भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2898

आपका पुत्र दुर्योधन अपने शत्रु पाण्डुकुमार भीमसेनको वह अनुपम वेगशालिनी गदा घुमाते देख आश्चर्यमें पड़ गया ।। १४ ।। चरंश्च विविधान् मार्गान् मण्डलानि च भारत । अशोभत तदा वीरो भूय एव वृकोदरः ।। १५ ।। भरतनन्दन! वीर भीमसेन भाँति-भाँतिके मार्गों और मण्डलोंका प्रदर्शन करते हुए पुनः बड़ी शोभा पाने लगे ।। तौ परस्परमासाद्य यत्तावन्योन्यरक्षणे । मार्जारविव भक्षार्थे ततक्षाते मुहुर्मुहुः ।। १६ ।। वे दोनों परस्पर भिड़कर एक-दूसरेसे अपनी रक्षाके लिये प्रयत्नशील हो रोटीके टुकड़ोंके लिये लड़नेवाले दो बिलावोंके समान बारंबार आघात-प्रतिघात कर रहे थे ।। १६ ।। अचरद् भीमसेनस्तु मार्गान् बहुविधांस्तथा । मण्डलानि विचित्राणि गतप्रत्यागतानि च ।। १७ ।। उस समय भीमसेन नाना प्रकारके मार्ग और विचित्र मण्डल दिखाने लगे। वे कभी शत्रुके सम्मुख आगे बढ़ते और कभी उसका सामना करते हुए ही पीछे हट आते थे ।। अस्त्रयन्त्राणि चित्राणि स्थानानि विविधानि च । परिमोक्षं प्रहाराणां वर्जनं परिधावनम् ।। १८ ।। विचित्र अस्त्र-यन्त्रों और भाँति-भाँतिके स्थानोंका प्रदर्शन करते हुए वे दोनों शत्रुके प्रहारोंसे अपनेको बचाते, विपक्षीके प्रहारको व्यर्थ कर देते और दायें-बायें दौड़ लगाते थे ।। १८ ।। अभिद्रवणमाक्षेपमवस्थानं सविग्रहम् । परिवर्तनसंवर्तमवप्लुतमुपप्लुतम् ।। १९ ।। उपन्यस्तमपन्यस्तं गदायुद्धविशारदौ । एवं तौ विचरन्तौ तु परस्परमविध्यताम् ।। २० ।। कभी वेगसे एक-दूसरेके सामने जाते, कभी विरोधीको गिरानेकी चेष्टा करते, कभी स्थिरभावसे खड़े होते, कभी गिरे हुए शत्रुके उठनेपर पुनः उसके साथ युद्ध करते, कभी विरोधीपर प्रहार करनेके लिये चक्कर काटते, कभी शत्रुके बढ़ावको रोक देते, कभी विपक्षीके प्रहारको विफल करनेके लिये झुककर निकल जाते, कभी उछलते-कूदते, कभी निकट आकर गदाका प्रहार करते और कभी लौटकर पीछेकी ओर किये हुए हाथसे शत्रुपर आघात करते थे। दोनों ही गदायुद्धके विशेषज्ञ थे और इस प्रकार पैंतरे बदलते हुए एक-दूसरेपर चोट करते थे ।। १९-२० ।। वञ्चयानौ पुनश्चैव चेरतुः कुरुसत्तमौ । विक्रीडन्तौ सुबलिनौ मण्डलानि विचेरतुः ।। २१ ।।