महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2906, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धके लिये खड़े हो गये ॥ ७० ॥ (ततो यमौ यमसदृशौ पराक्रमे सपार्षतः शिनितनयश्च वीर्यवान् । समाह्वयन्नहमित्यभित्वरं- स्तवात्मजं समभिययुर्जयैषिणः ॥ उस समय यमराजके सदृश पराक्रमी नकुल और सहदेव, धृष्टद्युम्न तथा पराक्रमी शिनिपौत्र सात्यकि—ये सब-के-सब विजयके अभिलाषी हो 'मैं लड़ूँगा, मैं लड़ूँगा' ऐसा कहकर बड़ी उतावलीके साथ आपके पुत्रको ललकारने और उसपर आक्रमण करने लगे। निगृह्य तान् पुनरपि पाण्डवो बली तवात्मजं स्वयमभिगम्य कालवत् । चचार च व्यपगतखेदवेपथुः सुरेश्वरो नमुचिमिवोत्तमं रणे ॥) परंतु बलवान् पाण्डुपुत्र भीमने उन सबको रोककर स्वयं ही आपके पुत्रपर पुनः कालके समान आक्रमण किया और खेद एवं कम्पसे रहित होकर वे रणभूमिमें उसी प्रकार विचरने लगे, जैसे देवराज इन्द्र श्रेष्ठ दैत्य नमुचिपर आक्रमण करके युद्धस्थलमें विचरण करते थे।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि गदायुद्धे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें गदायुद्धविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७२ श्लोक हैं।)