन रथों और रथियोंपर भी दृष्टिपात करो ॥ २४ ॥
आपूर्यते कौरवी चाप्यभीक्ष्णं सेना ह्यसौ सुभृशं हन्यमाना ।