महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2913, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंगर्जना की और उसकी जाँघोंपर बड़े वेगसे गदा चलायी ॥ ४५-४६ ॥ सा वज्रनिष्पेषसमा प्रहिता भीमकर्मणा । ऊरू दुर्योधनस्याथ बभञ्ज प्रियदर्शनौ ॥ ४७ ॥ भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनके द्वारा चलायी हुई वह गदा वज्रपातके समान गिरी और दुर्योधनकी सुन्दर दिखायी देनेवाली जाँघोंको उसने तोड़ दिया ॥ ४७ ॥ स पपात नरव्याघ्रो वसुधामनुनादयन् । भग्नोरुर्भीमसेनेन पुत्रस्तव महीपते ॥ ४८ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार जब भीमसेनने उसकी जाँघें तोड़ डालीं, तब आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ गिर पड़ा ॥ ४८ ॥ ववुर्वाताः सनिर्घाताः पांशुवर्षं पपात च । चचाल पृथिवी चापि सवृक्षक्षुपपर्वता ॥ ४९ ॥ तस्मिन् निपतिते वीरे पत्यौ सर्वमहीक्षिताम् । फिर तो समस्त भूपालोंके स्वामी वीर राजा दुर्योधनके धराशायी होनेपर वहाँ बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ प्रचण्ड हवा चलने लगी, धूलिकी वर्षा होने लगी और वृक्षों, वनों एवं पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ४९१/२ ॥ महास्वना पुनर्दीप्ता सनिर्घाता भयंकरी ॥ ५० ॥ पपात चोल्का महती पतिते पृथिवीपतौ । पृथिवीपति दुर्योधनके गिर जानेपर आकाशसे पुनः महान् शब्द और बिजलीकी कड़कके साथ प्रज्वलित, भयंकर एवं विशाल उल्का भूमिपर गिरी ॥ ५०१/२ ॥ तथा शोणितवर्षं च पांशुवर्षं च भारत ॥ ५१ ॥ ववर्ष मधवांस्तत्र तव पुत्रे निपातिते । भरतनन्दन! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर इन्द्रने वहाँ रक्त और धूलिकी वर्षा की ॥ ५११/२ ॥ यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च ॥ ५२ ॥ अन्तरिक्षे महानादः श्रूयते भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उस समय आकाशमें यक्षों, राक्षसों तथा पिशाचोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ५२१/२ ॥ तेन शब्देन घोरेण मृगाणामथ पक्षिणाम् ॥ ५३ ॥ जज्ञे घोरतरः शब्दो बहूनां सर्वतोदिशम् । उस घोर शब्दके साथ बहुत-से पशुओं और पक्षियों-की भयानक आवाज भी सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठी ॥ ५३१/२ ॥ ये तत्र वाजिनः शेषा गजाश्च मनुजैः सह ॥ ५४ ॥