भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2215

वारयामास तं वीरो वेलेव मकरालयम् ॥ ५० ॥ महाराज! तब भाइयोंसे घिरा हुआ प्रतापी सुबलपुत्र शकुनि महान् युद्धके लिये उद्यत हो आगे बढ़ा। संग्राममें भयानक पराक्रमी भीमसेनके पास पहुँचकर उस वीरने उन्हें उसी तरह रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको रोक देती है ॥ ४९-५० ॥ संन्यवर्तत तं भीमो वार्यमाणः शितैः शरैः । शकुनिस्तस्य राजेन्द्र वामपार्श्वे स्तनान्तरे ॥ ५१ ॥ प्रेषयामास नाराचान् रुक्मपुङ्खान् शिलाशितान् । राजेन्द्र! उसके तीखे बाणोंसे रोके जाते हुए भीमसेन उसीकी ओर लौट पड़े! उस समय शकुनिने उनकी बायीं पसली और छातीमें सोनेके पंखवाले और शिलापर तेज किये हुए कई नाराच मारे ॥ ५१ १/२ ॥ वर्म भित्त्वा तु ते घोराः पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ५२ ॥ न्यमज्जन्त महाराज कङ्कबर्हिणवाससः । महाराज! कंक और मयूरके पंखवाले वे भयंकर नाराच महामनस्वी पाण्डुपुत्र भीमसेनका कवच छेदकर उनके शरीरमें डूब गये ॥ ५२ १/२ ॥ सोऽतिविद्धो रणे भीमः शरं रुक्मविभूषितम् ॥ ५३ ॥ प्रेषयामास स रुषा सौबलं प्रति भारत । भारत! तब रणभूमिमें अत्यन्त घायल हुए भीमसेनने कुपित हो शकुनिकी ओर एक सुवर्णभूषित बाण चलाया ॥ ५३ १/२ ॥ तमायान्तं शरं घोरं शकुनिः शत्रुतापनः ॥ ५४ ॥ चिच्छेद सप्तधा राजन् कृतहस्तो महाबलः । राजन्! शत्रुओंको संताप देनेवाला महाबली शकुनि सिद्धहस्त था। उसने अपनी ओर आते हुए उस भयंकर बाणके सात टुकड़े कर डाले ॥ ५४ १/२ ॥ तस्मिन् निपतिते भूमौ भीमः क्रुद्धो विशाम्पते ॥ ५५ ॥ धनुश्चिच्छेद भल्लेन सौबलस्य हसन्निव । राजन्! उस बाणके धराशायी हो जानेपर भीमसेनने क्रोधपूर्वक हँसते हुए-से एक भल्ल मारकर शकुनिके धनुषको काट दिया ॥ ५५ १/२ ॥ तदपास्य धनुश्छिन्नं सौबलेयः प्रतापवान् ॥ ५६ ॥ अन्यदादाय वेगेन धनुर्भल्लांश्च षोडश । प्रतापी सुबलपुत्र शकुनिने उस कटे हुए धनुषको फेंककर बड़े वेगसे दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और उसके द्वारा सोलह भल्ल चलाये ॥ ५६ १/२ ॥ तैस्तस्य तु महाराज भल्लैः संततपर्वभिः ॥ ५७ ॥ द्वाभ्यां स सारथिं ह्यार्च्छद् भीमं सप्तभिरेव च ।