महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1789, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब रात बीती और प्रातःकाल हो गया, तब महाबाहु कर्ण राजा दुर्योधनके पास आया और उससे मिलकर इस प्रकार बोला ॥ ३४ ॥
कर्ण उवाच
अद्य राजन् समेष्यामि पाण्डवेन यशस्विना ।
निहनिष्यामि तं वीरं स वा मां निहनिष्यति ॥ ३५ ॥
**कर्णने कहा—**राजन्! आज मैं यशस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ संग्राम करूँगा। या तो मैं ही उस वीरको मार डालूँगा या वही मेरा वध कर डालेगा ॥ ३५ ॥
बहुत्वान्मम कार्याणां तथा पार्थस्य भारत ।
नाभूत् समागमो राजन् मम चैवार्जुनस्य च ॥ ३६ ॥
भरतवंशी नरेश! मेरे तथा अर्जुनके सामने बहुत-से कार्य आते गये; इसलिये अबतक मेरा और उनका द्वैरथ युद्ध न हो सका ॥ ३६ ॥
इदं तु मे यथाप्राज्ञं शृणु वाक्यं विशाम्पते ।
अनिहत्य रणे पार्थं नाहमेष्यामि भारत ॥ ३७ ॥
प्रजानाथ! भरतनन्दन! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार निश्चय करके यह जो बात कह रहा हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। आज मैं रणभूमिमें अर्जुनका वध किये बिना नहीं लौटूँगा ॥ ३७ ॥
हतप्रवीरे सैन्येऽस्मिन् मयि चावस्थिते युधि ।
अभियास्यति मां पार्थः शक्रशक्तिविनाकृतम् ॥ ३८ ॥
हमारी इस सेनाके प्रमुख वीर मारे गये हैं। अतः मैं युद्धमें जब इस सेनाके भीतर खड़ा होऊँगा, उस समय अर्जुन मुझे इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे वंचित जानकर अवश्य मुझपर आक्रमण करेंगे ॥ ३८ ॥
ततः श्रेयस्करं यच्च तन्निबोध जनेश्वर ।
आयुधानां च मे वीर्यं दिव्यानामर्जुनस्य च ॥ ३९ ॥
जनेश्वर! अब जो यहाँ हितकर बात है, उसे सुनिये। मेरे तथा अर्जुनके पास भी दिव्यास्त्रोंका समान बल है ॥ ३९ ॥
कायस्य महतो भेदे लाघवे दूरपातने ।
सौष्ठवे चास्त्रपाते च सव्यसाची न मत्समः ॥ ४० ॥
हाथी आदिके विशाल शरीरका भेदन करने, शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाने, दूरका लक्ष्य वेधने, सुन्दर रीतिसे युद्ध करने तथा दिव्यास्त्रोंके प्रयोगमें भी सव्यसाची अर्जुन मेरे समान नहीं हैं ॥ ४० ॥
घ्राणे शौर्येऽथ विज्ञाने विक्रमे चापि भारत ।
निमित्तज्ञानयोगे च सव्यसाची न मत्समः ॥ ४१ ॥