महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1784)
एकत्रिंशोऽध्यायः
रात्रिमें कौरवोंकी मन्त्रणा, धृतराष्ट्रके द्वारा दैवकी प्रबलताका प्रतिपादन, संजयद्वारा धृतराष्ट्रपर दोषारोप तथा कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत
धृतराष्ट्र उवाच
स्वेनच्छन्देन नः सर्वानवधीद् व्यक्तमर्जुनः ।
न ह्यस्य समरे मुच्येद्दन्तकोऽप्यातातयिनः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! निश्चय ही अर्जुनने अपनी इच्छासे हमारे सब सैनिकोंका वध किया। समरांगणमें यदि वे शस्त्र उठा लें तो यमराज भी उनके हाथसे जीवित नहीं छूट सकता ॥ १ ॥
पार्थश्चैकोऽहरद् भद्रामेकश्चाग्निमतर्पयत् ।
एकश्चेमां महीं जित्वा चक्रे बलिभूतो नृपान् ॥ २ ॥
अर्जुनने अकेले ही सुभद्राका अपहरण किया, अकेले ही खाण्डव वनमें अग्निदेवको तृप्त किया और अकेले ही इस पृथ्वीको जीतकर सम्पूर्ण नरेशोंको कर देनेवाला बना दिया ॥ २ ॥
एको निवातकवचानहनद् दिव्यकार्मुकः ।
एकः किरातरूपेण स्थितं शर्वमयोधयत् ॥ ३ ॥
उन्होंने दिव्य धनुष धारण करके अकेले ही निवातकवचोंका संहार कर डाला और किरातरूप धारण करके खड़े हुए महादेवजीके साथ भी अकेले ही युद्ध किया ॥ ३ ॥
एको ह्यरक्षद् भरतानेको भवमतोषयत् ।
तेनैकेन जिताः सर्वे महीपा ह्युग्रतेजसा ॥ ४ ॥
अर्जुनने अकेले ही घोषयात्राके समय दुर्योधन आदि भरतवंशियोंकी रक्षा की, अकेले ही अपने पराक्रमसे महादेवजीको संतुष्ट किया और उन उग्रतेजस्वी वीरने अकेले ही (विराटनगरमें) कौरव-दलके समस्त भूमिपालोंको पराजित किया था ॥ ४ ॥
न ते निन्द्याः प्रशस्यास्ते यत्ते चक्रुर्ब्रवीहि तत् ।
ततो दुर्योधनः सूत पश्चात् किमकरोत् तदा ॥ ५ ॥
इसलिये वे हमारे पक्षके सैनिक या नरेश निन्दनीय नहीं हैं, प्रशंसाके ही पात्र हैं। उन्होंने जो कुछ किया हो, बताओ। सूत! सेनाके शिविरमें लौट आनेके पश्चात् उस समय दुर्योधनने क्या किया? ॥ ५ ॥
संजय उवाच
हतप्रहतविध्वस्ता विवर्मायुधवाहनाः । दीनस्वरा दूयमाना मानिनः शत्रुनिर्जिताः ॥ ६ ॥ संजय बोले— राजन्! कौरव-सैनिक बाणोंसे घायल, छिन्न-भिन्न अवयवोंसे युक्त और अपने वाहनोंसे भ्रष्ट हो गये थे। उनके कवच, आयुध और वाहन नष्ट हो गये थे। उनके स्वरोंमें दीनता थी। शत्रुओंसे पराजित होनेके कारण वे स्वाभिमानी कौरव मन-ही-मन बहुत दुःख पा रहे थे ।।
शिबिरस्थाः पुनर्मन्त्रं मन्त्रयन्ति स्म कौरवाः । भग्नदंष्ट्रा हतविषाः पादाक्रान्ता इवोरगाः ॥ ७ ॥ शिविरमें आनेपर वे कौरव पुनः गुप्त मन्त्रणा करने लगे। उस समय उनकी दशा पैरसे कुचले गये उन सर्पोंके समान हो रही थी, जिनके दाँत तोड़ दिये और विष नष्ट कर दिये गये हों ॥ ७ ॥
तानब्रवीत् ततः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । करं करेण निष्पीड्य प्रेक्षमाणस्तवात्मजम् ॥ ८ ॥ उस समय क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए सर्पके समान कर्णने हाथ-से-हाथ दबाकर आपके पुत्रकी ओर देखते हुए उन कौरव वीरोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥
यत्तो दृढश्च दक्षश्च धृतिमानर्जुनस्तदा । सम्बोधयति चाप्येनं यथाकालमधोक्षजः ॥ ९ ॥ 'अर्जुन सावधान, दृढ़, चतुर और धैर्यवान् हैं। साथ ही उन्हें समय-समयपर श्रीकृष्ण भी कर्तव्यका ज्ञान कराते रहते हैं ।। ९ ।।
सहसास्त्रविसर्गेण वयं तेनाद्य वञ्चिताः । श्वस्त्वहं तस्य संकल्पं सर्वं हन्ता महीपते ॥ १० ॥ 'इसीलिये उन्होंने सहसा अस्त्रोंका प्रयोग करके आज हमें ठग लिया है; परंतु भूपाल! कल मैं उनके सारे मनसूबेको नष्ट कर दूँगा' ॥ १० ॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽनुजज्ञे नृपोत्तमान् । तेऽनुज्ञाता नृपाः सर्वे स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ११ ॥ कर्णके ऐसा कहनेपर दुर्योधनने 'तथास्तु' कहकर समस्त श्रेष्ठ राजाओंको विश्रामके लिये जानेकी आज्ञा दी। आज्ञा पाकर वे सब नरेश अपने-अपने शिविरोंमें चले गये ॥ ११ ॥
सुखोषितास्तां रजनीं हृष्टा युद्धाय निर्ययुः । तेऽपश्यन् विहितं व्यूहं धर्मराजेन दुर्जयम् ॥ १२ ॥ प्रयत्नात् कुरुमुख्येन बृहस्पत्युशनोमते ।
वहाँ रातभर सुखसे रहे। फिर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकले। निकलकर उन्होंने देखा कि कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष धर्मराज युधिष्ठिरने बृहस्पति और शुक्राचार्यके मतके अनुसार प्रयत्नपूर्वक अपनी सेनाका दुर्जय व्यूह बना रखा है॥ १२ १/२॥ अथ प्रतीपकर्तारं प्रवीरं परवीरहा ॥ १३ ॥ सस्मार वृषभस्कन्धं कर्णं दुर्योधनस्तदा । तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्योधनने शत्रुओंके विरुद्ध व्यूह-रचनामें समर्थ और वृषभके समान पुष्ट कंधोंवाले प्रमुख वीर कर्णका स्मरण किया॥ १३ १/२॥ पुरंदरसमं युद्धे मरुद्गणसमं बले ॥ १४ ॥ कार्तवीर्यसमं वीर्ये कर्णं राज्ञोऽगमन्मनः । कर्ण युद्धमें इन्द्रके समान पराक्रमी, मरुद्गणोंके समान बलवान् तथा कार्तवीर्य अर्जुनके समान शक्तिशाली था। राजा दुर्योधनका मन उसीकी ओर गया॥ १४ १/२॥ सर्वेषां चैव सैन्यानां कर्णमेवागमन्मनः । सूतपुत्रं महेष्वासं बन्धुमात्ययिकेष्विव ॥ १५ ॥ जैसे प्राण-संकटकालमें लोग अपने बन्धुजनोंका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार समस्त सेनाओंमेंसे केवल महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्णकी ओर ही उसका मन गया॥
धृतराष्ट्र उवाच
ततो दुर्योधनः सूत पश्चात् किमकरोत्तदा । यद्धोऽगमन्मनो मन्दाः कर्णं वैकर्तनं प्रति ॥ १६ ॥ अप्यपश्यत राधेयं शीतार्ता इव भास्करम् । धृतराष्ट्रने पूछा—सूत! तत्पश्चात् दुर्योधनने क्या किया। मूर्खों! तुमलोगोंका मन जो वैकर्तन कर्णकी ओर गया था, उसका क्या कारण है। जैसे शीतसे पीड़ित हुए प्राणी सूर्यकी ओर देखते हैं, क्या उसी प्रकार तुमलोग भी राधापुत्र कर्णकी ओर देखते थे? ॥ १६ १/२॥ कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रवृत्ते च रणे पुनः ॥ १७ ॥ कथं वैकर्तनः कर्णस्तत्रायुध्यत संजय । कथं च पाण्डवाः सर्वे युयुधुस्तत्र सूतजम् ॥ १८ ॥ संजय! सेनाको शिविरकी ओर लौटानेके बाद जब रात बीती और प्रातःकाल पुनः संग्राम आरम्भ हुआ, उस समय वैकर्तन कर्णने वहाँ किस प्रकार युद्ध किया तथा समस्त पाण्डवोंने सूतपुत्र कर्णके साथ किस प्रकार युद्ध आरम्भ किया? ॥ १७-१८ ॥ कर्णो ह्येको महाबाहुर्हन्यात् पार्थान् ससृंजयान् । कर्णस्य भुजयोर्वीर्यं शक्रविष्णुसमं युधि ॥ १९ ॥ तस्य शस्त्राणि घोराणि विक्रमश्च महात्मनः । कर्णमाश्रित्य संग्रामे मत्तो दुर्योधनो नृपः ॥ २० ॥
'अकेला महाबाहु कर्ण सृंजयोंसहित समस्त कुन्तीपुत्रोंको मार सकता है। युद्धमें कर्णका बाहुबल इन्द्र और विष्णुके समान है। उसके अस्त्र-शस्त्र भयंकर हैं तथा उस महामनस्वी वीरका पराक्रम भी अद्भुत है।' यह सब सोचकर राजा दुर्योधन संग्राममें कर्णका सहारा ले मतवाला हो उठा था ।। १९-२० ।।
दुर्योधनं ततो दृष्ट्वा पाण्डवेन भृशार्दितम् ।
पराक्रान्तान् पाण्डुसुतान् दृष्ट्वा चापि महारथः ॥ २१ ॥
किंतु उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरद्वारा दुर्योधनको अत्यन्त पीड़ित होते और पाण्डुपुत्रोंको पराक्रम प्रकट करते देखकर भी महारथी कर्णने क्या किया? ।। २१ ।।
कर्णमाश्रित्य संग्रामे मन्दो दुर्योधनः पुनः ।
जेतुमुत्सहते पार्थान् सपुत्रान् सहकेशवान् ।। २२ ।।
मूर्ख दुर्योधन संग्राममें कर्णका आश्रय लेकर पुनः पुत्रोसहित कुन्तीकुमारों और श्रीकृष्णको जीतनेके लिये उत्साहित हुआ था ।। २२ ।।
अहो बत महत् दुःखं यत्र पाण्डुसुतान् रणे ।
नातरद् रभसः कर्णो दैवं नूनं परायणम् ॥ २३ ॥
अहो! यह महान् दुःखकी बात है कि वेगशाली वीर कर्ण भी रणभूमिमें पाण्डवोंसे पार न पा सका। अवश्य दैव ही सबका परम आश्रय है ।। २३ ।।
अहो द्यूतस्य निष्ठेयं घोरा सम्प्रति वर्तते ।
अहो तीव्राणि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् ।। २४ ।।
सोढा घोराणि बहुशः शल्यभूतानि संजय ।
अहो! द्यूतक्रीडाका यह घोर परिणाम इस समय प्रकट हुआ है। संजय! आश्चर्य है कि मैंने दुर्योधनके कारण बहुत-से तीव्र एवं भयंकर दुःख, जो काँटोंके समान कसक रहे हैं, सहन किये हैं ।। २४ १/२ ।।
सौबलं च तदा तात नीतिमानिति मन्यते ॥ २५ ॥
कर्णश्च रभसो नित्यं राजा तं चाप्यनुव्रतः ।
तात! दुर्योधन उन दिनों शकुनिको बड़ा नीतिज्ञ मानता था तथा वेगशाली वीर कर्ण भी नीतिज्ञ है, ऐसा समझकर राजा दुर्योधन उसका भी भक्त बना रहा ।। २५ १/२ ।।
यदेवं वर्तमानेषु महायुद्धेषु संजय ॥ २६ ॥
अश्रौषं निहतान् पुत्रान् नित्यमेव विनिर्जितान् ।
न पाण्डवानां समरे कश्चिदस्ति निवारकः ।। २७ ।।
स्त्रीमध्यमिव गाहन्ते दैवं तु बलवत्तरम् ।
संजय! इस प्रकार वर्तमान महान् युद्धोंमें जो मैं प्रतिदिन ही अपने कुछ पुत्रोंको मारा गया और कुछको पराजित हुआ सुनता आ रहा हूँ, इससे मुझे यह विश्वास हो गया है कि समरांगणमें कोई भी ऐसा वीर नहीं है जो पाण्डवोंको रोक सके। जैसे लोग स्त्रियोंके बीचमें निर्भय प्रवेश कर जाते हैं, उसी प्रकार पाण्डव मेरी सेनामें बेखटके घुस जाते हैं। अवश्य इस विषयमें दैव ही अत्यन्त प्रबल है ।। २६-२७ १/२ ।।
संजय उवाच
राजन् पूर्वनिमित्तानि धर्मिष्ठानि विचिन्तय ।। २८ ।।
अतिक्रान्तं हि यत् कार्यं पश्चाच्चिन्तयते नरः ।
तच्चास्य न भवेत् कार्यं चिन्तया च विनश्यति ।। २९ ।।
संजयने कहा— राजन्! पूर्वकालमें आपने जो द्यूतक्रीडा आदि धर्मसंगत कारण उपस्थित किये थे, उन्हें याद तो कीजिये। जो मनुष्य बीती हुई बातके लिये पीछे चिन्ता करता है, उसका वह कार्य तो सिद्ध होता नहीं, केवल चिन्ता करनेसे वह स्वयं नष्ट हो जाता है ।। २८-२९ ।।
तदिदं तव कार्यं तु दूरप्राप्तं विजानता ।
न कृतं यत् त्वया पूर्वं प्राप्ताप्राप्तविचारणम् ।। ३० ।।
पाण्डवोंके राज्यके अपहरणरूपी इस कार्यमें सफलता मिलनी आपके लिये दूरकी बात थी। यह जानते हुए भी आपने पहले इस बातका विचार नहीं किया कि यह उचित है या अनुचित ।। ३० ।।
उक्तोऽसि बहुधा राजन् मा युध्यस्वेति पापडवैः ।
गृह्णीषे न च तन्मोहाद् वचनं च विशाम्पते ।। ३१ ।।
राजन्! पाण्डवोंने तो आपसे बारंबार कहा था कि 'आप युद्ध न छेड़िये।' किन्तु प्रजानाथ! आपने मोहवश उनकी बात नहीं मानी ।। ३१ ।।
त्वया पापानि घोराणि समाचीर्णानि पाण्डुषु ।
त्वत्कृते वर्तते घोरः पार्थिवानां जनक्षयः ।। ३२ ।।
आपने पाण्डवोंपर भयंकर अत्याचार किये हैं। आपके ही कारण राजाओंद्वारा यह घोर नरसंहार हो रहा है ।। ३२ ।।
तच्चिदानीमतिक्रान्तं मा शुचो भरतर्षभ ।
शृणु सर्वं यथावृत्तं घोरं वैशसमुच्यते ।। ३३ ।।
भरतश्रेष्ठ! वह बात तो अब बीत गयी। उसके लिये शोक न करें। युद्धका सारा वृत्तान्त यथावत् रूपसे सुनें। मैं उस भयंकर विनाशका वर्णन करता हूँ ।। ३३ ।।
प्रभातायां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् ।
समेत्य च महाबाहुर्दुर्योधनमथाब्रवीत् ।। ३४ ।।
जब रात बीती और प्रातःकाल हो गया, तब महाबाहु कर्ण राजा दुर्योधनके पास आया और उससे मिलकर इस प्रकार बोला ॥ ३४ ॥
कर्ण उवाच
अद्य राजन् समेष्यामि पाण्डवेन यशस्विना ।
निहनिष्यामि तं वीरं स वा मां निहनिष्यति ॥ ३५ ॥
**कर्णने कहा—**राजन्! आज मैं यशस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ संग्राम करूँगा। या तो मैं ही उस वीरको मार डालूँगा या वही मेरा वध कर डालेगा ॥ ३५ ॥
बहुत्वान्मम कार्याणां तथा पार्थस्य भारत ।
नाभूत् समागमो राजन् मम चैवार्जुनस्य च ॥ ३६ ॥
भरतवंशी नरेश! मेरे तथा अर्जुनके सामने बहुत-से कार्य आते गये; इसलिये अबतक मेरा और उनका द्वैरथ युद्ध न हो सका ॥ ३६ ॥
इदं तु मे यथाप्राज्ञं शृणु वाक्यं विशाम्पते ।
अनिहत्य रणे पार्थं नाहमेष्यामि भारत ॥ ३७ ॥
प्रजानाथ! भरतनन्दन! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार निश्चय करके यह जो बात कह रहा हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। आज मैं रणभूमिमें अर्जुनका वध किये बिना नहीं लौटूँगा ॥ ३७ ॥
हतप्रवीरे सैन्येऽस्मिन् मयि चावस्थिते युधि ।
अभियास्यति मां पार्थः शक्रशक्तिविनाकृतम् ॥ ३८ ॥
हमारी इस सेनाके प्रमुख वीर मारे गये हैं। अतः मैं युद्धमें जब इस सेनाके भीतर खड़ा होऊँगा, उस समय अर्जुन मुझे इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे वंचित जानकर अवश्य मुझपर आक्रमण करेंगे ॥ ३८ ॥
ततः श्रेयस्करं यच्च तन्निबोध जनेश्वर ।
आयुधानां च मे वीर्यं दिव्यानामर्जुनस्य च ॥ ३९ ॥
जनेश्वर! अब जो यहाँ हितकर बात है, उसे सुनिये। मेरे तथा अर्जुनके पास भी दिव्यास्त्रोंका समान बल है ॥ ३९ ॥
कायस्य महतो भेदे लाघवे दूरपातने ।
सौष्ठवे चास्त्रपाते च सव्यसाची न मत्समः ॥ ४० ॥
हाथी आदिके विशाल शरीरका भेदन करने, शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाने, दूरका लक्ष्य वेधने, सुन्दर रीतिसे युद्ध करने तथा दिव्यास्त्रोंके प्रयोगमें भी सव्यसाची अर्जुन मेरे समान नहीं हैं ॥ ४० ॥
घ्राणे शौर्येऽथ विज्ञाने विक्रमे चापि भारत ।
निमित्तज्ञानयोगे च सव्यसाची न मत्समः ॥ ४१ ॥
भारत! शारीरिक बल, शौर्य, अस्त्रविज्ञान, पराक्रम तथा शत्रुओंपर विजय पानेके उपायको ढूँढ़ निकालनेमें भी सव्यसाची अर्जुन मेरी समानता नहीं कर सकते ॥ ४१ ॥
सर्वायुधमहामात्रं विजयं नाम तद्धनुः ।
इन्द्रार्थं प्रियकामेन निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ४२ ॥
मेरे धनुषका नाम विजय है। यह समस्त आयुधोंमें श्रेष्ठ है। इसे इन्द्रका प्रिय चाहनेवाले विश्वकर्माने उन्हींके लिये बनाया था ॥ ४२ ॥
येन दैत्यगणान् राजञ्जितवान् वै शतक्रतुः ।
यस्य घोषेण दैत्यानां व्यामुह्यन्त दिशो दश ॥ ४३ ॥
तद् भार्गवाय प्रायच्छच्छक्रः परमसंमतम् ।
तद् दिव्यं भार्गवो मह्यमददाद् धनुरुत्तमम् ॥ ४४ ॥
राजन्! इन्द्रने जिसके द्वारा दैत्योंको जीता था, जिसकी टंकारसे दैत्योंको दसों दिशाओंके पहचाननेमें भ्रम हो जाता था, उसी अपने परम प्रिय दिव्य धनुषको इन्द्रने परशुरामजीको दिया था और परशुरामजीने वह दिव्य उत्तम धनुष मुझे दे दिया है ॥ ४३-४४ ॥
तेन योत्स्ये महाबाहुमर्जुनं जयतां वरम् ।
यथेन्द्रः समरे सर्वान् दैतेयान् वै समागतान् ॥ ४५ ॥
उसी धनुषके द्वारा मैं विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ महाबाहु अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा। ठीक वैसे ही जैसे समरांगणमें आये हुए समस्त दैत्योंके साथ इन्द्रने युद्ध किया था ॥ ४५ ॥
धनुर्घोरं रामदत्तं गाण्डीवात् तद् विशिष्यते ।
त्रिस्सप्तकृत्वः पृथिवी धनुषा येन निर्जिता ॥ ४६ ॥
परशुरामजीका दिया हुआ वह घोर धनुष गाण्डीवसे श्रेष्ठ है। यह वही धनुष है, जिसके द्वारा परशुरामजीने पृथ्वीपर इक्कीस बार विजय पायी थी ॥ ४६ ॥
धनुषो ह्यस्य कर्माणि दिव्यानि प्राह भार्गवः ।
तद् रामो ह्यददान्मह्यं तेन योत्स्यामि पाण्डवम् ॥ ४७ ॥
स्वयं भृगुनन्दन परशुरामने ही मुझे उस धनुषके दिव्य कर्म बताये हैं और उसे उन्होंने मुझे अर्पित कर दिया है; उसी धनुषके द्वारा मैं पाण्डुकुमार अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४७ ॥
अद्य दुर्योधनाहं त्वां नन्दयिष्ये सबान्धवम् ।
निहत्य समरे वीरमर्जुनं जयतां वरम् ॥ ४८ ॥
दुर्योधन! आज मैं समरभूमिमें विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ वीर अर्जुनका वध करके बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें आनन्दित करूँगा ॥ ४८ ॥
सपर्वतवनद्वीपा हतवीरा ससागरा ।
पुत्रपौत्रप्रतिष्ठा ते भविष्यत्यद्य पार्थिव ॥ ४९ ॥
भूपाल! आज उस वीरके मारे जानेपर पर्वत, वन, द्वीप और समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी तुम्हारे पुत्र-पौत्रोंकी परम्परामें प्रतिष्ठित हो जायगी ॥ ४९ ॥
नाशक्यं विद्यते मेऽद्य त्वत्प्रीयार्थं विशेषतः ।
सम्यग्धर्मानुरक्तस्य सिद्धिरात्मवतो यथा ॥ ५० ॥
जैसे उत्तम धर्ममें अनुरक्त हुए मनस्वी पुरुषके लिये सिद्धि दुर्लभ नहीं है, उसी प्रकार आज विशेषतः तुम्हारा प्रिय करनेके हेतु मेरे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है ॥ ५० ॥
न हि मां समरे सोढुं संशक्तोऽग्निं तरुर्यथा ।
अवश्यं तु मया वाच्यं येन हीनोऽस्मि फाल्गुनात् ॥ ५१ ॥
जैसे वृक्ष अग्निका आक्रमण नहीं सह सकता, उसी प्रकार अर्जुनमें ऐसी शक्ति नहीं है कि मेरा वेग सह सकें; परंतु जिस बातमें मैं अर्जुनसे कम हूँ, वह भी मुझे अवश्य ही बता देना उचित है ॥ ५१ ॥
ज्या तस्य धनुषो दिव्या तथाक्षय्ये महेषुधी ।
सारथिस्तस्य गोविन्दो मम तादृङ् न विद्यते ॥ ५२ ॥
उनके धनुषकी प्रत्यंचा दिव्य है। उनके पास दो बड़े-बड़े दिव्य तरकस हैं, जो कभी खाली नहीं होते तथा उनके सारथि श्रीकृष्ण हैं, ये सब मेरे पास वैसे नहीं हैं ॥ ५२ ॥
तस्य दिव्यं धनुः श्रेष्ठं गाण्डीवमजितं युधि ।
विजयं च महद्दिव्यं ममापि धनुरुत्तमम् ॥ ५३ ॥
यदि उनके पास युद्धमें अजेय, श्रेष्ठ, दिव्य गाण्डीव धनुष है तो मेरे पास भी विजय नामक महान् दिव्य एवं उत्तम धनुष मौजूद है ॥ ५३ ॥
तत्राहमधिकः पार्थाद् धनुषा तेन पार्थिव ।
येन चाप्यधिको वीरः पाण्डवस्तन्निबोध मे ॥ ५४ ॥
राजन्! धनुषकी दृष्टिसे तो मैं ही अर्जुनसे बढ़ा-चढ़ा हूँ; परंतु वीर पाण्डुकुमार अर्जुन जिसके कारण मुझसे बढ़ जाते हैं, वह भी सुन लो ॥ ५४ ॥
रश्मिग्राहश्च दाशार्हः सर्वलोकनमस्कृतः ।
अग्निदत्तश्च वै दिव्यो रथः काञ्चनभूषणः ॥ ५५ ॥
अच्छेद्यः सर्वतो वीर वाजिनश्च मनोजवाः ।
ध्वजश्च दिव्यो द्युतिमान् वानरो विस्मयंकरः ॥ ५६ ॥
सर्वलोकवन्दित, दाशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्ण उनके घोड़ोंकी रास सँभालते हैं। वीर! उनके पास अग्निका दिया हुआ सुवर्णभूषित दिव्य रथ है, जिसे किसी प्रकार नष्ट नहीं किया जा सकता। उनके घोड़े भी मनके समान वेगशाली हैं। उनका तेजस्वी ध्वज दिव्य है, जिसके ऊपर सबको आश्चर्यमें डालनेवाला वानर बैठा रहता है ॥ ५५-५६ ॥
कृष्णश्च स्रष्टा जगतो रथं तमभिरक्षति ।
एतैर्द्रव्यैरहं हीनो योद्धुमिच्छामि पाण्डवम् ॥ ५७ ॥
श्रीकृष्ण जगत्के स्रष्टा हैं। वे अर्जुनके उस रथकी रक्षा करते हैं। इन्हीं वस्तुओंसे हीन होकर मैं पाण्डुपुत्र अर्जुनसे युद्धकी इच्छा रखता हूँ ॥ ५७ ॥ अयं तु सदृशः शौरेः शल्यः समितिशोभनः । सारथ्यं यदि मे कुर्याद् ध्रुवस्ते विजयो भवेत् ॥ ५८ ॥ अवश्य ही ये युद्धमें शोभा पानेवाले राजा शल्य श्रीकृष्णके समान हैं, यदि ये मेरे सारथिका कार्य कर सकें तो तुम्हारी विजय निश्चित है ॥ ५८ ॥ तस्य मे सारथिः शल्यो भवत्वसुकरः परैः । नाराचान् गार्ध्रपत्रांश्च शकटानि वहन्तु मे ॥ ५९ ॥ शत्रुओंसे सुगमतापूर्वक जीते न जा सकनेवाले राजा शल्य मेरे सारथि हो जायँ और बहुत-से छकड़े मेरे पास गीधकी पाँखोंसे युक्त नाराच पहुँचाते रहें ॥ ५९ ॥ रथाश्च मुख्या राजेन्द्र युक्ता वाजिभिरुत्तमैः । अयान्तु पश्चात् सततं मामेव भरतर्षभ ॥ ६० ॥ राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए अच्छे-अच्छे रथ सदा मेरे पीछे चलते रहें ॥ ६० ॥ एवमभ्यधिकः पार्थाद् भविष्यामि गुणैरहम् । शल्योऽप्यधिकः कृष्णादर्जुनादपि चाप्यहम् ॥ ६१ ॥ ऐसी व्यवस्था होनेपर मैं गुणोंमें पार्थसे बढ़ जाऊँगा। शल्य भी श्रीकृष्णसे बड़े-चढ़े हैं और मैं भी अर्जुनसे श्रेष्ठ हूँ ॥ ६१ ॥ यथाश्वहृदयं वेद दाशार्हः परवीरहा । तथा शल्यो विजानीते हयज्ञानं महारथः ॥ ६२ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दशार्हवंशी श्रीकृष्ण अश्वविद्याके रहस्यको जिस प्रकार जानते हैं, उसी प्रकार महारथी शल्य भी अश्वविज्ञानके विशेषज्ञ हैं ॥ ६२ ॥ बाहुवीर्ये समो नास्ति मद्रराजस्य कश्चन । तथास्त्रे मत्समो नास्ति कश्चिदेव धनुर्धरः ॥ ६३ ॥ बाहुबलमें मद्रराज शल्यकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। उसी प्रकार अस्त्रविद्यामें मेरे समान कोई भी धनुर्धर नहीं है ॥ ६३ ॥ तथा शल्यसमो नास्ति हयज्ञाने हि कश्चन । सोऽयमभ्यधिकः कृष्णाद् भविष्यति रथो मम ॥ ६४ ॥ अश्वविज्ञानमें भी शल्यके समान कोई नहीं है। शल्यके सारथि होनेपर मेरा यह रथ अर्जुनके रथसे बढ़ जायगा ॥ ६४ ॥ एवं कृते रथस्थोऽहं गुणैरभ्यधिकोऽर्जुनात् । भवे युधि जयेयं च फाल्गुनं कुरुसत्तम ॥ ६५ ॥ समुद्यातुं न शक्ष्यन्ति देवा अपि सवासवाः ।
ऐसी व्यवस्था कर लेनेपर जब मैं रथमें बैठूँगा, उस समय सभी गुणोंद्वारा अर्जुनसे बढ़ जाऊँगा। कुरुश्रेष्ठ! फिर तो मैं युद्धमें अर्जुनको अवश्य जीत लूँगा। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी मेरा सामना नहीं कर सकेंगे ॥ ६५ १/२ ॥
एतत् कृतं महाराज त्वयेच्छामि परंतप ॥ ६६ ॥
क्रियतामेष कामो मे मा वः कालोऽत्यगादयम् ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! मैं चाहता हूँ कि आपके द्वारा यही व्यवस्था हो जाय। मेरा यह मनोरथ पूर्ण किया जाय। अब आपलोगोंका यह समय व्यर्थ नहीं बीतना चाहिये ॥ ६६ १/२ ॥
एवं कृते कृतं साह्यं सर्वकामैर्भविष्यति ॥ ६७ ॥
ततो द्रक्ष्यसि संग्रामे यत् करिष्यामि भारत ।
सर्वथा पाण्डवान् संख्ये विजेष्ये वै समागतान् ॥ ६८ ॥
ऐसा करनेपर मेरी सम्पूर्ण इच्छाओंके अनुसार सहायता सम्पन्न हो जायगी। भारत! उस समय मैं संग्राममें जो कुछ करूँगा, उसे तुम स्वयं देख लोगे। युद्धस्थलमें आये हुए समस्त पाण्डवोंको निश्चय ही मैं सब प्रकारसे जीत लूँगा ॥ ६७-६८ ॥
न हि मे समरे शक्ताः समुद्यातुं सुरसुराः ।
किमु पाण्डुसुता राजन् रणे मानुषयोनयः ॥ ६९ ॥
राजन्! समरांगणमें देवता और असुर भी मेरा सामना नहीं कर सकते, फिर मनुष्य-योनिमें उत्पन्न हुए पाण्डव तो कर ही कैसे सकते हैं ॥ ६९ ॥
संजय उवाच
एवमुक्तस्तव सुतः कर्णेनाहवशोभिना ।
सम्पूज्य सम्प्रहृष्टात्मा ततो राधेयमब्रवीत् ॥ ७० ॥
संजय कहते हैं— राजन्! युद्धमें शोभा पानेवाले कर्णके ऐसा कहनेपर आपके पुत्र दुर्योधनका मन प्रसन्न हो गया। फिर उसने राधापुत्र कर्णका पूर्णतः सम्मान करके उससे कहा ॥ ७० ॥
दुर्योधन उवाच
एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वं कर्ण मन्यसे ।
सोपासङ्गा रथाः साश्वाः स्वनुयास्यन्ति संयुगे ॥ ७१ ॥
दुर्योधन बोला— कर्ण! जैसा तुम ठीक समझते हो उसीके अनुसार यह सारा कार्य मैं करूँगा। युद्धस्थलमें अनेक तरकशोंसे भरे हुए बहुत-से अश्वयुक्त रथ तुम्हारे पीछे-पीछे जायँगे ॥ ७१ ॥
नाराचान् गार्ध्रपत्रांश्च शकटानि वहन्तु ते ।
अनुयास्याम कर्ण त्वां वयं सर्वे च पार्थिवाः ॥ ७२ ॥
कई छकड़े तुम्हारे पास गीधकी पाँखोंसे युक्त नाराच पहुँचाया करेंगे। कर्ण! हमलोग तथा समस्त भूपालगण तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे ॥ ७२ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा महाराज तव पुत्रः प्रतापवान् ।
अभिगम्याब्रवीद् राजा मद्रराजमिदं वचः ॥ ७३ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! ऐसा कहकर आपके प्रतापी पुत्र राजा दुर्योधनने मद्रराज शल्यके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णदुर्योधनसंवादे एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और दुर्योधनका संवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1795)
द्वात्रिंशोऽध्यायः
दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना और शल्यका इस विषयमें घोर विरोध करना, पुनः श्रीकृष्णके समान अपनी प्रशंसा सुनकर उसे स्वीकार कर लेना
संजय उवाच
पुत्रस्तव महाराज मद्रराजं महारथम् ।
विनयेनोपसंगम्य प्रणयाद् वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! आपका पुत्र दुर्योधन मद्रराज महारथी शल्यके पास विनीतभावसे जाकर प्रेमपूर्वक इस प्रकार बोला— ॥ १ ॥
सत्यव्रत महाभाग द्विषतां तापवर्धन ।
मद्रेश्वर रणे शूर परसैन्यभयंकर ॥ २ ॥
श्रुतवानसि कर्णस्य ब्रुवतो वदतां वर ।
यथा नृपतिसिंहानां मध्ये त्वां वरये स्वयम् ॥ ३ ॥
‘महाभाग! सत्यव्रत! शत्रुओंका संताप बढ़ानेवाले मद्रराज! रणवीर! शत्रुसैन्यभयंकर! वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आपने कर्णकी बात सुनी है। उसीके अनुसार इन राजसिंहोंके बीचमें मैं स्वयं आपका वरण करता हूँ ॥ २-३ ॥
तत्त्वामप्रतिवीर्याद्य शत्रुपक्षक्षयावह ।
मद्रेश्वर प्रयाचेऽहं शिरसा विनयेन च ॥ ४ ॥
तस्मात् पार्थविनाशार्थं हितार्थं मम चैव हि ।
सारथ्यं रथिनां श्रेष्ठ प्रणयात् कर्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
‘शत्रुपक्षका विनाश करनेवाले, अनुपम शक्तिशाली, रथियोंमें श्रेष्ठ मद्रराज! मैं मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक आपसे यह याचना करता हूँ कि आप अर्जुनके विनाश और मेरे हितके लिये प्रेमपूर्वक कर्णका सारथ्य कीजिये ॥ ४-५ ॥
त्वयि यन्तरि राधेयो विद्विषो मे विजेष्यते ।
अभीषूणां हि कर्णस्य ग्रहीतान्यो न विद्यते ॥ ६ ॥
ऋते हि त्वां महाभाग वासुदेवसमं युधि ।
‘आपके सारथि होनेपर राधापुत्र कर्ण मेरे शत्रुओंको जीत लेगा। कर्णके रथकी बागडोर पकड़नेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। महाभाग! आप युद्धमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समान हैं ॥ ६ १/२ ॥
स पाहि सर्वथा कर्णं यथा ब्रह्मा महेश्वरम् ॥ ७ ॥ यथा च सर्वथाऽऽपत्सु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् । तथा मद्रेश्वराद्य त्वं राधेयं प्रतिपालय ॥ ८ ॥ ‘जैसे ब्रह्माजीने सारथि बनकर महादेवजीकी रक्षा की थी और जैसे सब प्रकारकी आपत्तियोंसे श्रीकृष्ण अर्जुनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप कर्णकी सर्वथा रक्षा कीजिये। मद्रराज! आज आप राधापुत्रका प्रतिपालन कीजिये॥ भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णोभवान् भोजश्च वीर्यवान् । शकुनिः सौबलो द्रौणिरहमेव च नो बलम् ॥ ९ ॥ ‘भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य कर्ण, आप, पराक्रमी कृतवर्मा, सुबलपुत्र शकुनि, द्रोणकुमार अश्वत्थामा और मैं—ये ही हमारे बल हैं॥ ९॥ एवमेष कृतो भागो नवधा पृथिवीपते । न च भागोऽत्र भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ १० ॥ ताभ्यामतीत्य तौ भागौ निहता मम शत्रवः । ‘पृथ्वीपते! इस प्रकार मेरी सेनाके ये नौ भाग किये गये थे। अब यहाँ भीष्म तथा महात्मा द्रोणाचार्यका भाग नहीं रह गया है। उन दोनोंने उनके लिये निर्धारित भागोंसे और आगे बढ़कर मेरे शत्रुओंका संहार किया है॥ १० १/२ ॥ वृद्धौ हि तौ महेष्वासौ छलेन निहतौ युधि ॥ ११ ॥ कृत्वा नसुकरं कर्म गतौ स्वर्गमितोऽनघ । तथान्ये पुरुषव्याघ्राः परैर्विनिहता युधि ॥ १२ ॥ ‘वे दोनों महाधनुर्धर योद्धा बूढ़े हो गये थे, इसलिये युद्धमें शत्रुओंद्वारा छलपूर्वक मारे गये। अनघ! वे दुष्कर कर्म करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये। इसी प्रकार दूसरे पुरुषसिंह वीर भी युद्धमें शत्रुओंद्वारा मारे गये हैं॥ ११-१२॥ अस्मदीयाश्च बहवः स्वर्गायोपगता रणे । त्यक्त्वा प्राणान् यथाशक्ति चेष्टां कृत्वा च पुष्कलाम् ॥ १३ ॥ ‘मेरे पक्षके बहुत-से योद्धा विजयके लिये यथाशक्ति पूरी चेष्टा करके रणभूमिमें प्राण त्यागकर स्वर्गलोकको चले गये॥ १३॥ तदिदं हतभूयिष्ठं बलं मम नराधिप । पूर्वमप्यल्पकैः पार्थैर्हतं किमुत साम्प्रतम् ॥ १४ ॥ ‘नरेश्वर! इस प्रकार मेरी इस सेनाका अधिकांश भाग नष्ट हो चुका है। पहले भी जब अपनी सारी सेना मौजूद थी, अल्पसंख्यक कुन्तीकुमारोंने कौरवसेनाका नाश कर दिया था। फिर इस समय तो कहना ही क्या है? ॥ १४ ॥ बलवन्तो महात्मानः कौन्तेयाः सत्यविक्रमाः । बलं शेषं न हन्युर्मे यथा तत् कुरु पार्थिव ॥ १५ ॥
‘भूपाल! बलवान्, महामनस्वी और सत्यपराक्रमी कुन्तीकुमार मेरी शेष सेनाको जिस तरह भी नष्ट न कर सकें, ऐसा उपाय कीजिये ।। १५ ।। हतवीरमिदं सैन्यं पाण्डवैः समरे विभो । कर्णो ह्येको महाबाहुरस्मत्प्रियहिते रतः ।। १६ ।। ‘प्रभो! पाण्डवोंने समरांगणमें मेरी सेनाके प्रमुख वीरोंको मार डाला है। एक महाबाहु कर्ण ही ऐसा है, जो हमारे प्रिय एवं हितसाधनमें लगा हुआ है ।। १६ ।। भवांश्च पुरुषव्याघ्र सर्वलोकमहारथः । शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धुमिच्छति संयुगे ।। १७ ।। ‘पुरुषसिंह शल्य! दूसरे आप भी सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात महारथी होकर हमारे हितसाधनमें संलग्न हैं। आज कर्ण रणभूमिमें अर्जुनके साथ युद्ध करना चाहता है ।। १७ ।। तस्मिञ्जयाशा विपुला मद्रराज नराधिप । तस्याभीषुग्रहवरो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन ।। १८ ।। ‘मद्रराज! नरेश्वर! उसके मनमें विजयकी बड़ी भारी आशा है, परंतु उसके घोड़ोंकी रास पकड़नेवाला (आपके समान) दूसरा कोई इस भूतलपर नहीं है ।। पार्थस्य समरे कृष्णो यथाभीषुग्रहो वरः । तथा त्वमपि कर्णस्य रथेऽभीषुग्रहो भव ।। १९ ।। ‘जैसे संग्रामभूमिमें अर्जुनके रथकी बागडोर सँभालनेवाले श्रेष्ठ सारथि श्रीकृष्ण हैं, उसी प्रकार आप भी कर्णके रथपर बैठकर उसकी बागडोर अपने हाथमें लीजिये ।। तेन युक्तो रणे पार्थो रक्ष्यमाणश्च पार्थिव । यानि कर्माणि कुरुते प्रत्यक्षाणि तथैव तत् ।। २० ।। ‘राजन्! श्रीकृष्णसे संयुक्त एवं सुरक्षित होकर पार्थ रणभूमिमें जो-जो कर्म करते हैं, वे सब आपकी आँखोंके सामने हैं ।। २० ।। पूर्वं न समरे ह्येवमवधीदर्जुनो रिपून् । इदानीं विक्रमो ह्यस्य कृष्णेन सहितस्य च ।। २१ ।। ‘पहले युद्धमें अर्जुन इस प्रकार शत्रुओंका वध नहीं करते थे। इस समय श्रीकृष्णके साथ होनेसे ही इनका पराक्रम बढ़ गया है ।। २१ ।। कृष्णेन सहितः पार्थो धार्तराष्ट्रीं महाचमूम् । अहन्यहनि मद्रेश द्रावयन् दृश्यते युधि ।। २२ ।। ‘मद्रराज! श्रीकृष्णके साथ अर्जुन प्रतिदिन हमारी विशाल सेनाको युद्धभूमिमें खदेड़ते देखे जाते हैं ।। २२ ।। भागोऽवशिष्टः कर्णस्य तव चैव महाद्युते । तं भागं सह कर्णेन युगपन्नाशयाद्य हि ।। २३ ।।
‘महातेजस्वी नरेश! अब कर्णका और आपका भाग शेष रह गया है। अतः आप कर्णके साथ रहकर शत्रुसेनाके उस भागको एक साथ ही नष्ट कर दीजिये।।
अरुणेन यथा सार्धं तमः सूर्यो व्यपोहति ।
तथा कर्णेन सहितो जहि पार्थं महाहवे ।। २४ ।।
‘जैसे अरुणके साथ सूर्य अन्धकारका नाश करते हैं, उसी प्रकार आप महासमरमें कर्णके साथ रहकर कुन्तीकुमार अर्जुनका वध कीजिये ।। २४ ।।
उद्यन्तौ च यथा सूर्यौ बालसूर्यसमप्रभौ ।
कर्णशल्यौ रणे दृष्ट्वा विद्रवन्तु महारथाः ।। २५ ।।
‘प्रातःकालीन सूर्यके तुल्य तेजस्वी कर्ण और शल्यको उदित होते हुए दो सूर्योंके समान रणभूमिमें देखकर शत्रुसेनाके महारथी भाग जायँ ।। २५ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1799)
दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना
सूर्यारुणौ यथा दृष्ट्वा तमो नश्यति मारिष । तथा नश्यन्तु कौन्तेयाः सपञ्चालाः ससंजयाः ॥ २६ ॥ 'मान्यवर! जैसे सूर्य और अरुणको देखते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार आप दोनोंको देखकर कुन्तीके पुत्र, पांचाल और सृंजय नष्ट हो जायें ॥
रथिनां प्रवरः कर्णो यन्तॄणां प्रवरो भवान् । संयोगो युवयोर्लोके नाभून्न च भविष्यति ॥ २७ ॥ 'कर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ है और आप सारथियोंके शिरोमणि हैं। संसारमें आप दोनोंका संयोग जो आज बन गया है, न तो कभी हुआ था और न आगे कभी होगा ॥ २७ ॥
यथा सर्वास्ववस्थासु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् । तथा भवान् परित्रातुं कर्णं वैकर्तनं रणे ॥ २८ ॥ 'जैसे श्रीकृष्ण सभी अवस्थाओंमें पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप रणभूमिमें वैकर्तन कर्णकी रक्षा करें ॥ २८ ॥
(सारथ्यं क्रियतां तस्य युध्यमानस्य संयुगे ।) त्वया सारथिना ह्येष अप्रधृष्यो भविष्यति । देवतानामपि रणे सशक्राणां महीपते । किं पुनः पाण्डवेयानां मा विशंकीर्वचो मम ॥ २९ ॥ 'युद्धस्थलमें युद्ध करते समय कर्णके सारथिका कार्य सँभालिये। राजन्! आपके सारथि होनेसे यह कर्ण रणभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हो जायगा, फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है। आप मेरे इस कथनमें संदेह न कीजिये' ॥ २९ ॥
संजय उवाच
दुर्योधनवचः श्रुत्वा शल्यः क्रोधसमन्वितः । विशिखां भुकुटिं कृत्वा धुन्वन् हस्तौ पुनः पुनः ॥ ३० ॥ संजय कहते हैं—राजन्! दुर्योधनकी बात सुनकर शल्यको बड़ा क्रोध हुआ। वे अपनी भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके बारंबार हाथ हिलाने लगे ॥ ३० ॥
क्रोधरक्ते महानेत्रे परिवृत्य महाभुजः । कुलैश्वर्यश्रुतबलैर्दृप्तः शल्योऽब्रवीदिदम् ॥ ३१ ॥ महाबाहु शल्यको अपने कुल, ऐश्वर्य, शास्त्रज्ञान और बलका बड़ा अभिमान था। वे क्रोधसे लाल हुए विशाल नेत्रोंको घुमाकर इस प्रकार बोले ॥ ३१ ॥
शल्य उवाच
अवमन्यसि गान्धारे ध्रुवं च परिशङ्कसे । यन्मां ब्रवीषि विश्रब्धं सारथ्यं क्रियतामिति ॥ ३२ ॥
शल्यने कहा— गान्धारीपुत्र! तुम मेरा अपमान कर रहे हो, निश्चय ही तुम्हारे मनमें मेरे प्रति संदेह है, तभी तुम निर्भय होकर कह रहे हो कि आप ‘सारथिका कार्य कीजिये’ ।। ३२ ।।
अस्मत्तोऽभ्यधिकं कर्णं मन्यमानः प्रशंससि ।
न चाहं युधि राधेयं गणये तुल्यमात्मनः ॥ ३३ ॥
तुम कर्णको मुझसे श्रेष्ठ मानकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हो; परंतु युद्धस्थलमें राधापुत्र कर्णको मैं अपने समान नहीं गिनता हूँ ।। ३३ ।।
आदिश्यतामभ्यधिको ममांशः पृथिवीपते ।
तमहं समरे जित्वा गमिष्यामि यथागतम् ॥ ३४ ॥
राजन्! तुम शत्रुसेनाके अधिक-से-अधिक भागको मेरे हिस्सेमें दे दो, मैं उसे जीतकर जैसे आया हूँ, वैसे लौट जाऊँगा ।। ३४ ।।
अथवाप्येक एवाहं योत्स्यामि कुरुनन्दन ।
पश्य वीर्यं ममाद्य त्वं संग्रामे दहतो रिपून् ॥ ३५ ॥
अथवा कुरुनन्दन! आज मैं अकेला ही युद्ध करूँगा। तुम संग्राममें शत्रुओंको दग्ध करते हुए मेरे पराक्रमको देख लेना ।। ३५ ।।
न चापि कामान् कौरव्य निधाय हृदये पुमान् ।
अस्मद्विधः प्रवर्तेत मा मां त्वमभिशङ्किथाः ॥ ३६ ॥
कौरव्य! मेरे-जैसा पुरुष अपने मनमें कुछ कामनाएँ रखकर युद्धमें प्रवृत्त नहीं होता। अतः तुम मुझपर संदेह न करो ।। ३६ ।।
युधि वाप्यवमानो मे न कर्तव्यः कथञ्चन ।
पश्य पीनौ मम भुजौ वज्रसंहननौ दृढौ ॥ ३७ ॥
धनुः पश्य च मे चित्रं शरांश्चाशीविषोपमान् ।
रथं पश्य च मे क्लृप्तं सदश्वैर्वातवेगितैः ॥ ३८ ॥
गदां च पश्य गान्धारे हेमपट्टविभूषिताम् ।
तुम्हें युद्धमें किसी प्रकार मेरा अपमान नहीं करना चाहिये। तुम मेरी मोटी और वज्रके समान गँठीली इन सुदृढ़ भुजाओंको तो देखो। मेरे इस विचित्र धनुष और विषधर सर्पके समान इन विषैले बाणोंकी ओर तो दृष्टिपात करो। गन्धारीकुमार! वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए मेरे इस सजे-सजाये रथ और सुवर्णपत्रसे मढ़ी हुई गदापर भी तो दृष्टि डालो ।। ३७-३८ १/२ ।।
दारयेयं महीं कृत्स्नां विकिरेयं च पर्वतान् ॥ ३९ ॥
शोषयेयं समुद्रांश्च तेजसा स्वेन पार्थिव ।
राजन्! मैं सारी पृथिवीको विदीर्ण कर सकता हूँ, पर्वतोंको तोड़-फोड़कर बिखेर सकता हूँ और अपने तेजसे समुद्रोंको भी सुखा सकता हूँ ।। ३९ १/२ ।।
तं मामेवंविधं राजन् समर्थमरिनिग्रहे ॥ ४० ॥
कस्माद् युनक्षि सारथ्ये नीचस्याधिरथे रणे ।
नरेश्वर! इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेमें पूर्णतया समर्थ होनेपर भी तुम मुझे इस नीच सूतपुत्र कर्णके सारथिके कामपर कैसे नियुक्त कर रहे हो? ॥ ४० १/२ ॥
न मामधुरि राजेन्द्र नियोक्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ४१ ॥
न हि पापीयसः श्रेयान् भूत्वा प्रेष्यत्वमुत्सहे ।
राजेन्द्र! तुम्हें मुझे नीच कर्ममें नहीं लगाना चाहिये। मैं श्रेष्ठ होकर अत्यन्त नीच पापी पुरुषकी दासता नहीं कर सकता ॥ ४१ १/२ ॥
यो ह्यभ्युपगतं प्रीत्या गरीयांसं वशे स्थितम् ॥ ४२ ॥
वशे पापीयसो धत्ते तत् पापमधरोत्तरम् ।
जो पुरुष प्रेमवश अपने पास आकर अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले किसी श्रेष्ठतम पुरुषको नीचतम मनुष्यके अधीन कर देता है, उसे उच्चको नीच और नीचको उच्च करनेका महान् पाप लगता है ॥ ४२ १/२ ॥
ब्रह्मणा ब्राह्मणाः सृष्टा मुखात् क्षत्रं च बाहुतः ॥ ४३ ॥
ऊरुभ्यामसृजद् वैश्याञ्शूद्रान् पद्भ्यामिति श्रुतिः ।
ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंको अपने मुखसे, क्षत्रियोंको भुजाओंसे, वैश्योंको जाँघोंसे और शूद्रोंको पैरोंसे उत्पन्न किया है, ऐसा श्रुतिका मत है ॥ ४३ १/२ ॥
तेभ्यो वर्णविशेषाश्च प्रतिलोमानुलोमजाः ॥ ४४ ॥
अथान्योन्यस्य संयोगाच्चातुर्वर्ण्यस्य भारत ।
भारत! इन्हींसे अनुलोम और विलोम क्रमसे विभिन्न वर्णोंकी उत्पत्ति होती है। चारों वर्णोंके पारस्परिक संयोगसे अन्य जातियाँ उत्पन्न हुई हैं ॥ ४४ १/२ ॥
गोप्तारः संगृहीतारो दातारः क्षत्रियाः स्मृताः ॥ ४५ ॥
याजनाध्यापनैर्विप्रा विशुद्धैश्च प्रतिग्रहैः ।
लोकस्यानुग्रहार्थाय स्थापिता ब्राह्मणा भुवि ॥ ४६ ॥
इनमें क्षत्रिय-जातिके लोग सबकी रक्षा करनेवाले, सबसे कर लेनेवाले और दान देनेवाले बताये गये हैं। ब्राह्मण यज्ञ कराने, वेद पढ़ाने और विशुद्ध दान ग्रहण करनेके द्वारा जीवन-निर्वाह करते हुए सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये इस भूतलपर ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित किये गये हैं ॥ ४५-४६ ॥
कृषिश्च पशुपाल्यं च विशां दानं च धर्मतः ।
ब्रह्मक्षत्रविशां शूद्रा विहिताः परिचारकाः ॥ ४७ ॥
कृषि, पशुपालन और धर्मानुसार दान देना वैश्योंका कर्म है तथा शूद्रलोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवाके काममें नियुक्त किये गये हैं ॥ ४७ ॥
ब्रह्मक्षत्रस्य विहिताः सूता वै परिचारकाः । न क्षत्रियो वै सूतानां शृणुयाच्च कथञ्चन ॥ ४८ ॥ सूतजातिके लोग ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके सेवक नियुक्त किये गये हैं, क्षत्रिय सूतोंका सेवक हो, यह कोई किसी प्रकार कहीं नहीं सुन सकता ॥ ४८ ॥
अहं मूर्धाभिषिक्तो हि राजर्षिकुलजो नृपः । महारथः समाख्यातः सेव्यः स्तुत्यश्च वन्दिनाम् ॥ ४९ ॥ मैं राजर्षियोंके कुलमें उत्पन्न हुआ मूर्द्धाभिषिक्त नरेश हूँ, विश्वविख्यात महारथी हूँ, सूतोंद्वारा सेव्य और वन्दीजनोंद्वारा स्तुतिके योग्य हूँ ॥ ४९ ॥
सोऽहमेतादृशो भूत्वा नेहारिबलसूदनः । सूतपुत्रस्य संग्रामे सारथ्यं कर्तुमुत्सहे ॥ ५० ॥ ऐसा प्रतिष्ठित एवं शत्रुसेनाका संहार करनेमें समर्थ होकर मैं यहाँ युद्धस्थलमें एक सूतपुत्रके सारथिका कार्य कदापि नहीं कर सकता ॥ ५० ॥
अवमानमहं प्राप्य न योत्स्यामि कथञ्चन । आपृच्छे त्वाद्य गान्धारे गमिष्यामि गृहाय वै ॥ ५१ ॥ गान्धारीनन्दन! आज इस अपमानको पाकर अब मैं किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। अतः तुमसे आज्ञा चाहता हूँ। आज ही अपने घरको लौट जाऊँगा ॥ ५१ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा महाराज शल्यः समितिशोभनः । उत्थाय प्रययौ तूर्णं राजमध्यादमर्षितः ॥ ५२ ॥ **संजय कहते हैं—**महाराज! ऐसा कहकर युद्धमें शोभा पानेवाले शल्य अमर्षमें भर गये और राजाओंके बीचसे उठकर तुरंत चल दिये ॥ ५२ ॥
प्रणयाद् बहुमानाच्च तं निगृह्य सुतस्तव । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साम्ना सर्वार्थसाधकम् ॥ ५३ ॥ तब आपके पुत्रने बड़े प्रेम और आदरसे उन्हें रोका तथा सान्त्वनापूर्ण मधुर स्वरमें उनसे यह सर्वार्थसाधक वचन कहा— ॥ ५३ ॥