भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2909

अर्थसे भरा हुआ है उसे सुना रहा हूँ, मेरे कहनेसे वह श्लोक सुनो ।। १३-१४ ।। पुनरावर्तमानानां भग्नानां जीवितैषिणाम् । भेतव्यमरिशेषाणामेकायनगता हिते ।। १५ ।। ‘मरनेसे बचे हुए शत्रुगण यदि युद्धमें जान बचानेकी इच्छासे भाग गये हों और पुनः युद्धके लिये लौटने लगे हों तो उनसे डरते रहना चाहिये; क्योंकि वे एक निश्चयपर पहुँचे हुए होते हैं (उस समय वे मृत्युसे भी नहीं डरते हैं)’ ।। १५ ।। साहसोत्पतितानां च निराशानां च जीविते । न शक्यमग्रतः स्थातुं शक्रेणापि धनंजय ।। १६ ।। धनंजय! जो जीवनकी आशा छोड़कर साहसपूर्वक युद्धमें कूद पड़े हों, उनके सामने इन्द्र भी नहीं ठहर सकते ।। १६ ।। सुयोधनमिमं भग्नं हतसैन्यं हृदं गतम् । पराजितं वनप्रेप्सुं निराशं राज्यलम्भने ।। १७ ।। को न्वेष संयुगे प्राज्ञः पुनर्द्वन्द्वे समाह्वयेत् । इस दुर्योधनकी सेना मारी गयी थी। यह परास्त हो गया था और अब राज्य पानेसे निराश हो वनमें चला जाना चाहता था; इसीलिये भागकर पोखरेमें छिपा था, ऐसे हताश शत्रुको कौन बुद्धिमान् पुरुष समरांगणमें द्वन्द्व-युद्धके लिये आमन्त्रित करेगा? ।। १७ ½ ।। अपि नो निर्जितं राज्यं न हरेत सुयोधनः ।। १८ ।। यस्त्रयोदशवर्षाणि गदया कृतनिश्रमः । चरत्यूर्ध्वं च तिर्यक् च भीमसेनजिघांसया ।। १९ ।। कहीं ऐसा न हो कि हमारे जीते हुए राज्यको दुर्योधन फिर हड़प ले। उसने तेरह वर्षोंतक गदाद्वारा युद्ध करनेका निरन्तर श्रम एवं अभ्यास किया है। देखो, यह भीमसेनके वधकी इच्छासे इधर-उधर और ऊपरकी ओर विचर रहा है ।। १८-१९ ।। एनं चेन्न महाबाहुरन्यायेन हनिष्यति । एष वः कौरवो राजा धार्तराष्ट्रो भविष्यति ।। २० ।। यदि महाबाहु भीमसेन इसे अन्यायपूर्वक नहीं मारेंगे तो यह धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन ही आपका तथा समस्त कुरुकुलका राजा होगा ।। २० ।। धनंजयस्तु श्रुत्वैतत् केशवस्य महात्मनः । प्रेक्षतो भीमसेनस्य सव्यमूरुमताडयत् ।। २१ ।। महात्मा भगवान् केशवका यह वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनके देखते हुए अपनी बायीं जाँघको ठोंका ।। २१ ।। गृह्य संज्ञां ततो भीमो गदया व्यचरद् रणे । मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च ।। २२ ।।