भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1792

श्रीकृष्ण जगत्के स्रष्टा हैं। वे अर्जुनके उस रथकी रक्षा करते हैं। इन्हीं वस्तुओंसे हीन होकर मैं पाण्डुपुत्र अर्जुनसे युद्धकी इच्छा रखता हूँ ॥ ५७ ॥ अयं तु सदृशः शौरेः शल्यः समितिशोभनः । सारथ्यं यदि मे कुर्याद् ध्रुवस्ते विजयो भवेत् ॥ ५८ ॥ अवश्य ही ये युद्धमें शोभा पानेवाले राजा शल्य श्रीकृष्णके समान हैं, यदि ये मेरे सारथिका कार्य कर सकें तो तुम्हारी विजय निश्चित है ॥ ५८ ॥ तस्य मे सारथिः शल्यो भवत्वसुकरः परैः । नाराचान् गार्ध्रपत्रांश्च शकटानि वहन्तु मे ॥ ५९ ॥ शत्रुओंसे सुगमतापूर्वक जीते न जा सकनेवाले राजा शल्य मेरे सारथि हो जायँ और बहुत-से छकड़े मेरे पास गीधकी पाँखोंसे युक्त नाराच पहुँचाते रहें ॥ ५९ ॥ रथाश्च मुख्या राजेन्द्र युक्ता वाजिभिरुत्तमैः । अयान्तु पश्चात् सततं मामेव भरतर्षभ ॥ ६० ॥ राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए अच्छे-अच्छे रथ सदा मेरे पीछे चलते रहें ॥ ६० ॥ एवमभ्यधिकः पार्थाद् भविष्यामि गुणैरहम् । शल्योऽप्यधिकः कृष्णादर्जुनादपि चाप्यहम् ॥ ६१ ॥ ऐसी व्यवस्था होनेपर मैं गुणोंमें पार्थसे बढ़ जाऊँगा। शल्य भी श्रीकृष्णसे बड़े-चढ़े हैं और मैं भी अर्जुनसे श्रेष्ठ हूँ ॥ ६१ ॥ यथाश्वहृदयं वेद दाशार्हः परवीरहा । तथा शल्यो विजानीते हयज्ञानं महारथः ॥ ६२ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दशार्हवंशी श्रीकृष्ण अश्वविद्याके रहस्यको जिस प्रकार जानते हैं, उसी प्रकार महारथी शल्य भी अश्वविज्ञानके विशेषज्ञ हैं ॥ ६२ ॥ बाहुवीर्ये समो नास्ति मद्रराजस्य कश्चन । तथास्त्रे मत्समो नास्ति कश्चिदेव धनुर्धरः ॥ ६३ ॥ बाहुबलमें मद्रराज शल्यकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। उसी प्रकार अस्त्रविद्यामें मेरे समान कोई भी धनुर्धर नहीं है ॥ ६३ ॥ तथा शल्यसमो नास्ति हयज्ञाने हि कश्चन । सोऽयमभ्यधिकः कृष्णाद् भविष्यति रथो मम ॥ ६४ ॥ अश्वविज्ञानमें भी शल्यके समान कोई नहीं है। शल्यके सारथि होनेपर मेरा यह रथ अर्जुनके रथसे बढ़ जायगा ॥ ६४ ॥ एवं कृते रथस्थोऽहं गुणैरभ्यधिकोऽर्जुनात् । भवे युधि जयेयं च फाल्गुनं कुरुसत्तम ॥ ६५ ॥ समुद्यातुं न शक्ष्यन्ति देवा अपि सवासवाः ।