भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1785

हतप्रहतविध्वस्ता विवर्मायुधवाहनाः । दीनस्वरा दूयमाना मानिनः शत्रुनिर्जिताः ॥ ६ ॥ संजय बोले— राजन्! कौरव-सैनिक बाणोंसे घायल, छिन्न-भिन्न अवयवोंसे युक्त और अपने वाहनोंसे भ्रष्ट हो गये थे। उनके कवच, आयुध और वाहन नष्ट हो गये थे। उनके स्वरोंमें दीनता थी। शत्रुओंसे पराजित होनेके कारण वे स्वाभिमानी कौरव मन-ही-मन बहुत दुःख पा रहे थे ।।

शिबिरस्थाः पुनर्मन्त्रं मन्त्रयन्ति स्म कौरवाः । भग्नदंष्ट्रा हतविषाः पादाक्रान्ता इवोरगाः ॥ ७ ॥ शिविरमें आनेपर वे कौरव पुनः गुप्त मन्त्रणा करने लगे। उस समय उनकी दशा पैरसे कुचले गये उन सर्पोंके समान हो रही थी, जिनके दाँत तोड़ दिये और विष नष्ट कर दिये गये हों ॥ ७ ॥

तानब्रवीत् ततः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । करं करेण निष्पीड्य प्रेक्षमाणस्तवात्मजम् ॥ ८ ॥ उस समय क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए सर्पके समान कर्णने हाथ-से-हाथ दबाकर आपके पुत्रकी ओर देखते हुए उन कौरव वीरोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥

यत्तो दृढश्च दक्षश्च धृतिमानर्जुनस्तदा । सम्बोधयति चाप्येनं यथाकालमधोक्षजः ॥ ९ ॥ 'अर्जुन सावधान, दृढ़, चतुर और धैर्यवान् हैं। साथ ही उन्हें समय-समयपर श्रीकृष्ण भी कर्तव्यका ज्ञान कराते रहते हैं ।। ९ ।।

सहसास्त्रविसर्गेण वयं तेनाद्य वञ्चिताः । श्वस्त्वहं तस्य संकल्पं सर्वं हन्ता महीपते ॥ १० ॥ 'इसीलिये उन्होंने सहसा अस्त्रोंका प्रयोग करके आज हमें ठग लिया है; परंतु भूपाल! कल मैं उनके सारे मनसूबेको नष्ट कर दूँगा' ॥ १० ॥

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽनुजज्ञे नृपोत्तमान् । तेऽनुज्ञाता नृपाः सर्वे स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ११ ॥ कर्णके ऐसा कहनेपर दुर्योधनने 'तथास्तु' कहकर समस्त श्रेष्ठ राजाओंको विश्रामके लिये जानेकी आज्ञा दी। आज्ञा पाकर वे सब नरेश अपने-अपने शिविरोंमें चले गये ॥ ११ ॥

सुखोषितास्तां रजनीं हृष्टा युद्धाय निर्ययुः । तेऽपश्यन् विहितं व्यूहं धर्मराजेन दुर्जयम् ॥ १२ ॥ प्रयत्नात् कुरुमुख्येन बृहस्पत्युशनोमते ।