महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2895)
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भीमसेन और दुर्योधनका गदायुद्ध
संजय उवाच
ततो दुर्योधनो दृष्ट्वा भीमसेनं तथागतम् ।
प्रत्युद्ययावदीनात्मा वेगेन महता नदन् ।। १ ।।
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर उदारहृदय दुर्योधनने भीमसेनको इस प्रकार आक्रमण करते देख स्वयं भी गर्जना करते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़कर उनका सामना किया ।। १ ।।
समापेततुरन्योन्यं शृङ्गिणौ वृषभाविव ।
महानिर्घातघोषश्च प्रहाराणामजायत ।। २ ।।
वे दोनों बड़े-बड़े सींगवाले दो साँड़ोंके समान एक-दूसरेसे भिड़ गये। उनके प्रहारोंकी आवाज महान् वज्रपातके समान भयंकर जान पड़ती थी ।। २ ।।
अभवच्च तयोर्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
जिगीषतोर्यथान्योन्यमिन्द्रप्रह्लादयोरिव ।। ३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2896)
दुर्योधन और भीमका गदायुद्ध
एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले उन दोनोंमें इन्द्र और प्रह्लादके समान भयंकर एवं रोमांचकारी युद्ध होने लगा ।। ३ ।।
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गौ गदाहस्तौ मनस्विनौ ।
ददृशाते महात्मानौ पुष्पिताविव किंशुकौ ।। ४ ।।
उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो गये थे। हाथमें गदा लिये वे दोनों महामना मनस्वी वीर फूले हुए दो पलाश-वृक्षोंके समान दिखायी देते थे ।। ४ ।।
तथा तस्मिन् महायुद्धे वर्तमाने सुदारुणे ।
खद्योतसंघैरिव खं दर्शनीयं व्यरोचत ।। ५ ।।
उस अत्यन्त भयंकर महायुद्धके चालू होनेपर गदाओंके आघातसे आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं। वे आकाशमें जुगनुओंके दलके समान जान पड़ती थीं और उनसे वहाँके आकाशकी दर्शनीय शोभा हो रही थी ।।
तथा तस्मिन् वर्तमाने संकुले तुमुले भृशम् ।
उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानावरिंदमौ ।। ६ ।।
इस प्रकार चलते हुए उस अत्यन्त भयंकर घमासान युद्धमें लड़ते-लड़ते वे दोनों शत्रुदमन वीर बहुत थक गये ।। तौ मुहूर्तं समाश्वस्य पुनरेव परंतपौ । सम्पहारयतां चित्रे सम्प्रगृह्य गदे शुभे ॥ ७ ॥ फिर उन दोनोंने दो घड़ीतक विश्राम किया। इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों योद्धा फिर विचित्र एवं सुन्दर गदाएँ हाथमें लेकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ७ ॥ तौ तु दृष्ट्वा महावीर्यौ समाश्वस्तौ नरर्षभौ । बलिनौ वारणौ यद्वद् वासितार्थे मदोत्कटौ ॥ ८ ॥ समानवीर्यौ सम्प्रेक्ष्य प्रगृहीतगदावुभौ । विस्मयं परमं जग्मुर्देवगन्धर्वमानवाः ॥ ९ ॥ उन समान बलशाली महापराक्रमी नरश्रेष्ठ वीरोंने विश्राम करके पुनः हाथमें गदा ले ली और मैथुनकी इच्छावाली हथिनीके लिये लड़नेवाले दो बलवान् एवं मदोन्मत्त गजराजोंके समान पुनः युद्ध आरम्भ कर दिया है, यह देखकर देवता, गन्धर्व और मनुष्य सभी अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे ॥ ८-९ ॥ प्रगृहीतगदौ दृष्ट्वा दुर्योधनवृकोदरौ । संशयः सर्वभूतानां विजये समपद्यत ॥ १० ॥ दुर्योधन और भीमसेनको पुनः गदा उठाये देख उनमेंसे किसी एककी विजयके सम्बन्धमें समस्त प्राणियोंके हृदयमें संशय उत्पन्न हो गया ॥ १० ॥ समागम्य ततो भूयो भ्रातरौ बलिनां वरौ । अन्योन्यस्यान्तरप्रेप्सू प्रचक्रातेऽन्तरं प्रति ॥ ११ ॥ बलवानोंमें श्रेष्ठ उन दोनों भाइयोंमें जब पुनः भिड़न्त हुई तो दोनों ही दोनोंके चूकनेका अवसर देखते हुए पैंतरे बदलने लगे ॥ ११ ॥ यमदण्डोपमां गुर्वीमिन्द्राशनिमिवोद्यताम् । ददृशुः प्रेक्षका राजन् रौद्रीं विशसनीं गदाम् ॥ १२ ॥ आविद्ध्यतो गदां तस्य भीमसेनस्य संयुगे । शब्दः सुतुमुलॊ घोरो मुहूर्तं समपद्यत ॥ १३ ॥ राजन्! उस समय युद्धस्थलमें जब भीमसेन अपनी गदा घुमाने लगे, तब दर्शकोंने देखा, उनकी भारी गदा यमदण्डके समान भयंकर है। वह इन्द्रके वज्रके समान ऊपर उठी हुई है और शत्रुको छिन्न-भिन्न कर डालनेमें समर्थ है। गदा घुमाते समय उसकी घोर एवं भयानक आवाज वहाँ दो घड़ीतक गूँजती रही ॥ १२-१३ ॥ आविद्ध्यन्तमरिं प्रेक्ष्य धार्तराष्ट्रोऽथ पाण्डवम् । गदामतुलवेगां तां विस्मितः सम्बभूव ह ॥ १४ ॥
आपका पुत्र दुर्योधन अपने शत्रु पाण्डुकुमार भीमसेनको वह अनुपम वेगशालिनी गदा घुमाते देख आश्चर्यमें पड़ गया ।। १४ ।। चरंश्च विविधान् मार्गान् मण्डलानि च भारत । अशोभत तदा वीरो भूय एव वृकोदरः ।। १५ ।। भरतनन्दन! वीर भीमसेन भाँति-भाँतिके मार्गों और मण्डलोंका प्रदर्शन करते हुए पुनः बड़ी शोभा पाने लगे ।। तौ परस्परमासाद्य यत्तावन्योन्यरक्षणे । मार्जारविव भक्षार्थे ततक्षाते मुहुर्मुहुः ।। १६ ।। वे दोनों परस्पर भिड़कर एक-दूसरेसे अपनी रक्षाके लिये प्रयत्नशील हो रोटीके टुकड़ोंके लिये लड़नेवाले दो बिलावोंके समान बारंबार आघात-प्रतिघात कर रहे थे ।। १६ ।। अचरद् भीमसेनस्तु मार्गान् बहुविधांस्तथा । मण्डलानि विचित्राणि गतप्रत्यागतानि च ।। १७ ।। उस समय भीमसेन नाना प्रकारके मार्ग और विचित्र मण्डल दिखाने लगे। वे कभी शत्रुके सम्मुख आगे बढ़ते और कभी उसका सामना करते हुए ही पीछे हट आते थे ।। अस्त्रयन्त्राणि चित्राणि स्थानानि विविधानि च । परिमोक्षं प्रहाराणां वर्जनं परिधावनम् ।। १८ ।। विचित्र अस्त्र-यन्त्रों और भाँति-भाँतिके स्थानोंका प्रदर्शन करते हुए वे दोनों शत्रुके प्रहारोंसे अपनेको बचाते, विपक्षीके प्रहारको व्यर्थ कर देते और दायें-बायें दौड़ लगाते थे ।। १८ ।। अभिद्रवणमाक्षेपमवस्थानं सविग्रहम् । परिवर्तनसंवर्तमवप्लुतमुपप्लुतम् ।। १९ ।। उपन्यस्तमपन्यस्तं गदायुद्धविशारदौ । एवं तौ विचरन्तौ तु परस्परमविध्यताम् ।। २० ।। कभी वेगसे एक-दूसरेके सामने जाते, कभी विरोधीको गिरानेकी चेष्टा करते, कभी स्थिरभावसे खड़े होते, कभी गिरे हुए शत्रुके उठनेपर पुनः उसके साथ युद्ध करते, कभी विरोधीपर प्रहार करनेके लिये चक्कर काटते, कभी शत्रुके बढ़ावको रोक देते, कभी विपक्षीके प्रहारको विफल करनेके लिये झुककर निकल जाते, कभी उछलते-कूदते, कभी निकट आकर गदाका प्रहार करते और कभी लौटकर पीछेकी ओर किये हुए हाथसे शत्रुपर आघात करते थे। दोनों ही गदायुद्धके विशेषज्ञ थे और इस प्रकार पैंतरे बदलते हुए एक-दूसरेपर चोट करते थे ।। १९-२० ।। वञ्चयानौ पुनश्चैव चेरतुः कुरुसत्तमौ । विक्रीडन्तौ सुबलिनौ मण्डलानि विचेरतुः ।। २१ ।।
कुरुकुलके वे दोनों श्रेष्ठ और बलवान् वीर विपक्षीको चकमा देते हुए बारंबार युद्धके खेल दिखाते तथा पैंतरे बदलते थे ।। २१ ।। तौ दर्शयन्तौ समरे युद्धक्रीडां समन्ततः । गदाभ्यां सहसान्योन्यमाजघ्नतुररिंदमौ ।। २२ ।। समरांगणमें सब ओर युद्धकी क्रीडाका प्रदर्शन करते हुए उन दोनों शत्रुदमन वीरोंने सहसा अपनी गदाओंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार किया ।। २२ ।। परस्परं समासाद्य दंष्ट्राभ्यां द्विरदौ यथा । अशोभेतां महाराज शोणितेन परिप्लुतौ ।। २३ ।। महाराज! जैसे दो हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर प्रहार करके लहुलुहान हो जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों एक-दूसरेपर चोट करके खूनसे भीगकर शोभा पाने लगे ।। २३ ।। एवं तदभवद् युद्धं घोररूपं परंतप । परिवृत्तेऽहनि क्रूरं वृत्रवासवयोरिव ।। २४ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! इस प्रकार दिनकी समाप्तिके समय उन दोनों वीरोंमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान क्रूरतापूर्ण एवं भयंकर युद्ध होने लगा ।। गदाहस्तौ ततस्तौ तु मण्डलावस्थितौ बली । दक्षिणं मण्डलं राजन् धार्तराष्ट्रोऽभ्यवर्तत ।। २५ ।। सव्यं तु मण्डलं तत्र भीमसेनोऽभ्यवर्तत । राजन्! दोनों ही हाथमें गदा लेकर मण्डलाकार युद्धस्थलमें खड़े थे। उनमेंसे बलवान् दुर्योधन दक्षिण मण्डलमें खड़ा था और भीमसेन बायें मण्डलमें ।। २५ १/२ ।। तथा तु चरतस्तस्य भीमस्य रणमूर्धनि ।। २६ ।। दुर्योधनो महाराज पार्श्वदेशेऽभ्यताडयत् । महाराज! युद्धके मुहानेपर वाममण्डलमें विचरते हुए भीमसेनकी पसलीमें दुर्योधनने गदा मारी ।। २६ १/२ ।। आहतस्तु ततो भीमः पुत्रेण तव भारत ।। २७ ।। आविद्धयत गदां गुर्वीं प्रहारं तमचिन्तयन् । भरतनन्दन! आपके पुत्रद्वारा आहत किये गये भीमसेन उस प्रहारको कुछ भी न गिनते हुए अपनी भारी गदा घुमाने लगे ।। २७ १/२ ।। इन्द्राशनिसमां घोरां यमदण्डमिवोद्यताम् ।। २८ ।। ददृशुस्ते महाराज भीमसेनस्य तां गदाम् । राजेन्द्र! दर्शकोंने भीमसेनकी उस भयंकर गदाको इन्द्रके वज्र और यमराजके दण्डके समान उठी हुई देखा ।। आविध्यन्तं गदां दृष्ट्वा भीमसेनं तवात्मजः ।। २९ ।। समुद्यम्य गदां घोरां प्रत्यविध्यत् परंतपः ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके पुत्र दुर्योधनने भीमसेनको गदा घुमाते देख अपनी भयंकर गदा उठाकर उनकी गदापर दे मारी ।। २९१/२ ।।
गदामारुतवेगेन तव पुत्रस्य भारत ।। ३० ।।
शब्द आसीत् सुतुमुलस्तेजश्च समजायत ।
भारत! आपके पुत्रकी वायुतुल्य गदाके वेगसे उस गदाके टकरानेपर बड़े जोरका शब्द हुआ और दोनों गदाओंसे आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं ।। ३०१/२ ।।
स चरन् विविधान् मार्गान् मण्डलानि च भागशः ।। ३१ ।।
समशोभत तेजस्वी भूयो भीमात् सुयोधनः ।
नाना प्रकारके मार्गों और भिन्न-भिन्न मण्डलोंसे विचरते हुए तेजस्वी दुर्योधनकी उस समय भीमसेनसे अधिक शोभा हुई ।। ३११/२ ।।
आविद्धा सर्ववेगेन भीमेन महती गदा ।। ३२ ।।
सधूमं सार्चिषं चाग्निं मुमोचोग्रमहास्वना ।
भीमसेनके द्वारा सम्पूर्ण वेगसे घुमायी गयी वह विशाल गदा उस समय भयंकर शब्द करती हुई धूम और ज्वालाओंसहित आग प्रकट करने लगी ।। ३२१/२ ।।
आधूतां भीमसेनेन गदां दृष्ट्वा सुयोधनः ।। ३३ ।।
अद्रिसारमयीं गुर्वीमाविध्यन् बह्वशोभत ।
भीमसेनके द्वारा घुमायी गयी उस गदाको देखकर दुर्योधन भी अपनी लोहमयी भारी गदाको घुमाता हुआ अधिक शोभा पाने लगा ।। ३३१/२ ।।
गदामारुतवेगं हि दृष्ट्वा तस्य महात्मनः ।। ३४ ।।
भयं विवेश पाण्डूंस्तु सर्वानैव ससोमकान् ।
उस महामनस्वी वीरकी वायुतुल्य गदाके वेगको देखकर सोमकोंसहित समस्त पाण्डवोंके मनमें भय समा गया ।। ३४१/२ ।।
तौ दर्शयन्तौ समरे युद्धक्रीडां समन्ततः ।। ३५ ।।
गदाभ्यां सहसान्योन्यमाजघ्नतुररिंदमौ ।
समरांगणमें सब ओर युद्धकी क्रीडाका प्रदर्शन करते उन दोनों शत्रुदमन वीरोंने सहसा अपनी गदाओंद्धारा एक-दूसरेपर प्रहार किया ।। ३५१/२ ।।
तौ परस्परमासाद्य दंष्ट्राभ्यां द्विरदौ यथा ।। ३६ ।।
अशोभेतां महाराज शोणितेन परिप्लुतौ ।
महाराज! जैसे दो हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर प्रहार करके लहुलुहान हो जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों एक-दूसरेपर चोट करके खूनसे लथपथ हो अद्भुत शोभा पाने लगे ।। ३६१/२ ।।
एवं तदभवद् युद्धं घोररूपमंसंवृतम् ।। ३७ ।।
परिवृत्तेऽहनि क्रूरं वृत्रवासवयोरिव ।
इस प्रकार दिनकी समाप्तिके समय, उन दोनों वीरोंमें प्रकटरूपमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान क्रूरतापूर्ण एवं भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३७ १/२ ॥
दृष्ट्वा व्यवस्थितं भीमं तव पुत्रो महाबलः ॥ ३८ ॥
चरंश्चित्रतरान् मार्गान् कौन्तेयमभिदुद्रुवे ।
तदनन्तर विचित्र मार्गोंसे विचरते हुए आपके महाबली पुत्रने कुन्तीकुमार भीमसेनको खड़ा देख उनपर सहसा आक्रमण किया ॥ ३८ १/२ ॥
तस्य भीमो महावेगां जाम्बूनदपरिष्कृताम् ॥ ३९ ॥
अतिक्रुद्धस्य क्रुद्धस्तु ताडयामास तां गदाम् ।
यह देख क्रोधमें भरे भीमसेनने अत्यन्त कुपित हुए दुर्योधनकी सुवर्णजटित उस महावेगशालिनी गदापर ही अपनी गदासे आघात किया ॥ ३९ १/२ ॥
सविस्फुलिङ्गो निर्ह्रादस्तयोस्तत्राभिघातजः ॥ ४० ॥
प्रादुरासीन्महाराज सृष्टयोर्वज्रयोरिव ।
महाराज! उन दोनों गदाओंके टकरानेसे भयंकर शब्द हुआ और आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं। उस समय ऐसा जान पड़ा, मानो दोनों ओरसे छोड़े गये दो वज्र परस्पर टकरा गये हों ॥ ४० १/२ ॥
वेगवत्या तया तत्र भीमसेनप्रमुक्तया ॥ ४१ ॥
निपतन्त्या महाराज पृथिवी समकम्पत ।
राजेन्द्र! भीमसेनकी छोड़ी हुई उस वेगवती गदाके गिरनेसे धरती डोलने लगी ॥ ४१ १/२ ॥
तां नामृष्यत कौरव्यो गदां प्रतिहतां रणे ॥ ४२ ॥
मत्तो द्विप इव क्रुद्धः प्रतिकुञ्जरदर्शनात् ।
जैसे क्रोधमें भरा हुआ मतवाला हाथी अपने प्रतिद्वन्द्वी गजराजको देखकर सहन नहीं कर पाता, उसी प्रकार रणभूमिमें अपनी गदाको प्रतिहत हुई देख कुरुवंशी दुर्योधन नहीं सह सका ॥ ४२ १/२ ॥
स सव्यं मण्डलं राजा उद्भ्राम्य कृतनिश्चयः ॥ ४३ ॥
आजघ्ने मूर्ध्नि कौन्तेयं गदया भीमवेगया ।
तत्पश्चात् राजा दुर्योधनने अपने मनमें दृढ़ निश्चय लेकर बायें मण्डलसे चक्कर लगाते हुए अपनी भयंकर वेगशाली गदासे कुन्तीकुमार भीमसेनके मस्तकपर प्रहार किया ॥ ४३ १/२ ॥
तया त्वभिहतो भीमः पुत्रेण तव पाण्डवः ॥ ४४ ॥
नाकम्पत महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ।
महाराज! आपके पुत्रके आघातसे पीड़ित होनेपर भी पाण्डुपुत्र भीमसेन विचलित नहीं हुए। वह अद्भुत-सी बात हुई ।। ४४ १/२ ।। आश्चर्यं चापि तद् राजन् सर्वसैन्यान्यपूजयन् ।। ४५ ।। यद् गदाभिहतो भीमो नाकम्पत पदात् पदम् । राजन्! गदाकी चोट खाकर भी जो भीमसेन एक पग भी इधर-उधर नहीं हुए, वह महान् आश्चर्यकी बात थी, जिसकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ४५ १/२ ।। ततो गुरुतरां दीप्तां गदां हेमपरिष्कृताम् ।। ४६ ।। दुर्योधनाय व्यसृजद् भीमो भीमपराक्रमः । तदनन्तर भयंकर पराक्रमी भीमसेनने दुर्योधनपर अपनी सुवर्णजटित तेजस्विनी एवं बड़ी भारी गदा छोड़ी ।। तं प्रहारमसम्भ्रान्तो लाघवेन महाबलः ।। ४७ ।। मोघं दुर्योधनश्चक्रे तत्राभूद् विस्मयो महान् । परंतु महाबली दुर्योधनको इससे तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उसने फुर्तीसे इधर-उधर होकर उस प्रहारको व्यर्थ कर दिया। यह देख वहाँ सब लोगोंको महान् आश्चर्य हुआ ।। ४७ १/२ ।। सा तु मोघा गदा राजन् पतन्ती भीमचोदिता ।। ४८ ।। चालयामास पृथिवीं महानिर्घातनिःस्वना । राजन्! भीमसेनकी चलायी हुई वह गदा जब व्यर्थ होकर गिरने लगी, उस समय उसने वज्रपातके समान महान् शब्द प्रकट करके पृथिवीको हिला दिया ।। ४८ १/२ ।। आस्थाय कौशिकान् मार्गानुत्पतन् स पुनः पुनः ।। ४९ ।। गदानिपातं प्रज्ञाय भीमसेनं च वञ्चितम् । वञ्चयित्वा तदा भीमं गदया कुरुसत्तमः ।। ५० ।। ताडयामास संक्रुद्धो वक्षोदेशे महाबलः । जब राजा दुर्योधनने देखा कि भीमसेनकी गदा नीचे गिर गयी और उनका वार खाली गया, तब क्रोधमें भरे हुए महाबली कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनने कौशिक मार्गोंका आश्रय ले बार-बार उछलकर भीमसेनको धोखा देकर उनकी छातीमें गदा मारी ।। ४९-५० १/२ ।। गदया निहतो भीमो मुह्यमानो महारणे ।। ५१ ।। नाभ्यमन्यत कर्तव्यं पुत्रेणाभ्याहतस्तव । उस महासमरमें आपके पुत्रकी गदाकी चोट खाकर भीमसेन मूर्च्छित-से हो गये और एक क्षणतक उन्हें अपने कर्तव्यका ज्ञानतक न रहा ।। ५१ १/२ ।। तस्मिंस्तथा वर्तमाने राजन् सोमकपाण्डवाः ।। ५२ ।। भृशोपहतसंकल्पा न हृष्टमनसोऽभवन् ।
राजन्! जब भीमसेनकी ऐसी अवस्था हो गयी, उस समय सोमक और पाण्डव बहुत ही खिन्न और उदास हो गये। उनकी विजयकी आशा नष्ट हो गयी ॥ ५२ १/२ ॥
स तु तेन प्रहारेण मातङ्ग इव रोषितः ॥ ५३ ॥
हस्तिवद्धस्तिसंकाशमभिदुद्राव ते सुतम् ।
उस प्रहारसे भीमसेन मतवाले हाथीकी भाँति कुपित हो उठे और जैसे एक गजराज दूसरे गजराजपर धावा करता है, उसी प्रकार उन्होंने आपके पुत्रपर आक्रमण किया ॥ ५३ १/२ ॥
ततस्तु तरसा भीमो गदया तनयं तव ॥ ५४ ॥
अभिदुद्राव वेगेन सिंहो वनगजं यथा ।
जैसे सिंह जंगली हाथीपर झपटता है, उसी प्रकार भीमसेन गदा लेकर बड़े वेगसे आपके पुत्रकी ओर दौड़े ॥
उपसृत्य तु राजानं गदामोक्षविशारदः ॥ ५५ ॥
आविध्यत गदां राजन् समुद्दिश्य सुतं तव ।
अताडयद् भीमसेनः पार्श्वे दुर्योधनं तदा ॥ ५६ ॥
राजन्! गदाका प्रहार करनेमें कुशल भीमसेनने आपके पुत्र राजा दुर्योधनके निकट पहुँचकर गदा घुमायी और उसे मार डालनेके उद्देश्यसे उसकी पसलीमें आघात किया ॥ ५५-५६ ॥
स विह्वलः प्रहारेण जानुभ्यामगमन्महीम् ।
तस्मिन् कुरुकुलश्रेष्ठे जानुभ्यामवनीं गते ॥ ५७ ॥
उदतिष्ठत् ततो नादः सृञ्जयानां जगत्पते ।
राजन्! उस प्रहारसे व्याकुल हो आपका पुत्र पृथ्वीपर घुटने टेककर बैठ गया। उस कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर दुर्योधनके घुटने टेक देनेपर सृञ्जयोंने बड़े जोरसे हर्षध्वनि की ॥ ५७ १/२ ॥
तेषां तु निनदं श्रुत्वा सृञ्जयानां नरर्षभः ॥ ५८ ॥
अमर्षाद् भरतश्रेष्ठ पुत्रस्ते समकुप्यत ।
उत्थाय तु महाबाहुर्महानाग इव श्वसन् ॥ ५९ ॥
दिधक्षन्निव नेत्राभ्यां भीमसेनमवैक्षत ।
भरतश्रेष्ठ! उन सृञ्जयोंका वह सिंहनाद सुनकर पुरुषप्रवर आपका महाबाहु पुत्र दुर्योधन अमर्षसे कुपित हो उठा और खड़ा होकर महान् सर्पके समान फुंकार करने लगा। उसने दोनों आँखोंसे भीमसेनकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें भस्म कर डालना चाहता हो ॥
ततः स भरतश्रेष्ठो गदापाणिरभिद्रवन् ॥ ६० ॥
प्रमथिष्यन्निव शिरो भीमसेनस्य संयुगे ।
भरतवंशका वह श्रेष्ठ वीर हाथमें गदा लेकर युद्धस्थलमें भीमसेनका मस्तक कुचल डालनेके लिये उनकी ओर दौड़ा ।। ६० १/२ ।।
स महात्मा महात्मानं भीमं भीमपराक्रमः ।। ६१ ।।
अताडयच्छङ्खदेशे न चचालाचलोपमः ।
पास पहुँचकर उस भयंकर पराक्रमी महामनस्वी वीरने महामना भीमसेनके ललाटपर गदासे आघात किया, परंतु भीमसेन पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रह गये, तनिक भी विचलित नहीं हुए ।। ६१ १/२ ।।
स भूयः शुशुभे पार्थस्ताडितो गदया रणे ।
उद्भिन्नरुधिरो राजन् प्रभिन्न इव कुञ्जरः ।। ६२ ।।
राजन्! रणभूमिमें उस गदाकी चोट खाकर भीमसेनके मस्तकसे रक्तकी धारा बह चली और वे मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान अधिक शोभा पाने लगे ।।
ततो गदां वीरहणीमयोमयीं
प्रगृह्य वज्राशनितुल्यनिःस्वनाम् ।
अताडयच्छत्रुममित्रकर्षणो
बलेन विक्रम्य धनंजयाग्रजः ।। ६३ ।।
तदनन्तर अर्जुनके बड़े भाई शत्रुसूदन भीमसेनने बलपूर्वक पराक्रम प्रकट करके वज्र और अशनिके तुल्य महान् शब्द करनेवाली वीरविनाशिनी लोहमयी गदा हाथमें लेकर उसके द्वारा अपने शत्रुपर प्रहार किया ।। ६३ ।।
स भीमसेनाभिहतस्तवात्मजः
पपात संकम्पितदेहबन्धनः ।
सुपुष्पितो मारुतवेगताडितो
वने यथा शाल इवावघूर्णितः ।। ६४ ।।
भीमसेनके उस प्रहारसे आहत होकर आपके पुत्रके शरीरकी नस-नस ढीली हो गयी और वह वायुके वेगसे प्रताड़ित हो झोंके खानेवाले विकसित शालवृक्षकी भाँति काँपता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ६४ ।।
ततः प्रणेदुर्जहृषुश्च पाण्डवाः
समीक्ष्य पुत्रं पतितं क्षितौ तव ।
ततः सुतस्ते प्रतिलभ्य चेतनां
समुत्पपात द्विरदो यथा ह्रदात् ।। ६५ ।।
आपके पुत्रको पृथ्वीपर पड़ा देख पाण्डव हर्षमें भरकर सिंहनाद करने लगे। इतनेहीमें आपका पुत्र होशमें आ गया और सरोवरसे निकले हुए हाथीके समान उछलकर खड़ा हो गया ।। ६५ ।।
स पार्थिवो नित्यममर्षितस्तदा
महारथः शिक्षितवत् परिभ्रमन् । अताडयत् पाण्डवमग्रतः स्थितं स विह्वलाङ्गो जगतीमुपास्पृशत् ॥ ६६ ॥ सदा अमर्षमें भरे रहनेवाले महारथी राजा दुर्योधनने एक शिक्षित योद्धाकी भाँति विचरते हुए अपने सामने खड़े भीमसेनपर पुनः गदाका प्रहार किया। उसकी चोट खाकर भीमसेनका सारा शरीर शिथिल हो गया और उन्होंने धरती थाम ली ॥ ६६ ॥
स सिंहनादं विननाद कौरवो निपात्य भूमौ युधि भीममोजसा । बिभेद चैवाशनितुल्यमोजसा गदानिपातेन शरीररक्षणम् ॥ ६७ ॥ भीमसेनको युद्धस्थलमें बलपूर्वक भूमिपर गिराकर कुरुराज दुर्योधन सिंहके समान दहाड़ने लगा। उसने सारी शक्ति लगाकर चलायी हुई गदाके आघातसे भीमसेनके वज्रतुल्य कवचका भेदन कर दिया था ॥ ६७ ॥
ततोऽन्तरिक्षे निनदो महानभूद् दिवौकसामप्सरसां च नेदुषाम् । पपात चोच्चैरमरप्रवेरितं विचित्रपुष्पोत्करवर्षमुत्तमम् ॥ ६८ ॥ उस समय आकाशमें हर्षध्वनि करनेवाले देवताओं और अप्सराओंका महान् कोलाहल गूँज उठा। साथ ही देवताओंद्वारा बहुत ऊँचेसे की हुई विचित्र पुष्पसमूहोंकी वहाँ अच्छी वर्षा होने लगी ॥ ६८ ॥
ततः परानाविशदुत्तमं भयं समीक्ष्य भूमौ पतितं नरोत्तमम् । अहीयमानं च बलेन कौरवं निशाम्य भेदं सुदृढस्य वर्मणः ॥ ६९ ॥ राजन्! तदनन्तर यह देखकर कि भीमसेनका सुदृढ़ कवच छिन्न-भिन्न हो गया, नरश्रेष्ठ भीम धराशायी हो गये और कुरुराज दुर्योधनका बल क्षीण नहीं हो रहा है, शत्रुओंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ ६९ ॥
ततो मुहूर्तादुपलभ्य चेतनां प्रमृज्य वक्त्रं रुधिराक्तमात्मनः । धृतिं समालम्ब्य विवृत्य लोचने बलेन संस्तभ्य वृकोदरः स्थितः ॥ ७० ॥ तत्पश्चात् दो घड़ीमें सचेत हो भीमसेन खूनसे भींगे हुए अपने मुँहको पोंछते हुए उठे और बलपूर्वक अपनेको सँभालकर धैर्यका आश्रय ले आँख खोलकर देखते हुए पुनः
युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ ७० ॥ (ततो यमौ यमसदृशौ पराक्रमे सपार्षतः शिनितनयश्च वीर्यवान् । समाह्वयन्नहमित्यभित्वरं- स्तवात्मजं समभिययुर्जयैषिणः ॥ उस समय यमराजके सदृश पराक्रमी नकुल और सहदेव, धृष्टद्युम्न तथा पराक्रमी शिनिपौत्र सात्यकि—ये सब-के-सब विजयके अभिलाषी हो 'मैं लड़ूँगा, मैं लड़ूँगा' ऐसा कहकर बड़ी उतावलीके साथ आपके पुत्रको ललकारने और उसपर आक्रमण करने लगे। निगृह्य तान् पुनरपि पाण्डवो बली तवात्मजं स्वयमभिगम्य कालवत् । चचार च व्यपगतखेदवेपथुः सुरेश्वरो नमुचिमिवोत्तमं रणे ॥) परंतु बलवान् पाण्डुपुत्र भीमने उन सबको रोककर स्वयं ही आपके पुत्रपर पुनः कालके समान आक्रमण किया और खेद एवं कम्पसे रहित होकर वे रणभूमिमें उसी प्रकार विचरने लगे, जैसे देवराज इन्द्र श्रेष्ठ दैत्य नमुचिपर आक्रमण करके युद्धस्थलमें विचरण करते थे।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि गदायुद्धे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें गदायुद्धविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७२ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2907)
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनके संकेतके अनुसार भीमसेनका गदासे दुर्योधनकी जाँघें तोड़कर उसे धराशायी करना एवं भीषण उत्पातोंका प्रकट होना
संजय उवाच
समुदीर्णं ततो दृष्ट्वा संग्रामं कुरुमुख्ययोः ।
अथाब्रवीदर्जुनस्तु वासुदेवं यशस्विनम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! कुरुकुलके उन दोनों प्रमुख वीरोंके उस संग्रामको उत्तरोत्तर बढ़ता देख अर्जुनने यशस्वी भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा— ॥ १ ॥
अनयोर्वीर्ययोर्युद्धे को ज्यायान् भवतो मतः ।
कस्य वा को गुणो भूयानेतद् वद जनार्दन ॥ २ ॥
‘जनार्दन! आपकी रायमें इन दोनों वीरोंमेंसे इस युद्धस्थलमें कौन बड़ा है अथवा किसमें कौन-सा गुण अधिक है? यह मुझे बताइये’ ॥ २ ॥
वासुदेव उवाच
उपदेशोऽनयोस्तुल्यो भीमस्तु बलवत्तरः ।
कृती यत्नपरस्त्वेव धार्तराष्ट्रो वृकोदरात् ॥ ३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—अर्जुन! इन दोनोंको शिक्षा तो एक-सी मिली है; परंतु भीमसेन बलमें अधिक हैं और यह दुर्योधन उनकी अपेक्षा अभ्यास और प्रयत्नमें बढ़ा-चढ़ा है ॥ ३ ॥
भीमसेनस्तु धर्मेण युद्ध्यमानो न जेष्यति ।
अन्यायेन तु युध्यन् वै हन्यादेव सुयोधनम् ॥ ४ ॥
यदि भीमसेन धर्मपूर्वक युद्ध करते रहे तो कदापि नहीं जीतेंगे और अन्यायपूर्वक युद्ध करनेपर निश्चय ही दुर्योधनका वध कर डालेंगे ॥ ४ ॥
मायया निर्जिता देवैरसुरा इति नः श्रुतम् ।
विरोचनस्तु शक्रेण मायया निर्जितः स वै ॥ ५ ॥
हमने सुना है कि देवताओंने पूर्वकालमें मायासे ही असुरोंपर विजय पायी थी और इन्द्रने मायासे ही विरोचनको परास्त किया था ॥ ५ ॥
मायया चाक्षिपत् तेजो वृत्रस्य बलसूदनः ।
तस्मान्मायामयं भीम आतिष्ठतु पराक्रमम् ॥ ६ ॥
बलसूदन इन्द्रने मायासे वृत्रासुरके तेजको नष्ट कर दिया था, इसलिये भीमसेन भी यहाँ मायामय पराक्रमका ही आश्रय लें।। ६ ।। प्रतिज्ञातं च भीमेन द्यूतकाले धनंजय । ऊरू भेत्स्यामि ते संख्ये गदयेति सुयोधनम् ।। ७ ।। धनंजय! जूएके समय भीमने प्रतिज्ञा करते हुए दुर्योधनसे यह कहा था कि 'मैं युद्धमें गदा मारकर तेरी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा' ।। ७ ।। सोऽयं प्रतिज्ञां तां चापि पालयत्वरिकर्षणः । मायाविनं तु राजानं माययैव निकृन्ततु ।। ८ ।। अतः शत्रुसूदन भीमसेन अपनी उस प्रतिज्ञाका पालन करें और मायावी राजा दुर्योधनको मायासे ही नष्ट कर डालें ।। यद्येष बलमास्थाय न्यायेन प्रहरिष्यति । विषमस्थस्ततो राजा भविष्यति युधिष्ठिरः ।। ९ ।। यदि ये बलका सहारा लेकर न्यायपूर्वक प्रहार करेंगे, तब राजा युधिष्ठिर पुनः बड़ी विषम परिस्थितिमें पड़ जायँगे ।। ९ ।। पुनरेव तु वक्ष्यामि पाण्डवेय निबोध मे । धर्मराजापराधेन भयं नः पुनरागतम् ।। १० ।। पाण्डुनन्दन! मैं पुनः यह बात कहे देता हूँ, तुम उसे ध्यान देकर सुनो। धर्मराजके अपराधसे हमलोगोंपर फिर भय आ पहुँचा है ।। १० ।। कृत्वा हि सुमहत् कर्म हत्वा भीष्ममुखान् कुरून् । जयः प्राप्तो यशः प्राग्रयं वैरं च प्रतियातितम् ।। ११ ।। तदेवं विजयः प्राप्तः पुनः संशयितः कृतः । महान् प्रयास करके भीष्म आदि कौरवोंको मारकर विजय एवं श्रेष्ठ यशकी प्राप्ति की गयी और वैरका पूरा-पूरा बदला चुकाया गया था। इस प्रकार जो विजय प्राप्त हुई थी, उसे उन्होंने फिर संशयमें डाल दिया है ।। ११ १/२ ।। अबुद्धिरेषा महती धर्मराजस्य पाण्डव ।। १२ ।। यदेकविजये युद्धं पणितं घोरमीदृशम् । पाण्डुनन्दन! एककी ही हार-जीतसे सबकी हार-जीतकी शर्त लगाकर जो इन्होंने इस भयंकर युद्धको जूएका दाँव बना डाला, यह धर्मराजकी बड़ी भारी नासमझी है ।। १२ १/२ ।। सुयोधनः कृती वीर एकायनगतस्तथा ।। १३ ।। अपि चोशनसा गीतः श्रूयतेऽयं पुरातनः । श्लोकस्तत्त्वार्थसहितस्तन्मे निगदतः शृणु ।। १४ ।। दुर्योधन युद्धकी कला जानता है, वीर है और एक निश्चयपर डटा हुआ है। इस विषयमें शुक्राचार्यका कहा हुआ यह एक प्राचीन श्लोक सुननेमें आता है, जो नीतिशास्त्रके तात्त्विक
अर्थसे भरा हुआ है उसे सुना रहा हूँ, मेरे कहनेसे वह श्लोक सुनो ।। १३-१४ ।। पुनरावर्तमानानां भग्नानां जीवितैषिणाम् । भेतव्यमरिशेषाणामेकायनगता हिते ।। १५ ।। ‘मरनेसे बचे हुए शत्रुगण यदि युद्धमें जान बचानेकी इच्छासे भाग गये हों और पुनः युद्धके लिये लौटने लगे हों तो उनसे डरते रहना चाहिये; क्योंकि वे एक निश्चयपर पहुँचे हुए होते हैं (उस समय वे मृत्युसे भी नहीं डरते हैं)’ ।। १५ ।। साहसोत्पतितानां च निराशानां च जीविते । न शक्यमग्रतः स्थातुं शक्रेणापि धनंजय ।। १६ ।। धनंजय! जो जीवनकी आशा छोड़कर साहसपूर्वक युद्धमें कूद पड़े हों, उनके सामने इन्द्र भी नहीं ठहर सकते ।। १६ ।। सुयोधनमिमं भग्नं हतसैन्यं हृदं गतम् । पराजितं वनप्रेप्सुं निराशं राज्यलम्भने ।। १७ ।। को न्वेष संयुगे प्राज्ञः पुनर्द्वन्द्वे समाह्वयेत् । इस दुर्योधनकी सेना मारी गयी थी। यह परास्त हो गया था और अब राज्य पानेसे निराश हो वनमें चला जाना चाहता था; इसीलिये भागकर पोखरेमें छिपा था, ऐसे हताश शत्रुको कौन बुद्धिमान् पुरुष समरांगणमें द्वन्द्व-युद्धके लिये आमन्त्रित करेगा? ।। १७ ½ ।। अपि नो निर्जितं राज्यं न हरेत सुयोधनः ।। १८ ।। यस्त्रयोदशवर्षाणि गदया कृतनिश्रमः । चरत्यूर्ध्वं च तिर्यक् च भीमसेनजिघांसया ।। १९ ।। कहीं ऐसा न हो कि हमारे जीते हुए राज्यको दुर्योधन फिर हड़प ले। उसने तेरह वर्षोंतक गदाद्वारा युद्ध करनेका निरन्तर श्रम एवं अभ्यास किया है। देखो, यह भीमसेनके वधकी इच्छासे इधर-उधर और ऊपरकी ओर विचर रहा है ।। १८-१९ ।। एनं चेन्न महाबाहुरन्यायेन हनिष्यति । एष वः कौरवो राजा धार्तराष्ट्रो भविष्यति ।। २० ।। यदि महाबाहु भीमसेन इसे अन्यायपूर्वक नहीं मारेंगे तो यह धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन ही आपका तथा समस्त कुरुकुलका राजा होगा ।। २० ।। धनंजयस्तु श्रुत्वैतत् केशवस्य महात्मनः । प्रेक्षतो भीमसेनस्य सव्यमूरुमताडयत् ।। २१ ।। महात्मा भगवान् केशवका यह वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनके देखते हुए अपनी बायीं जाँघको ठोंका ।। २१ ।। गृह्य संज्ञां ततो भीमो गदया व्यचरद् रणे । मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च ।। २२ ।।
इससे संकेत पाकर भीमसेन रणभूमिमें गदाद्वारा यमक तथा अन्य प्रकारके विचित्र मण्डल दिखाते हुए विचरने लगे ॥ २२ ॥ दक्षिणं मण्डलं सव्यं गोमूत्रकमथापि च । व्यचरत् पाण्डवो राजन्नर्रिं संमोहयन्निव ॥ २३ ॥ राजन्! पाण्डुपुत्र भीमसेन आपके पुत्रको मोहित करते हुए-से दक्षिण, वाम और गोमूत्रक मण्डलसे विचरने लगे ॥ २३ ॥ तथैव तव पुत्रोऽपि गदामार्गविशारदः । व्यचरल्लघु चित्रं च भीमसेनजिघांसया ॥ २४ ॥ इसी प्रकार गदायुद्धकी प्रणालीका विशेषज्ञ आपका पुत्र भी भीमसेनके वधकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक विचित्र पैंतरे देता हुआ विचरने लगा ॥ २४ ॥ आधुन्वन्तो गदे घोरे चन्दनागरुरूषिते । वैरस्यान्तं परीप्सन्तौ रणे क्रुद्धाविवान्तकौ ॥ २५ ॥ वैरका अन्त करनेकी इच्छावाले वे दोनों वीर रणभूमिमें चन्दन और अगुरुसे चर्चित भयंकर गदाएँ घुमाते हुए कुपित कालके समान प्रतीत होते थे ॥ २५ ॥ अन्योन्यं तौ जिघांसन्तौ प्रवीरौ पुरुषर्षभौ । युयुधाते गरुत्मन्तौ यथा नागामिषैषिणौ ॥ २६ ॥ जैसे दो गरुड़ किसी सर्पके मांसको पानेकी इच्छासे परस्पर लड़ रहे हों, उसी प्रकार एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वे दोनों पुरुषप्रवर प्रमुख वीर भीमसेन और दुर्योधन आपसमें जूझ रहे थे ॥ २६ ॥ मण्डलानि विचित्राणि चरतोर्नृपभीमयोः । गदासम्पातजास्तत्र प्रजज्ञुः पावकार्चिषः ॥ २७ ॥ विचित्र मण्डलों (पैंतरों)-से विचरते हुए राजा दुर्योधन और भीमसेनकी गदाओंके टकरानेसे वहाँ आगकी लपटें प्रकट होने लगीं ॥ २७ ॥ समं प्रहरतोस्तत्र शूरयोर्बलिनोर्मृधे । क्षुब्धयोर्वायुना राजन् द्वयोरिव समुद्रयोः ॥ २८ ॥ तयोः प्रहरतोस्तुल्यं मत्तकुञ्जरयोरिव । गदानिर्घातसंह्नादः प्रहाराणामजायत ॥ २९ ॥ राजन्! जैसे वायुसे विक्षुब्ध हुए दो समुद्र एक-दूसरेसे टकरा रहे हों अथवा दो मतवाले हाथी परस्पर चोट कर रहे हों, उसी प्रकार वहाँ एक-दूसरेपर समान रूपसे प्रहार करनेवाले दोनों बलवान् वीरोंके परस्पर चोट करनेपर गदाओंके टकरानेकी आवाज वज्रकी कड़कके समान प्रकट होती थी ॥ २८-२९ ॥ तस्मिंस्तदा सम्प्रहारे दारुणे संकुले भृशम् । उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानाव्रिंदमौ ॥ ३० ॥
उस समय उस अत्यन्त भयंकर घमासान युद्धमें शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर परस्पर युद्ध करते हुए बहुत थक गये ॥ ३० ॥
तौ मुहूर्तं समाश्वस्य पुनरेव परंतप ।
अभ्यहारयतां क्रुद्धौ प्रगृह्य महती गदे ॥ ३१ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तब दोनों दो घड़ीतक विश्राम करके पुनः विशाल गदाएँ हाथमें लेकर क्रोधपूर्वक एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ३१ ॥
तयोः समभवद् युद्धं घोररूपमंसंवृतम् ।
गदानिपातै राजेन्द्र तक्षतोर्वै परस्परम् ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! गदाकी चोटसे एक-दूसरेको घायल करते हुए उन दोनोंमें खुले तौरपर घोर युद्ध हो रहा था ॥ ३२ ॥
समरे प्रद्रुतौ तौ तु वृषाभाक्षौ तरस्विनौ ।
अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ पङ्कस्थौ महिषाविव ॥ ३३ ॥
बैलके समान विशाल नेत्रोंवाले वे दोनों वेगशाली वीर समरांगणमें परस्पर धावा करके कीचड़में खड़े हुए दो भैंसोंके समान एक-दूसरेपर चोट करते थे ॥ ३३ ॥
जर्जरीकृतसर्वाङ्गौ रुधिरेणाभिसम्प्लुतौ ।
ददृशाते हिमवति पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३४ ॥
उन दोनोंके सारे अंग गदाके प्रहारसे जर्जर हो गये थे और दोनों ही खूनसे लथपथ हो गये थे। उस दशामें वे हिमालयपर खिले हुए दो पलाशवृक्षोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३४ ॥
दुर्योधनस्तु पार्थेन विवरे सम्प्रदर्शिते ।
ईषद्विन्मिषमाणस्तु सहसा प्रससार ह ॥ ३५ ॥
जब अर्जुनने छिद्रकी ओर संकेत किया, तब कनखियोंसे उसे देखकर दुर्योधन सहसा भीमसेनकी ओर बढ़ा ॥ ३५ ॥
तमभ्याशगतं प्राज्ञो रणे प्रेक्ष्य वृकोदरः ।
अवाक्षिपद् गदां तस्मिन् वेगेन महता बली ॥ ३६ ॥
रणभूमिमें उसे निकट आया देख बुद्धिमान् एवं बलवान् भीमने उसपर बड़े वेगसे गदा चलायी ॥ ३६ ॥
आक्षिपन्तं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते ।
अवासर्पत्ततः स्थानात् सा मोघा न्यपतद् भुवि ॥ ३७ ॥
प्रजानाथ! उन्हें गदा चलाते देख आपका पुत्र सहसा उस स्थानसे हट गया और वह गदा व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३७ ॥
मोक्षयित्वा प्रहारं तं सुतस्तव सुसम्भ्रमात् ।
भीमसेनं च गदया प्राहरत् कुरुसत्तम ॥ ३८ ॥
कुरुश्रेष्ठ! उस प्रहारसे अपनेको बचाकर आपके पुत्रने भीमसेनपर बड़े वेगसे गदाद्वारा आघात किया ॥ ३८ ॥
तस्य विस्यन्दमानेन रुधिरेणामितौजसः । प्रहारगुरुपाताच्च मूर्च्छेव समजायत ॥ ३९ ॥ उसकी चोटसे अमिततेजस्वी भीमके शरीरसे रक्तकी धारा बह चली। साथ ही उस प्रहारके गहरे आघातसे उन्हें मूर्च्छा-सी आ गयी ॥ ३९ ॥
दुर्योधनो न तं वेद पीडितं पाण्डवं रणे । धारयामास भीमोऽपि शरीरमतिपीडितम् ॥ ४० ॥ उस समय दुर्योधन यह न जान सका कि रणभूमिमें पाण्डुपुत्र भीमसेन अधिक पीड़ित हो गये हैं। यद्यपि उनके शरीरमें अत्यन्त वेदना हो रही थी तो भी भीमसेन उसे सँभाले रहे ॥ ४० ॥
अमन्यत स्थितं ह्येनं प्रहरिष्यन्तमाहवे । अतो न प्राहरत् तस्मै पुनरेव तवात्मजः ॥ ४१ ॥ उसने यही समझा कि रणक्षेत्रमें भीमसेन अब मुझपर प्रहार करनेके लिये खड़े हैं; अतः बचनेकी ही चेष्टामें संलग्न होकर आपके पुत्रने पुनः उनपर प्रहार नहीं किया ॥ ४१ ॥
ततो मुहूर्तमाश्वस्य दुर्योधनमुपस्थितम् । वेगेनाभ्यपतद् राजन् भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ४२ ॥ राजन्! तदनन्तर दो घड़ी सुस्ताकर प्रतापी भीमसेनने निकट आये हुए दुर्योधनपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संरब्धममितौजसम् । मोघमस्य प्रहारं तं चिकीर्षुर्भरतर्षभ ॥ ४३ ॥ भरतश्रेष्ठ! अमिततेजस्वी भीमको रोषपूर्वक धावा करते देख आपके पुत्रने उनके उस प्रहारको व्यर्थ कर देनेकी इच्छा की ॥ ४३ ॥
अवस्थाने मतिं कृत्वा पुत्रस्तव महामनाः । इयेषोत्पतितुं राजन् छलयिष्यन् वृकोदरम् ॥ ४४ ॥ राजन्! भीमसेनको छलनेके लिये आपके महामनस्वी पुत्रने पहले वहाँ स्थिरतापूर्वक खड़े रहनेका विचार करके फिर उछलकर दूर हट जानेकी इच्छा की ॥ ४४ ॥
अबुद्ध्यद् भीमसेनस्तु राज्ञस्तस्य चिकीर्षितम् । अथास्य समभिद्रुत्य समुत्क्रुश्य च सिंहवत् ॥ ४५ ॥ सृत्या वञ्चयतो राजन् पुनरेवोत्पतिष्यतः । ऊरुभ्यां प्राहिणोद् राजन् गदां वेगेन पाण्डवः ॥ ४६ ॥ भीमसेन समझ गये कि राजा दुर्योधन क्या करना चाहता है। अतः पैंतरेसे छलने और ऊपर उछलनेकी इच्छावाले दुर्योधनके ऊपर आक्रमण करके भीमसेनने सिंहके समान
गर्जना की और उसकी जाँघोंपर बड़े वेगसे गदा चलायी ॥ ४५-४६ ॥ सा वज्रनिष्पेषसमा प्रहिता भीमकर्मणा । ऊरू दुर्योधनस्याथ बभञ्ज प्रियदर्शनौ ॥ ४७ ॥ भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनके द्वारा चलायी हुई वह गदा वज्रपातके समान गिरी और दुर्योधनकी सुन्दर दिखायी देनेवाली जाँघोंको उसने तोड़ दिया ॥ ४७ ॥ स पपात नरव्याघ्रो वसुधामनुनादयन् । भग्नोरुर्भीमसेनेन पुत्रस्तव महीपते ॥ ४८ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार जब भीमसेनने उसकी जाँघें तोड़ डालीं, तब आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ गिर पड़ा ॥ ४८ ॥ ववुर्वाताः सनिर्घाताः पांशुवर्षं पपात च । चचाल पृथिवी चापि सवृक्षक्षुपपर्वता ॥ ४९ ॥ तस्मिन् निपतिते वीरे पत्यौ सर्वमहीक्षिताम् । फिर तो समस्त भूपालोंके स्वामी वीर राजा दुर्योधनके धराशायी होनेपर वहाँ बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ प्रचण्ड हवा चलने लगी, धूलिकी वर्षा होने लगी और वृक्षों, वनों एवं पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ४९१/२ ॥ महास्वना पुनर्दीप्ता सनिर्घाता भयंकरी ॥ ५० ॥ पपात चोल्का महती पतिते पृथिवीपतौ । पृथिवीपति दुर्योधनके गिर जानेपर आकाशसे पुनः महान् शब्द और बिजलीकी कड़कके साथ प्रज्वलित, भयंकर एवं विशाल उल्का भूमिपर गिरी ॥ ५०१/२ ॥ तथा शोणितवर्षं च पांशुवर्षं च भारत ॥ ५१ ॥ ववर्ष मधवांस्तत्र तव पुत्रे निपातिते । भरतनन्दन! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर इन्द्रने वहाँ रक्त और धूलिकी वर्षा की ॥ ५११/२ ॥ यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च ॥ ५२ ॥ अन्तरिक्षे महानादः श्रूयते भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उस समय आकाशमें यक्षों, राक्षसों तथा पिशाचोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ५२१/२ ॥ तेन शब्देन घोरेण मृगाणामथ पक्षिणाम् ॥ ५३ ॥ जज्ञे घोरतरः शब्दो बहूनां सर्वतोदिशम् । उस घोर शब्दके साथ बहुत-से पशुओं और पक्षियों-की भयानक आवाज भी सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठी ॥ ५३१/२ ॥ ये तत्र वाजिनः शेषा गजाश्च मनुजैः सह ॥ ५४ ॥
मुमुचुस्ते महानादं तव पुत्रे निपातिते । वहाँ जो घोड़े, हाथी और मनुष्य शेष रह गये थे, वे सभी आपके पुत्रके मारे जानेपर महान् कोलाहल करने लगे ।। भेरीशङ्खमृदङ्गानामभवच्च स्वनो महान् ॥ ५५ ॥ अन्तर्भूमिगतश्चैव तव पुत्रे निपातिते । राजन्! जब आपका पुत्र मार गिराया गया, उस समय इस भूतलपर भेरी, शंखों और मृदंगोंका गम्भीर घोष होने लगा ।। ५५ १/२ ।। बहुपादैर्बहुभुजैः कबन्धैर्घोरदर्शनैः ॥ ५६ ॥ नृत्यद्भिर्भयदैर्व्याप्ता दिशस्तत्राभवन् नृप । नरेश्वर! वहाँ सम्पूर्ण दिशाओंमें नाचते हुए अनेक पैर और अनेक बाँहवाले घोर एवं भयंकर कबन्ध व्याप्त हो रहे थे ।। ५६ १/२ ।। ध्वजवन्तोऽस्त्रवन्तश्च शस्त्रवन्तस्तथैव च ॥ ५७ ॥ प्राकम्पन्त ततो राजंस्तव पुत्रे निपातिते । राजन्! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर वहाँ अस्त्र-शस्त्र और ध्वजावाले सभी वीर काँपने लगे ।। ५७ १/२ ।। ह्रदाः कूपाश्च रुधिरमुद्वेमुर्नृपसत्तम ॥ ५८ ॥ नद्यश्च सुमहावेगाः प्रतिस्रोतोवहाभवन् । नृपश्रेष्ठ! तालाबों और कूपोंमें रक्तका उफान आने लगा और महान् वेगशालिनी नदियाँ उलटी अपने उद्गमकी ओर बहने लगीं ।। ५८ १/२ ।। पुँल्लिङ्गा इव नार्यस्तु स्त्रीलिङ्गा पुरुषाभवन् ॥ ५९ ॥ दुर्योधने तदा राजन् पतिते तनये तव । राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनके धराशायी होनेपर स्त्रियोंमें पुरुषत्व और पुरुषोंमें स्त्रीत्वके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे ।। ५९ १/२ ।। दृष्ट्वा तानद्भुतोत्पातान् पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ ६० ॥ आविग्नमनसः सर्वे बभूवुर्भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उन अद्भुत उत्पातोंको देखकर पाण्डवोंसहित समस्त पाञ्चाल मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे ।। ६० १/२ ।। ययुर्देवा यथाकामं गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ६१ ॥ कथयन्तोऽद्भुतं युद्धं सुतयोस्तव भारत । भारत! तदनन्तर देवता, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपके दोनों पुत्रोंके अद्भुत युद्धकी चर्चा करते हुए अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ।। ६१ १/२ ।। तथैव सिद्धा राजेन्द्र तथा वातिकचारणाः ।