महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1787, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'अकेला महाबाहु कर्ण सृंजयोंसहित समस्त कुन्तीपुत्रोंको मार सकता है। युद्धमें कर्णका बाहुबल इन्द्र और विष्णुके समान है। उसके अस्त्र-शस्त्र भयंकर हैं तथा उस महामनस्वी वीरका पराक्रम भी अद्भुत है।' यह सब सोचकर राजा दुर्योधन संग्राममें कर्णका सहारा ले मतवाला हो उठा था ।। १९-२० ।।
दुर्योधनं ततो दृष्ट्वा पाण्डवेन भृशार्दितम् ।
पराक्रान्तान् पाण्डुसुतान् दृष्ट्वा चापि महारथः ॥ २१ ॥
किंतु उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरद्वारा दुर्योधनको अत्यन्त पीड़ित होते और पाण्डुपुत्रोंको पराक्रम प्रकट करते देखकर भी महारथी कर्णने क्या किया? ।। २१ ।।
कर्णमाश्रित्य संग्रामे मन्दो दुर्योधनः पुनः ।
जेतुमुत्सहते पार्थान् सपुत्रान् सहकेशवान् ।। २२ ।।
मूर्ख दुर्योधन संग्राममें कर्णका आश्रय लेकर पुनः पुत्रोसहित कुन्तीकुमारों और श्रीकृष्णको जीतनेके लिये उत्साहित हुआ था ।। २२ ।।
अहो बत महत् दुःखं यत्र पाण्डुसुतान् रणे ।
नातरद् रभसः कर्णो दैवं नूनं परायणम् ॥ २३ ॥
अहो! यह महान् दुःखकी बात है कि वेगशाली वीर कर्ण भी रणभूमिमें पाण्डवोंसे पार न पा सका। अवश्य दैव ही सबका परम आश्रय है ।। २३ ।।
अहो द्यूतस्य निष्ठेयं घोरा सम्प्रति वर्तते ।
अहो तीव्राणि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् ।। २४ ।।
सोढा घोराणि बहुशः शल्यभूतानि संजय ।
अहो! द्यूतक्रीडाका यह घोर परिणाम इस समय प्रकट हुआ है। संजय! आश्चर्य है कि मैंने दुर्योधनके कारण बहुत-से तीव्र एवं भयंकर दुःख, जो काँटोंके समान कसक रहे हैं, सहन किये हैं ।। २४ १/२ ।।
सौबलं च तदा तात नीतिमानिति मन्यते ॥ २५ ॥
कर्णश्च रभसो नित्यं राजा तं चाप्यनुव्रतः ।
तात! दुर्योधन उन दिनों शकुनिको बड़ा नीतिज्ञ मानता था तथा वेगशाली वीर कर्ण भी नीतिज्ञ है, ऐसा समझकर राजा दुर्योधन उसका भी भक्त बना रहा ।। २५ १/२ ।।
यदेवं वर्तमानेषु महायुद्धेषु संजय ॥ २६ ॥
अश्रौषं निहतान् पुत्रान् नित्यमेव विनिर्जितान् ।
न पाण्डवानां समरे कश्चिदस्ति निवारकः ।। २७ ।।
स्त्रीमध्यमिव गाहन्ते दैवं तु बलवत्तरम् ।