महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2914, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुमुचुस्ते महानादं तव पुत्रे निपातिते । वहाँ जो घोड़े, हाथी और मनुष्य शेष रह गये थे, वे सभी आपके पुत्रके मारे जानेपर महान् कोलाहल करने लगे ।। भेरीशङ्खमृदङ्गानामभवच्च स्वनो महान् ॥ ५५ ॥ अन्तर्भूमिगतश्चैव तव पुत्रे निपातिते । राजन्! जब आपका पुत्र मार गिराया गया, उस समय इस भूतलपर भेरी, शंखों और मृदंगोंका गम्भीर घोष होने लगा ।। ५५ १/२ ।। बहुपादैर्बहुभुजैः कबन्धैर्घोरदर्शनैः ॥ ५६ ॥ नृत्यद्भिर्भयदैर्व्याप्ता दिशस्तत्राभवन् नृप । नरेश्वर! वहाँ सम्पूर्ण दिशाओंमें नाचते हुए अनेक पैर और अनेक बाँहवाले घोर एवं भयंकर कबन्ध व्याप्त हो रहे थे ।। ५६ १/२ ।। ध्वजवन्तोऽस्त्रवन्तश्च शस्त्रवन्तस्तथैव च ॥ ५७ ॥ प्राकम्पन्त ततो राजंस्तव पुत्रे निपातिते । राजन्! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर वहाँ अस्त्र-शस्त्र और ध्वजावाले सभी वीर काँपने लगे ।। ५७ १/२ ।। ह्रदाः कूपाश्च रुधिरमुद्वेमुर्नृपसत्तम ॥ ५८ ॥ नद्यश्च सुमहावेगाः प्रतिस्रोतोवहाभवन् । नृपश्रेष्ठ! तालाबों और कूपोंमें रक्तका उफान आने लगा और महान् वेगशालिनी नदियाँ उलटी अपने उद्गमकी ओर बहने लगीं ।। ५८ १/२ ।। पुँल्लिङ्गा इव नार्यस्तु स्त्रीलिङ्गा पुरुषाभवन् ॥ ५९ ॥ दुर्योधने तदा राजन् पतिते तनये तव । राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनके धराशायी होनेपर स्त्रियोंमें पुरुषत्व और पुरुषोंमें स्त्रीत्वके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे ।। ५९ १/२ ।। दृष्ट्वा तानद्भुतोत्पातान् पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ ६० ॥ आविग्नमनसः सर्वे बभूवुर्भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उन अद्भुत उत्पातोंको देखकर पाण्डवोंसहित समस्त पाञ्चाल मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे ।। ६० १/२ ।। ययुर्देवा यथाकामं गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ६१ ॥ कथयन्तोऽद्भुतं युद्धं सुतयोस्तव भारत । भारत! तदनन्तर देवता, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपके दोनों पुत्रोंके अद्भुत युद्धकी चर्चा करते हुए अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ।। ६१ १/२ ।। तथैव सिद्धा राजेन्द्र तथा वातिकचारणाः ।