महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2902, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! आपके पुत्रके आघातसे पीड़ित होनेपर भी पाण्डुपुत्र भीमसेन विचलित नहीं हुए। वह अद्भुत-सी बात हुई ।। ४४ १/२ ।। आश्चर्यं चापि तद् राजन् सर्वसैन्यान्यपूजयन् ।। ४५ ।। यद् गदाभिहतो भीमो नाकम्पत पदात् पदम् । राजन्! गदाकी चोट खाकर भी जो भीमसेन एक पग भी इधर-उधर नहीं हुए, वह महान् आश्चर्यकी बात थी, जिसकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ४५ १/२ ।। ततो गुरुतरां दीप्तां गदां हेमपरिष्कृताम् ।। ४६ ।। दुर्योधनाय व्यसृजद् भीमो भीमपराक्रमः । तदनन्तर भयंकर पराक्रमी भीमसेनने दुर्योधनपर अपनी सुवर्णजटित तेजस्विनी एवं बड़ी भारी गदा छोड़ी ।। तं प्रहारमसम्भ्रान्तो लाघवेन महाबलः ।। ४७ ।। मोघं दुर्योधनश्चक्रे तत्राभूद् विस्मयो महान् । परंतु महाबली दुर्योधनको इससे तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उसने फुर्तीसे इधर-उधर होकर उस प्रहारको व्यर्थ कर दिया। यह देख वहाँ सब लोगोंको महान् आश्चर्य हुआ ।। ४७ १/२ ।। सा तु मोघा गदा राजन् पतन्ती भीमचोदिता ।। ४८ ।। चालयामास पृथिवीं महानिर्घातनिःस्वना । राजन्! भीमसेनकी चलायी हुई वह गदा जब व्यर्थ होकर गिरने लगी, उस समय उसने वज्रपातके समान महान् शब्द प्रकट करके पृथिवीको हिला दिया ।। ४८ १/२ ।। आस्थाय कौशिकान् मार्गानुत्पतन् स पुनः पुनः ।। ४९ ।। गदानिपातं प्रज्ञाय भीमसेनं च वञ्चितम् । वञ्चयित्वा तदा भीमं गदया कुरुसत्तमः ।। ५० ।। ताडयामास संक्रुद्धो वक्षोदेशे महाबलः । जब राजा दुर्योधनने देखा कि भीमसेनकी गदा नीचे गिर गयी और उनका वार खाली गया, तब क्रोधमें भरे हुए महाबली कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनने कौशिक मार्गोंका आश्रय ले बार-बार उछलकर भीमसेनको धोखा देकर उनकी छातीमें गदा मारी ।। ४९-५० १/२ ।। गदया निहतो भीमो मुह्यमानो महारणे ।। ५१ ।। नाभ्यमन्यत कर्तव्यं पुत्रेणाभ्याहतस्तव । उस महासमरमें आपके पुत्रकी गदाकी चोट खाकर भीमसेन मूर्च्छित-से हो गये और एक क्षणतक उन्हें अपने कर्तव्यका ज्ञानतक न रहा ।। ५१ १/२ ।। तस्मिंस्तथा वर्तमाने राजन् सोमकपाण्डवाः ।। ५२ ।। भृशोपहतसंकल्पा न हृष्टमनसोऽभवन् ।