महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2900, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओंको संताप देनेवाले आपके पुत्र दुर्योधनने भीमसेनको गदा घुमाते देख अपनी भयंकर गदा उठाकर उनकी गदापर दे मारी ।। २९१/२ ।।
गदामारुतवेगेन तव पुत्रस्य भारत ।। ३० ।।
शब्द आसीत् सुतुमुलस्तेजश्च समजायत ।
भारत! आपके पुत्रकी वायुतुल्य गदाके वेगसे उस गदाके टकरानेपर बड़े जोरका शब्द हुआ और दोनों गदाओंसे आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं ।। ३०१/२ ।।
स चरन् विविधान् मार्गान् मण्डलानि च भागशः ।। ३१ ।।
समशोभत तेजस्वी भूयो भीमात् सुयोधनः ।
नाना प्रकारके मार्गों और भिन्न-भिन्न मण्डलोंसे विचरते हुए तेजस्वी दुर्योधनकी उस समय भीमसेनसे अधिक शोभा हुई ।। ३११/२ ।।
आविद्धा सर्ववेगेन भीमेन महती गदा ।। ३२ ।।
सधूमं सार्चिषं चाग्निं मुमोचोग्रमहास्वना ।
भीमसेनके द्वारा सम्पूर्ण वेगसे घुमायी गयी वह विशाल गदा उस समय भयंकर शब्द करती हुई धूम और ज्वालाओंसहित आग प्रकट करने लगी ।। ३२१/२ ।।
आधूतां भीमसेनेन गदां दृष्ट्वा सुयोधनः ।। ३३ ।।
अद्रिसारमयीं गुर्वीमाविध्यन् बह्वशोभत ।
भीमसेनके द्वारा घुमायी गयी उस गदाको देखकर दुर्योधन भी अपनी लोहमयी भारी गदाको घुमाता हुआ अधिक शोभा पाने लगा ।। ३३१/२ ।।
गदामारुतवेगं हि दृष्ट्वा तस्य महात्मनः ।। ३४ ।।
भयं विवेश पाण्डूंस्तु सर्वानैव ससोमकान् ।
उस महामनस्वी वीरकी वायुतुल्य गदाके वेगको देखकर सोमकोंसहित समस्त पाण्डवोंके मनमें भय समा गया ।। ३४१/२ ।।
तौ दर्शयन्तौ समरे युद्धक्रीडां समन्ततः ।। ३५ ।।
गदाभ्यां सहसान्योन्यमाजघ्नतुररिंदमौ ।
समरांगणमें सब ओर युद्धकी क्रीडाका प्रदर्शन करते उन दोनों शत्रुदमन वीरोंने सहसा अपनी गदाओंद्धारा एक-दूसरेपर प्रहार किया ।। ३५१/२ ।।
तौ परस्परमासाद्य दंष्ट्राभ्यां द्विरदौ यथा ।। ३६ ।।
अशोभेतां महाराज शोणितेन परिप्लुतौ ।
महाराज! जैसे दो हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर प्रहार करके लहुलुहान हो जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों एक-दूसरेपर चोट करके खूनसे लथपथ हो अद्भुत शोभा पाने लगे ।। ३६१/२ ।।
एवं तदभवद् युद्धं घोररूपमंसंवृतम् ।। ३७ ।।