भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2211

ते वध्यमानाः समरे पार्थचापच्युतैः शरैः । तत्र तत्र स्म लीयन्ते भये जाते महारथाः ॥ १७ ॥ अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा समरांगणमें मारे जाते हुए कौरव-महारथी भयके मारे इधर-उधर छिपने लगे ॥ १७ ॥

तेषां चतुःशतान् वीरान् यतमानान् महारथान् । अर्जुनो निशितैर्बाणैरनयद् यमसादनम् ॥ १८ ॥ उनमेंसे चार सौ वीर महारथी यत्नपूर्वक लड़ते रहे, जिन्हें अर्जुनने अपने पैने बाणोंसे यमलोक पहुँचा दिया ॥ १८ ॥

ते वध्यमानाः समरे नानालिङ्गैः शितैः शरैः । अर्जुनं समभित्यज्य दुद्रुवुर्वै दिशो दश ॥ १९ ॥ संग्राममें नाना प्रकारके चिह्नोंसे युक्त तीखे बाणोंकी मार खाकर वे सैनिक अर्जुनको छोड़कर दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ १९ ॥

तेषां शब्दो महानासीद् द्रवतां वाहिनीमुखे । महौघस्येव जलधेर्गिरिमासाद्य दीर्यतः ॥ २० ॥ युद्धके मुहानेपर भागते हुए उन योद्धाओंका महान् कोलाहल वैसा ही जान पड़ता था, जैसा कि समुद्रके महान् जलप्रवाहके पर्वतसे टकरानेपर होता है ॥ २० ॥

तां तु सेनां भृशं विद्ध्वा द्रावयित्वाऽर्जुनः शरैः । प्रायादभिमुखः पार्थः सूतानीकं हि मारिष ॥ २१ ॥ मान्यवर नरेश! उस सेनाको अपने बाणोंसे अत्यन्त घायल करके भगा देनेके पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुन कर्णकी सेनाके सामने चले ॥ २१ ॥

तस्य शब्दो महानासीत् परानभिमुखस्य वै । गरुडस्येव पततः पन्नगार्थे यथा पुरा ॥ २२ ॥ शत्रुओंकी ओर उन्मुख हुए उनके रथका महान् शब्द वैसा ही प्रतीत होता था, जैसा कि पहले किसी सर्पको पकड़नेके लिये झपटते हुए गरुड़के पंखसे प्रकट हुआ था ॥ २२ ॥

तं तु शब्दमभिश्रुत्य भीमसेनो महाबलः । बभूव परमप्रीतः पार्थदर्शनलालसः ॥ २३ ॥ उस शब्दको सुनकर महाबली भीमसेन अर्जुनके दर्शनकी लालसासे बड़े प्रसन्न हुए ॥ २३ ॥

श्रुत्वैव पार्थमायान्तं भीमसेनः प्रतापवान् । त्यक्त्वा प्राणान् महाराज सेनां तव ममर्द ह ॥ २४ ॥ महाराज! पार्थका आना सुनते ही प्रतापी भीमसेन प्राणोंका मोह छोड़कर आपकी सेनाका मर्दन करने लगे ॥

स वायुवीर्यप्रतिमो वायुवेगसमो जवे ।