महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2905, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारथः शिक्षितवत् परिभ्रमन् । अताडयत् पाण्डवमग्रतः स्थितं स विह्वलाङ्गो जगतीमुपास्पृशत् ॥ ६६ ॥ सदा अमर्षमें भरे रहनेवाले महारथी राजा दुर्योधनने एक शिक्षित योद्धाकी भाँति विचरते हुए अपने सामने खड़े भीमसेनपर पुनः गदाका प्रहार किया। उसकी चोट खाकर भीमसेनका सारा शरीर शिथिल हो गया और उन्होंने धरती थाम ली ॥ ६६ ॥
स सिंहनादं विननाद कौरवो निपात्य भूमौ युधि भीममोजसा । बिभेद चैवाशनितुल्यमोजसा गदानिपातेन शरीररक्षणम् ॥ ६७ ॥ भीमसेनको युद्धस्थलमें बलपूर्वक भूमिपर गिराकर कुरुराज दुर्योधन सिंहके समान दहाड़ने लगा। उसने सारी शक्ति लगाकर चलायी हुई गदाके आघातसे भीमसेनके वज्रतुल्य कवचका भेदन कर दिया था ॥ ६७ ॥
ततोऽन्तरिक्षे निनदो महानभूद् दिवौकसामप्सरसां च नेदुषाम् । पपात चोच्चैरमरप्रवेरितं विचित्रपुष्पोत्करवर्षमुत्तमम् ॥ ६८ ॥ उस समय आकाशमें हर्षध्वनि करनेवाले देवताओं और अप्सराओंका महान् कोलाहल गूँज उठा। साथ ही देवताओंद्वारा बहुत ऊँचेसे की हुई विचित्र पुष्पसमूहोंकी वहाँ अच्छी वर्षा होने लगी ॥ ६८ ॥
ततः परानाविशदुत्तमं भयं समीक्ष्य भूमौ पतितं नरोत्तमम् । अहीयमानं च बलेन कौरवं निशाम्य भेदं सुदृढस्य वर्मणः ॥ ६९ ॥ राजन्! तदनन्तर यह देखकर कि भीमसेनका सुदृढ़ कवच छिन्न-भिन्न हो गया, नरश्रेष्ठ भीम धराशायी हो गये और कुरुराज दुर्योधनका बल क्षीण नहीं हो रहा है, शत्रुओंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ ६९ ॥
ततो मुहूर्तादुपलभ्य चेतनां प्रमृज्य वक्त्रं रुधिराक्तमात्मनः । धृतिं समालम्ब्य विवृत्य लोचने बलेन संस्तभ्य वृकोदरः स्थितः ॥ ७० ॥ तत्पश्चात् दो घड़ीमें सचेत हो भीमसेन खूनसे भींगे हुए अपने मुँहको पोंछते हुए उठे और बलपूर्वक अपनेको सँभालकर धैर्यका आश्रय ले आँख खोलकर देखते हुए पुनः