महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1786, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवहाँ रातभर सुखसे रहे। फिर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकले। निकलकर उन्होंने देखा कि कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष धर्मराज युधिष्ठिरने बृहस्पति और शुक्राचार्यके मतके अनुसार प्रयत्नपूर्वक अपनी सेनाका दुर्जय व्यूह बना रखा है॥ १२ १/२॥ अथ प्रतीपकर्तारं प्रवीरं परवीरहा ॥ १३ ॥ सस्मार वृषभस्कन्धं कर्णं दुर्योधनस्तदा । तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्योधनने शत्रुओंके विरुद्ध व्यूह-रचनामें समर्थ और वृषभके समान पुष्ट कंधोंवाले प्रमुख वीर कर्णका स्मरण किया॥ १३ १/२॥ पुरंदरसमं युद्धे मरुद्गणसमं बले ॥ १४ ॥ कार्तवीर्यसमं वीर्ये कर्णं राज्ञोऽगमन्मनः । कर्ण युद्धमें इन्द्रके समान पराक्रमी, मरुद्गणोंके समान बलवान् तथा कार्तवीर्य अर्जुनके समान शक्तिशाली था। राजा दुर्योधनका मन उसीकी ओर गया॥ १४ १/२॥ सर्वेषां चैव सैन्यानां कर्णमेवागमन्मनः । सूतपुत्रं महेष्वासं बन्धुमात्ययिकेष्विव ॥ १५ ॥ जैसे प्राण-संकटकालमें लोग अपने बन्धुजनोंका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार समस्त सेनाओंमेंसे केवल महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्णकी ओर ही उसका मन गया॥
धृतराष्ट्र उवाच
ततो दुर्योधनः सूत पश्चात् किमकरोत्तदा । यद्धोऽगमन्मनो मन्दाः कर्णं वैकर्तनं प्रति ॥ १६ ॥ अप्यपश्यत राधेयं शीतार्ता इव भास्करम् । धृतराष्ट्रने पूछा—सूत! तत्पश्चात् दुर्योधनने क्या किया। मूर्खों! तुमलोगोंका मन जो वैकर्तन कर्णकी ओर गया था, उसका क्या कारण है। जैसे शीतसे पीड़ित हुए प्राणी सूर्यकी ओर देखते हैं, क्या उसी प्रकार तुमलोग भी राधापुत्र कर्णकी ओर देखते थे? ॥ १६ १/२॥ कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रवृत्ते च रणे पुनः ॥ १७ ॥ कथं वैकर्तनः कर्णस्तत्रायुध्यत संजय । कथं च पाण्डवाः सर्वे युयुधुस्तत्र सूतजम् ॥ १८ ॥ संजय! सेनाको शिविरकी ओर लौटानेके बाद जब रात बीती और प्रातःकाल पुनः संग्राम आरम्भ हुआ, उस समय वैकर्तन कर्णने वहाँ किस प्रकार युद्ध किया तथा समस्त पाण्डवोंने सूतपुत्र कर्णके साथ किस प्रकार युद्ध आरम्भ किया? ॥ १७-१८ ॥ कर्णो ह्येको महाबाहुर्हन्यात् पार्थान् ससृंजयान् । कर्णस्य भुजयोर्वीर्यं शक्रविष्णुसमं युधि ॥ १९ ॥ तस्य शस्त्राणि घोराणि विक्रमश्च महात्मनः । कर्णमाश्रित्य संग्रामे मत्तो दुर्योधनो नृपः ॥ २० ॥