भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2897

इस प्रकार चलते हुए उस अत्यन्त भयंकर घमासान युद्धमें लड़ते-लड़ते वे दोनों शत्रुदमन वीर बहुत थक गये ।। तौ मुहूर्तं समाश्वस्य पुनरेव परंतपौ । सम्पहारयतां चित्रे सम्प्रगृह्य गदे शुभे ॥ ७ ॥ फिर उन दोनोंने दो घड़ीतक विश्राम किया। इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों योद्धा फिर विचित्र एवं सुन्दर गदाएँ हाथमें लेकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ७ ॥ तौ तु दृष्ट्वा महावीर्यौ समाश्वस्तौ नरर्षभौ । बलिनौ वारणौ यद्वद् वासितार्थे मदोत्कटौ ॥ ८ ॥ समानवीर्यौ सम्प्रेक्ष्य प्रगृहीतगदावुभौ । विस्मयं परमं जग्मुर्देवगन्धर्वमानवाः ॥ ९ ॥ उन समान बलशाली महापराक्रमी नरश्रेष्ठ वीरोंने विश्राम करके पुनः हाथमें गदा ले ली और मैथुनकी इच्छावाली हथिनीके लिये लड़नेवाले दो बलवान् एवं मदोन्मत्त गजराजोंके समान पुनः युद्ध आरम्भ कर दिया है, यह देखकर देवता, गन्धर्व और मनुष्य सभी अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे ॥ ८-९ ॥ प्रगृहीतगदौ दृष्ट्वा दुर्योधनवृकोदरौ । संशयः सर्वभूतानां विजये समपद्यत ॥ १० ॥ दुर्योधन और भीमसेनको पुनः गदा उठाये देख उनमेंसे किसी एककी विजयके सम्बन्धमें समस्त प्राणियोंके हृदयमें संशय उत्पन्न हो गया ॥ १० ॥ समागम्‍य ततो भूयो भ्रातरौ बलिनां वरौ । अन्योन्यस्यान्तरप्रेप्सू प्रचक्रातेऽन्तरं प्रति ॥ ११ ॥ बलवानोंमें श्रेष्ठ उन दोनों भाइयोंमें जब पुनः भिड़न्त हुई तो दोनों ही दोनोंके चूकनेका अवसर देखते हुए पैंतरे बदलने लगे ॥ ११ ॥ यमदण्डोपमां गुर्वीमिन्द्राशनिमिवोद्यताम् । ददृशुः प्रेक्षका राजन् रौद्रीं विशसनीं गदाम् ॥ १२ ॥ आविद्ध्यतो गदां तस्य भीमसेनस्य संयुगे । शब्दः सुतुमुलॊ घोरो मुहूर्तं समपद्यत ॥ १३ ॥ राजन्! उस समय युद्धस्थलमें जब भीमसेन अपनी गदा घुमाने लगे, तब दर्शकोंने देखा, उनकी भारी गदा यमदण्डके समान भयंकर है। वह इन्द्रके वज्रके समान ऊपर उठी हुई है और शत्रुको छिन्न-भिन्न कर डालनेमें समर्थ है। गदा घुमाते समय उसकी घोर एवं भयानक आवाज वहाँ दो घड़ीतक गूँजती रही ॥ १२-१३ ॥ आविद्ध्यन्तमरिं प्रेक्ष्य धार्तराष्ट्रोऽथ पाण्डवम् । गदामतुलवेगां तां विस्मितः सम्बभूव ह ॥ १४ ॥