भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2899

कुरुकुलके वे दोनों श्रेष्ठ और बलवान् वीर विपक्षीको चकमा देते हुए बारंबार युद्धके खेल दिखाते तथा पैंतरे बदलते थे ।। २१ ।। तौ दर्शयन्तौ समरे युद्धक्रीडां समन्ततः । गदाभ्यां सहसान्योन्यमाजघ्नतुररिंदमौ ।। २२ ।। समरांगणमें सब ओर युद्धकी क्रीडाका प्रदर्शन करते हुए उन दोनों शत्रुदमन वीरोंने सहसा अपनी गदाओंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार किया ।। २२ ।। परस्परं समासाद्य दंष्ट्राभ्यां द्विरदौ यथा । अशोभेतां महाराज शोणितेन परिप्लुतौ ।। २३ ।। महाराज! जैसे दो हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर प्रहार करके लहुलुहान हो जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों एक-दूसरेपर चोट करके खूनसे भीगकर शोभा पाने लगे ।। २३ ।। एवं तदभवद् युद्धं घोररूपं परंतप । परिवृत्तेऽहनि क्रूरं वृत्रवासवयोरिव ।। २४ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! इस प्रकार दिनकी समाप्तिके समय उन दोनों वीरोंमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान क्रूरतापूर्ण एवं भयंकर युद्ध होने लगा ।। गदाहस्तौ ततस्तौ तु मण्डलावस्थितौ बली । दक्षिणं मण्डलं राजन् धार्तराष्ट्रोऽभ्यवर्तत ।। २५ ।। सव्यं तु मण्डलं तत्र भीमसेनोऽभ्यवर्तत । राजन्! दोनों ही हाथमें गदा लेकर मण्डलाकार युद्धस्थलमें खड़े थे। उनमेंसे बलवान् दुर्योधन दक्षिण मण्डलमें खड़ा था और भीमसेन बायें मण्डलमें ।। २५ १/२ ।। तथा तु चरतस्तस्य भीमस्य रणमूर्धनि ।। २६ ।। दुर्योधनो महाराज पार्श्वदेशेऽभ्यताडयत् । महाराज! युद्धके मुहानेपर वाममण्डलमें विचरते हुए भीमसेनकी पसलीमें दुर्योधनने गदा मारी ।। २६ १/२ ।। आहतस्तु ततो भीमः पुत्रेण तव भारत ।। २७ ।। आविद्धयत गदां गुर्वीं प्रहारं तमचिन्तयन् । भरतनन्दन! आपके पुत्रद्वारा आहत किये गये भीमसेन उस प्रहारको कुछ भी न गिनते हुए अपनी भारी गदा घुमाने लगे ।। २७ १/२ ।। इन्द्राशनिसमां घोरां यमदण्डमिवोद्यताम् ।। २८ ।। ददृशुस्ते महाराज भीमसेनस्य तां गदाम् । राजेन्द्र! दर्शकोंने भीमसेनकी उस भयंकर गदाको इन्द्रके वज्र और यमराजके दण्डके समान उठी हुई देखा ।। आविध्यन्तं गदां दृष्ट्वा भीमसेनं तवात्मजः ।। २९ ।। समुद्यम्य गदां घोरां प्रत्यविध्यत् परंतपः ।