महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2910, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइससे संकेत पाकर भीमसेन रणभूमिमें गदाद्वारा यमक तथा अन्य प्रकारके विचित्र मण्डल दिखाते हुए विचरने लगे ॥ २२ ॥ दक्षिणं मण्डलं सव्यं गोमूत्रकमथापि च । व्यचरत् पाण्डवो राजन्नर्रिं संमोहयन्निव ॥ २३ ॥ राजन्! पाण्डुपुत्र भीमसेन आपके पुत्रको मोहित करते हुए-से दक्षिण, वाम और गोमूत्रक मण्डलसे विचरने लगे ॥ २३ ॥ तथैव तव पुत्रोऽपि गदामार्गविशारदः । व्यचरल्लघु चित्रं च भीमसेनजिघांसया ॥ २४ ॥ इसी प्रकार गदायुद्धकी प्रणालीका विशेषज्ञ आपका पुत्र भी भीमसेनके वधकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक विचित्र पैंतरे देता हुआ विचरने लगा ॥ २४ ॥ आधुन्वन्तो गदे घोरे चन्दनागरुरूषिते । वैरस्यान्तं परीप्सन्तौ रणे क्रुद्धाविवान्तकौ ॥ २५ ॥ वैरका अन्त करनेकी इच्छावाले वे दोनों वीर रणभूमिमें चन्दन और अगुरुसे चर्चित भयंकर गदाएँ घुमाते हुए कुपित कालके समान प्रतीत होते थे ॥ २५ ॥ अन्योन्यं तौ जिघांसन्तौ प्रवीरौ पुरुषर्षभौ । युयुधाते गरुत्मन्तौ यथा नागामिषैषिणौ ॥ २६ ॥ जैसे दो गरुड़ किसी सर्पके मांसको पानेकी इच्छासे परस्पर लड़ रहे हों, उसी प्रकार एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वे दोनों पुरुषप्रवर प्रमुख वीर भीमसेन और दुर्योधन आपसमें जूझ रहे थे ॥ २६ ॥ मण्डलानि विचित्राणि चरतोर्नृपभीमयोः । गदासम्पातजास्तत्र प्रजज्ञुः पावकार्चिषः ॥ २७ ॥ विचित्र मण्डलों (पैंतरों)-से विचरते हुए राजा दुर्योधन और भीमसेनकी गदाओंके टकरानेसे वहाँ आगकी लपटें प्रकट होने लगीं ॥ २७ ॥ समं प्रहरतोस्तत्र शूरयोर्बलिनोर्मृधे । क्षुब्धयोर्वायुना राजन् द्वयोरिव समुद्रयोः ॥ २८ ॥ तयोः प्रहरतोस्तुल्यं मत्तकुञ्जरयोरिव । गदानिर्घातसंह्नादः प्रहाराणामजायत ॥ २९ ॥ राजन्! जैसे वायुसे विक्षुब्ध हुए दो समुद्र एक-दूसरेसे टकरा रहे हों अथवा दो मतवाले हाथी परस्पर चोट कर रहे हों, उसी प्रकार वहाँ एक-दूसरेपर समान रूपसे प्रहार करनेवाले दोनों बलवान् वीरोंके परस्पर चोट करनेपर गदाओंके टकरानेकी आवाज वज्रकी कड़कके समान प्रकट होती थी ॥ २८-२९ ॥ तस्मिंस्तदा सम्प्रहारे दारुणे संकुले भृशम् । उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानाव्रिंदमौ ॥ ३० ॥