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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

श्रीकृष्ण जगत्के स्रष्टा हैं। वे अर्जुनके उस रथकी रक्षा करते हैं। इन्हीं वस्तुओंसे हीन होकर मैं पाण्डुपुत्र अर्जुनसे युद्धकी इच्छा रखता हूँ ॥ ५७ ॥ अयं तु सदृशः शौरेः शल्यः समितिशोभनः । सारथ्यं यदि मे कुर्याद् ध्रुवस्ते विजयो भवेत् ॥ ५८ ॥ अवश्य ही ये युद्धमें शोभा पानेवाले राजा शल्य श्रीकृष्णके समान हैं, यदि ये मेरे सारथिका कार्य कर सकें तो तुम्हारी विजय निश्चित है ॥ ५८ ॥ तस्य मे सारथिः शल्यो भवत्वसुकरः परैः । नाराचान् गार्ध्रपत्रांश्च शकटानि वहन्तु मे ॥ ५९ ॥ शत्रुओंसे सुगमतापूर्वक जीते न जा सकनेवाले राजा शल्य मेरे सारथि हो जायँ और बहुत-से छकड़े मेरे पास गीधकी पाँखोंसे युक्त नाराच पहुँचाते रहें ॥ ५९ ॥ रथाश्च मुख्या राजेन्द्र युक्ता वाजिभिरुत्तमैः । अयान्तु पश्चात् सततं मामेव भरतर्षभ ॥ ६० ॥ राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए अच्छे-अच्छे रथ सदा मेरे पीछे चलते रहें ॥ ६० ॥ एवमभ्यधिकः पार्थाद् भविष्यामि गुणैरहम् । शल्योऽप्यधिकः कृष्णादर्जुनादपि चाप्यहम् ॥ ६१ ॥ ऐसी व्यवस्था होनेपर मैं गुणोंमें पार्थसे बढ़ जाऊँगा। शल्य भी श्रीकृष्णसे बड़े-चढ़े हैं और मैं भी अर्जुनसे श्रेष्ठ हूँ ॥ ६१ ॥ यथाश्वहृदयं वेद दाशार्हः परवीरहा । तथा शल्यो विजानीते हयज्ञानं महारथः ॥ ६२ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दशार्हवंशी श्रीकृष्ण अश्वविद्याके रहस्यको जिस प्रकार जानते हैं, उसी प्रकार महारथी शल्य भी अश्वविज्ञानके विशेषज्ञ हैं ॥ ६२ ॥ बाहुवीर्ये समो नास्ति मद्रराजस्य कश्चन । तथास्त्रे मत्समो नास्ति कश्चिदेव धनुर्धरः ॥ ६३ ॥ बाहुबलमें मद्रराज शल्यकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। उसी प्रकार अस्त्रविद्यामें मेरे समान कोई भी धनुर्धर नहीं है ॥ ६३ ॥ तथा शल्यसमो नास्ति हयज्ञाने हि कश्चन । सोऽयमभ्यधिकः कृष्णाद् भविष्यति रथो मम ॥ ६४ ॥ अश्वविज्ञानमें भी शल्यके समान कोई नहीं है। शल्यके सारथि होनेपर मेरा यह रथ अर्जुनके रथसे बढ़ जायगा ॥ ६४ ॥ एवं कृते रथस्थोऽहं गुणैरभ्यधिकोऽर्जुनात् । भवे युधि जयेयं च फाल्गुनं कुरुसत्तम ॥ ६५ ॥ समुद्यातुं न शक्ष्यन्ति देवा अपि सवासवाः ।

ऐसी व्यवस्था कर लेनेपर जब मैं रथमें बैठूँगा, उस समय सभी गुणोंद्वारा अर्जुनसे बढ़ जाऊँगा। कुरुश्रेष्ठ! फिर तो मैं युद्धमें अर्जुनको अवश्य जीत लूँगा। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी मेरा सामना नहीं कर सकेंगे ॥ ६५ १/२ ॥
एतत् कृतं महाराज त्वयेच्छामि परंतप ॥ ६६ ॥
क्रियतामेष कामो मे मा वः कालोऽत्यगादयम् ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! मैं चाहता हूँ कि आपके द्वारा यही व्यवस्था हो जाय। मेरा यह मनोरथ पूर्ण किया जाय। अब आपलोगोंका यह समय व्यर्थ नहीं बीतना चाहिये ॥ ६६ १/२ ॥
एवं कृते कृतं साह्यं सर्वकामैर्भविष्यति ॥ ६७ ॥
ततो द्रक्ष्यसि संग्रामे यत् करिष्यामि भारत ।
सर्वथा पाण्डवान् संख्ये विजेष्ये वै समागतान् ॥ ६८ ॥
ऐसा करनेपर मेरी सम्पूर्ण इच्छाओंके अनुसार सहायता सम्पन्न हो जायगी। भारत! उस समय मैं संग्राममें जो कुछ करूँगा, उसे तुम स्वयं देख लोगे। युद्धस्थलमें आये हुए समस्त पाण्डवोंको निश्चय ही मैं सब प्रकारसे जीत लूँगा ॥ ६७-६८ ॥
न हि मे समरे शक्ताः समुद्यातुं सुरसुराः ।
किमु पाण्डुसुता राजन् रणे मानुषयोनयः ॥ ६९ ॥
राजन्! समरांगणमें देवता और असुर भी मेरा सामना नहीं कर सकते, फिर मनुष्य-योनिमें उत्पन्न हुए पाण्डव तो कर ही कैसे सकते हैं ॥ ६९ ॥

संजय उवाच

एवमुक्तस्तव सुतः कर्णेनाहवशोभिना ।
सम्पूज्य सम्प्रहृष्टात्मा ततो राधेयमब्रवीत् ॥ ७० ॥
संजय कहते हैं— राजन्! युद्धमें शोभा पानेवाले कर्णके ऐसा कहनेपर आपके पुत्र दुर्योधनका मन प्रसन्न हो गया। फिर उसने राधापुत्र कर्णका पूर्णतः सम्मान करके उससे कहा ॥ ७० ॥

दुर्योधन उवाच

एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वं कर्ण मन्यसे ।
सोपासङ्गा रथाः साश्वाः स्वनुयास्यन्ति संयुगे ॥ ७१ ॥
दुर्योधन बोला— कर्ण! जैसा तुम ठीक समझते हो उसीके अनुसार यह सारा कार्य मैं करूँगा। युद्धस्थलमें अनेक तरकशोंसे भरे हुए बहुत-से अश्वयुक्त रथ तुम्हारे पीछे-पीछे जायँगे ॥ ७१ ॥
नाराचान् गार्ध्रपत्रांश्च शकटानि वहन्तु ते ।
अनुयास्याम कर्ण त्वां वयं सर्वे च पार्थिवाः ॥ ७२ ॥

कई छकड़े तुम्हारे पास गीधकी पाँखोंसे युक्त नाराच पहुँचाया करेंगे। कर्ण! हमलोग तथा समस्त भूपालगण तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे ॥ ७२ ॥

संजय उवाच

एवमुक्त्वा महाराज तव पुत्रः प्रतापवान् ।
अभिगम्याब्रवीद् राजा मद्रराजमिदं वचः ॥ ७३ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! ऐसा कहकर आपके प्रतापी पुत्र राजा दुर्योधनने मद्रराज शल्यके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ ७३ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णदुर्योधनसंवादे एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और दुर्योधनका संवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1795)

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द्वात्रिंशोऽध्यायः

दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना और शल्यका इस विषयमें घोर विरोध करना, पुनः श्रीकृष्णके समान अपनी प्रशंसा सुनकर उसे स्वीकार कर लेना

संजय उवाच

पुत्रस्तव महाराज मद्रराजं महारथम् ।
विनयेनोपसंगम्य प्रणयाद् वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! आपका पुत्र दुर्योधन मद्रराज महारथी शल्यके पास विनीतभावसे जाकर प्रेमपूर्वक इस प्रकार बोला— ॥ १ ॥

सत्यव्रत महाभाग द्विषतां तापवर्धन ।
मद्रेश्वर रणे शूर परसैन्यभयंकर ॥ २ ॥
श्रुतवानसि कर्णस्य ब्रुवतो वदतां वर ।
यथा नृपतिसिंहानां मध्ये त्वां वरये स्वयम् ॥ ३ ॥
‘महाभाग! सत्यव्रत! शत्रुओंका संताप बढ़ानेवाले मद्रराज! रणवीर! शत्रुसैन्यभयंकर! वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आपने कर्णकी बात सुनी है। उसीके अनुसार इन राजसिंहोंके बीचमें मैं स्वयं आपका वरण करता हूँ ॥ २-३ ॥

तत्त्वामप्रतिवीर्याद्य शत्रुपक्षक्षयावह ।
मद्रेश्वर प्रयाचेऽहं शिरसा विनयेन च ॥ ४ ॥
तस्मात् पार्थविनाशार्थं हितार्थं मम चैव हि ।
सारथ्यं रथिनां श्रेष्ठ प्रणयात् कर्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
‘शत्रुपक्षका विनाश करनेवाले, अनुपम शक्तिशाली, रथियोंमें श्रेष्ठ मद्रराज! मैं मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक आपसे यह याचना करता हूँ कि आप अर्जुनके विनाश और मेरे हितके लिये प्रेमपूर्वक कर्णका सारथ्य कीजिये ॥ ४-५ ॥

त्वयि यन्तरि राधेयो विद्विषो मे विजेष्यते ।
अभीषूणां हि कर्णस्य ग्रहीतान्यो न विद्यते ॥ ६ ॥
ऋते हि त्वां महाभाग वासुदेवसमं युधि ।
‘आपके सारथि होनेपर राधापुत्र कर्ण मेरे शत्रुओंको जीत लेगा। कर्णके रथकी बागडोर पकड़नेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। महाभाग! आप युद्धमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समान हैं ॥ ६ १/२ ॥

स पाहि सर्वथा कर्णं यथा ब्रह्मा महेश्वरम् ॥ ७ ॥ यथा च सर्वथाऽऽपत्सु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् । तथा मद्रेश्वराद्य त्वं राधेयं प्रतिपालय ॥ ८ ॥ ‘जैसे ब्रह्माजीने सारथि बनकर महादेवजीकी रक्षा की थी और जैसे सब प्रकारकी आपत्तियोंसे श्रीकृष्ण अर्जुनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप कर्णकी सर्वथा रक्षा कीजिये। मद्रराज! आज आप राधापुत्रका प्रतिपालन कीजिये॥ भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णोभवान् भोजश्च वीर्यवान् । शकुनिः सौबलो द्रौणिरहमेव च नो बलम् ॥ ९ ॥ ‘भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य कर्ण, आप, पराक्रमी कृतवर्मा, सुबलपुत्र शकुनि, द्रोणकुमार अश्वत्थामा और मैं—ये ही हमारे बल हैं॥ ९॥ एवमेष कृतो भागो नवधा पृथिवीपते । न च भागोऽत्र भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ १० ॥ ताभ्यामतीत्य तौ भागौ निहता मम शत्रवः । ‘पृथ्वीपते! इस प्रकार मेरी सेनाके ये नौ भाग किये गये थे। अब यहाँ भीष्म तथा महात्मा द्रोणाचार्यका भाग नहीं रह गया है। उन दोनोंने उनके लिये निर्धारित भागोंसे और आगे बढ़कर मेरे शत्रुओंका संहार किया है॥ १० १/२ ॥ वृद्धौ हि तौ महेष्वासौ छलेन निहतौ युधि ॥ ११ ॥ कृत्वा नसुकरं कर्म गतौ स्वर्गमितोऽनघ । तथान्ये पुरुषव्याघ्राः परैर्विनिहता युधि ॥ १२ ॥ ‘वे दोनों महाधनुर्धर योद्धा बूढ़े हो गये थे, इसलिये युद्धमें शत्रुओंद्वारा छलपूर्वक मारे गये। अनघ! वे दुष्कर कर्म करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये। इसी प्रकार दूसरे पुरुषसिंह वीर भी युद्धमें शत्रुओंद्वारा मारे गये हैं॥ ११-१२॥ अस्मदीयाश्च बहवः स्वर्गायोपगता रणे । त्यक्त्वा प्राणान् यथाशक्ति चेष्टां कृत्वा च पुष्कलाम् ॥ १३ ॥ ‘मेरे पक्षके बहुत-से योद्धा विजयके लिये यथाशक्ति पूरी चेष्टा करके रणभूमिमें प्राण त्यागकर स्वर्गलोकको चले गये॥ १३॥ तदिदं हतभूयिष्ठं बलं मम नराधिप । पूर्वमप्यल्पकैः पार्थैर्हतं किमुत साम्प्रतम् ॥ १४ ॥ ‘नरेश्वर! इस प्रकार मेरी इस सेनाका अधिकांश भाग नष्ट हो चुका है। पहले भी जब अपनी सारी सेना मौजूद थी, अल्पसंख्यक कुन्तीकुमारोंने कौरवसेनाका नाश कर दिया था। फिर इस समय तो कहना ही क्या है? ॥ १४ ॥ बलवन्तो महात्मानः कौन्तेयाः सत्यविक्रमाः । बलं शेषं न हन्युर्मे यथा तत् कुरु पार्थिव ॥ १५ ॥

‘भूपाल! बलवान्, महामनस्वी और सत्यपराक्रमी कुन्तीकुमार मेरी शेष सेनाको जिस तरह भी नष्ट न कर सकें, ऐसा उपाय कीजिये ।। १५ ।। हतवीरमिदं सैन्यं पाण्डवैः समरे विभो । कर्णो ह्येको महाबाहुरस्मत्प्रियहिते रतः ।। १६ ।। ‘प्रभो! पाण्डवोंने समरांगणमें मेरी सेनाके प्रमुख वीरोंको मार डाला है। एक महाबाहु कर्ण ही ऐसा है, जो हमारे प्रिय एवं हितसाधनमें लगा हुआ है ।। १६ ।। भवांश्च पुरुषव्याघ्र सर्वलोकमहारथः । शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धुमिच्छति संयुगे ।। १७ ।। ‘पुरुषसिंह शल्य! दूसरे आप भी सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात महारथी होकर हमारे हितसाधनमें संलग्न हैं। आज कर्ण रणभूमिमें अर्जुनके साथ युद्ध करना चाहता है ।। १७ ।। तस्मिञ्जयाशा विपुला मद्रराज नराधिप । तस्याभीषुग्रहवरो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन ।। १८ ।। ‘मद्रराज! नरेश्वर! उसके मनमें विजयकी बड़ी भारी आशा है, परंतु उसके घोड़ोंकी रास पकड़नेवाला (आपके समान) दूसरा कोई इस भूतलपर नहीं है ।। पार्थस्य समरे कृष्णो यथाभीषुग्रहो वरः । तथा त्वमपि कर्णस्य रथेऽभीषुग्रहो भव ।। १९ ।। ‘जैसे संग्रामभूमिमें अर्जुनके रथकी बागडोर सँभालनेवाले श्रेष्ठ सारथि श्रीकृष्ण हैं, उसी प्रकार आप भी कर्णके रथपर बैठकर उसकी बागडोर अपने हाथमें लीजिये ।। तेन युक्तो रणे पार्थो रक्ष्यमाणश्च पार्थिव । यानि कर्माणि कुरुते प्रत्यक्षाणि तथैव तत् ।। २० ।। ‘राजन्! श्रीकृष्णसे संयुक्त एवं सुरक्षित होकर पार्थ रणभूमिमें जो-जो कर्म करते हैं, वे सब आपकी आँखोंके सामने हैं ।। २० ।। पूर्वं न समरे ह्येवमवधीदर्जुनो रिपून् । इदानीं विक्रमो ह्यस्य कृष्णेन सहितस्य च ।। २१ ।। ‘पहले युद्धमें अर्जुन इस प्रकार शत्रुओंका वध नहीं करते थे। इस समय श्रीकृष्णके साथ होनेसे ही इनका पराक्रम बढ़ गया है ।। २१ ।। कृष्णेन सहितः पार्थो धार्तराष्ट्रीं महाचमूम् । अहन्यहनि मद्रेश द्रावयन् दृश्यते युधि ।। २२ ।। ‘मद्रराज! श्रीकृष्णके साथ अर्जुन प्रतिदिन हमारी विशाल सेनाको युद्धभूमिमें खदेड़ते देखे जाते हैं ।। २२ ।। भागोऽवशिष्टः कर्णस्य तव चैव महाद्युते । तं भागं सह कर्णेन युगपन्नाशयाद्य हि ।। २३ ।।

‘महातेजस्वी नरेश! अब कर्णका और आपका भाग शेष रह गया है। अतः आप कर्णके साथ रहकर शत्रुसेनाके उस भागको एक साथ ही नष्ट कर दीजिये।।
अरुणेन यथा सार्धं तमः सूर्यो व्यपोहति ।
तथा कर्णेन सहितो जहि पार्थं महाहवे ।। २४ ।।
‘जैसे अरुणके साथ सूर्य अन्धकारका नाश करते हैं, उसी प्रकार आप महासमरमें कर्णके साथ रहकर कुन्तीकुमार अर्जुनका वध कीजिये ।। २४ ।।
उद्यन्तौ च यथा सूर्यौ बालसूर्यसमप्रभौ ।
कर्णशल्यौ रणे दृष्ट्वा विद्रवन्तु महारथाः ।। २५ ।।
‘प्रातःकालीन सूर्यके तुल्य तेजस्वी कर्ण और शल्यको उदित होते हुए दो सूर्योंके समान रणभूमिमें देखकर शत्रुसेनाके महारथी भाग जायँ ।। २५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1799)

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दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना

सूर्यारुणौ यथा दृष्ट्वा तमो नश्यति मारिष । तथा नश्यन्तु कौन्तेयाः सपञ्चालाः ससंजयाः ॥ २६ ॥ 'मान्यवर! जैसे सूर्य और अरुणको देखते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार आप दोनोंको देखकर कुन्तीके पुत्र, पांचाल और सृंजय नष्ट हो जायें ॥

रथिनां प्रवरः कर्णो यन्तॄणां प्रवरो भवान् । संयोगो युवयोर्लोके नाभून्न च भविष्यति ॥ २७ ॥ 'कर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ है और आप सारथियोंके शिरोमणि हैं। संसारमें आप दोनोंका संयोग जो आज बन गया है, न तो कभी हुआ था और न आगे कभी होगा ॥ २७ ॥

यथा सर्वास्ववस्थासु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् । तथा भवान् परित्रातुं कर्णं वैकर्तनं रणे ॥ २८ ॥ 'जैसे श्रीकृष्ण सभी अवस्थाओंमें पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप रणभूमिमें वैकर्तन कर्णकी रक्षा करें ॥ २८ ॥

(सारथ्यं क्रियतां तस्य युध्यमानस्य संयुगे ।) त्वया सारथिना ह्येष अप्रधृष्यो भविष्यति । देवतानामपि रणे सशक्राणां महीपते । किं पुनः पाण्डवेयानां मा विशंकीर्वचो मम ॥ २९ ॥ 'युद्धस्थलमें युद्ध करते समय कर्णके सारथिका कार्य सँभालिये। राजन्! आपके सारथि होनेसे यह कर्ण रणभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हो जायगा, फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है। आप मेरे इस कथनमें संदेह न कीजिये' ॥ २९ ॥

संजय उवाच

दुर्योधनवचः श्रुत्वा शल्यः क्रोधसमन्वितः । विशिखां भुकुटिं कृत्वा धुन्वन् हस्तौ पुनः पुनः ॥ ३० ॥ संजय कहते हैं—राजन्! दुर्योधनकी बात सुनकर शल्यको बड़ा क्रोध हुआ। वे अपनी भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके बारंबार हाथ हिलाने लगे ॥ ३० ॥

क्रोधरक्ते महानेत्रे परिवृत्य महाभुजः । कुलैश्वर्यश्रुतबलैर्दृप्तः शल्योऽब्रवीदिदम् ॥ ३१ ॥ महाबाहु शल्यको अपने कुल, ऐश्वर्य, शास्त्रज्ञान और बलका बड़ा अभिमान था। वे क्रोधसे लाल हुए विशाल नेत्रोंको घुमाकर इस प्रकार बोले ॥ ३१ ॥

शल्य उवाच

अवमन्यसि गान्धारे ध्रुवं च परिशङ्कसे । यन्मां ब्रवीषि विश्रब्धं सारथ्यं क्रियतामिति ॥ ३२ ॥

शल्यने कहा— गान्धारीपुत्र! तुम मेरा अपमान कर रहे हो, निश्चय ही तुम्हारे मनमें मेरे प्रति संदेह है, तभी तुम निर्भय होकर कह रहे हो कि आप ‘सारथिका कार्य कीजिये’ ।। ३२ ।।

अस्मत्तोऽभ्यधिकं कर्णं मन्यमानः प्रशंससि ।
न चाहं युधि राधेयं गणये तुल्यमात्मनः ॥ ३३ ॥
तुम कर्णको मुझसे श्रेष्ठ मानकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हो; परंतु युद्धस्थलमें राधापुत्र कर्णको मैं अपने समान नहीं गिनता हूँ ।। ३३ ।।

आदिश्यतामभ्यधिको ममांशः पृथिवीपते ।
तमहं समरे जित्वा गमिष्यामि यथागतम् ॥ ३४ ॥
राजन्! तुम शत्रुसेनाके अधिक-से-अधिक भागको मेरे हिस्सेमें दे दो, मैं उसे जीतकर जैसे आया हूँ, वैसे लौट जाऊँगा ।। ३४ ।।

अथवाप्येक एवाहं योत्स्यामि कुरुनन्दन ।
पश्य वीर्यं ममाद्य त्वं संग्रामे दहतो रिपून् ॥ ३५ ॥
अथवा कुरुनन्दन! आज मैं अकेला ही युद्ध करूँगा। तुम संग्राममें शत्रुओंको दग्ध करते हुए मेरे पराक्रमको देख लेना ।। ३५ ।।

न चापि कामान् कौरव्य निधाय हृदये पुमान् ।
अस्मद्विधः प्रवर्तेत मा मां त्वमभिशङ्किथाः ॥ ३६ ॥
कौरव्य! मेरे-जैसा पुरुष अपने मनमें कुछ कामनाएँ रखकर युद्धमें प्रवृत्त नहीं होता। अतः तुम मुझपर संदेह न करो ।। ३६ ।।

युधि वाप्यवमानो मे न कर्तव्यः कथञ्चन ।
पश्य पीनौ मम भुजौ वज्रसंहननौ दृढौ ॥ ३७ ॥
धनुः पश्य च मे चित्रं शरांश्चाशीविषोपमान् ।
रथं पश्य च मे क्लृप्तं सदश्वैर्वातवेगितैः ॥ ३८ ॥
गदां च पश्य गान्धारे हेमपट्टविभूषिताम् ।
तुम्हें युद्धमें किसी प्रकार मेरा अपमान नहीं करना चाहिये। तुम मेरी मोटी और वज्रके समान गँठीली इन सुदृढ़ भुजाओंको तो देखो। मेरे इस विचित्र धनुष और विषधर सर्पके समान इन विषैले बाणोंकी ओर तो दृष्टिपात करो। गन्धारीकुमार! वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए मेरे इस सजे-सजाये रथ और सुवर्णपत्रसे मढ़ी हुई गदापर भी तो दृष्टि डालो ।। ३७-३८ १/२ ।।

दारयेयं महीं कृत्स्नां विकिरेयं च पर्वतान् ॥ ३९ ॥
शोषयेयं समुद्रांश्च तेजसा स्वेन पार्थिव ।
राजन्! मैं सारी पृथिवीको विदीर्ण कर सकता हूँ, पर्वतोंको तोड़-फोड़कर बिखेर सकता हूँ और अपने तेजसे समुद्रोंको भी सुखा सकता हूँ ।। ३९ १/२ ।।

तं मामेवंविधं राजन् समर्थमरिनिग्रहे ॥ ४० ॥
कस्माद् युनक्षि सारथ्ये नीचस्याधिरथे रणे ।
नरेश्वर! इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेमें पूर्णतया समर्थ होनेपर भी तुम मुझे इस नीच सूतपुत्र कर्णके सारथिके कामपर कैसे नियुक्त कर रहे हो? ॥ ४० १/२ ॥

न मामधुरि राजेन्द्र नियोक्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ४१ ॥
न हि पापीयसः श्रेयान् भूत्वा प्रेष्यत्वमुत्सहे ।
राजेन्द्र! तुम्हें मुझे नीच कर्ममें नहीं लगाना चाहिये। मैं श्रेष्ठ होकर अत्यन्त नीच पापी पुरुषकी दासता नहीं कर सकता ॥ ४१ १/२ ॥

यो ह्यभ्युपगतं प्रीत्या गरीयांसं वशे स्थितम् ॥ ४२ ॥
वशे पापीयसो धत्ते तत् पापमधरोत्तरम् ।
जो पुरुष प्रेमवश अपने पास आकर अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले किसी श्रेष्ठतम पुरुषको नीचतम मनुष्यके अधीन कर देता है, उसे उच्चको नीच और नीचको उच्च करनेका महान् पाप लगता है ॥ ४२ १/२ ॥

ब्रह्मणा ब्राह्मणाः सृष्टा मुखात् क्षत्रं च बाहुतः ॥ ४३ ॥
ऊरुभ्यामसृजद् वैश्याञ्शूद्रान् पद्भ्यामिति श्रुतिः ।
ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंको अपने मुखसे, क्षत्रियोंको भुजाओंसे, वैश्योंको जाँघोंसे और शूद्रोंको पैरोंसे उत्पन्न किया है, ऐसा श्रुतिका मत है ॥ ४३ १/२ ॥

तेभ्यो वर्णविशेषाश्च प्रतिलोमानुलोमजाः ॥ ४४ ॥
अथान्योन्यस्य संयोगाच्चातुर्वर्ण्यस्य भारत ।
भारत! इन्हींसे अनुलोम और विलोम क्रमसे विभिन्न वर्णोंकी उत्पत्ति होती है। चारों वर्णोंके पारस्परिक संयोगसे अन्य जातियाँ उत्पन्न हुई हैं ॥ ४४ १/२ ॥

गोप्तारः संगृहीतारो दातारः क्षत्रियाः स्मृताः ॥ ४५ ॥
याजनाध्यापनैर्विप्रा विशुद्धैश्च प्रतिग्रहैः ।
लोकस्यानुग्रहार्थाय स्थापिता ब्राह्मणा भुवि ॥ ४६ ॥
इनमें क्षत्रिय-जातिके लोग सबकी रक्षा करनेवाले, सबसे कर लेनेवाले और दान देनेवाले बताये गये हैं। ब्राह्मण यज्ञ कराने, वेद पढ़ाने और विशुद्ध दान ग्रहण करनेके द्वारा जीवन-निर्वाह करते हुए सम्पूर्ण जगत्‌पर अनुग्रह करनेके लिये इस भूतलपर ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित किये गये हैं ॥ ४५-४६ ॥

कृषिश्च पशुपाल्यं च विशां दानं च धर्मतः ।
ब्रह्मक्षत्रविशां शूद्रा विहिताः परिचारकाः ॥ ४७ ॥
कृषि, पशुपालन और धर्मानुसार दान देना वैश्योंका कर्म है तथा शूद्रलोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवाके काममें नियुक्त किये गये हैं ॥ ४७ ॥

ब्रह्मक्षत्रस्य विहिताः सूता वै परिचारकाः । न क्षत्रियो वै सूतानां शृणुयाच्च कथञ्चन ॥ ४८ ॥ सूतजातिके लोग ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके सेवक नियुक्त किये गये हैं, क्षत्रिय सूतोंका सेवक हो, यह कोई किसी प्रकार कहीं नहीं सुन सकता ॥ ४८ ॥

अहं मूर्धाभिषिक्तो हि राजर्षिकुलजो नृपः । महारथः समाख्यातः सेव्यः स्तुत्यश्च वन्दिनाम् ॥ ४९ ॥ मैं राजर्षियोंके कुलमें उत्पन्न हुआ मूर्द्धाभिषिक्त नरेश हूँ, विश्वविख्यात महारथी हूँ, सूतोंद्वारा सेव्य और वन्दीजनोंद्वारा स्तुतिके योग्य हूँ ॥ ४९ ॥

सोऽहमेतादृशो भूत्वा नेहारिबलसूदनः । सूतपुत्रस्य संग्रामे सारथ्यं कर्तुमुत्सहे ॥ ५० ॥ ऐसा प्रतिष्ठित एवं शत्रुसेनाका संहार करनेमें समर्थ होकर मैं यहाँ युद्धस्थलमें एक सूतपुत्रके सारथिका कार्य कदापि नहीं कर सकता ॥ ५० ॥

अवमानमहं प्राप्य न योत्स्यामि कथञ्चन । आपृच्छे त्वाद्य गान्धारे गमिष्यामि गृहाय वै ॥ ५१ ॥ गान्धारीनन्दन! आज इस अपमानको पाकर अब मैं किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। अतः तुमसे आज्ञा चाहता हूँ। आज ही अपने घरको लौट जाऊँगा ॥ ५१ ॥

संजय उवाच

एवमुक्त्वा महाराज शल्यः समितिशोभनः । उत्थाय प्रययौ तूर्णं राजमध्यादमर्षितः ॥ ५२ ॥ **संजय कहते हैं—**महाराज! ऐसा कहकर युद्धमें शोभा पानेवाले शल्य अमर्षमें भर गये और राजाओंके बीचसे उठकर तुरंत चल दिये ॥ ५२ ॥

प्रणयाद् बहुमानाच्च तं निगृह्य सुतस्तव । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साम्ना सर्वार्थसाधकम् ॥ ५३ ॥ तब आपके पुत्रने बड़े प्रेम और आदरसे उन्हें रोका तथा सान्त्वनापूर्ण मधुर स्वरमें उनसे यह सर्वार्थसाधक वचन कहा— ॥ ५३ ॥

यथा शल्य विजानीषे एवमेतदसंशयम् । अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ॥ ५४ ॥ ‘महाराज शल्य! आप अपने विषयमें जैसा समझते हैं ऐसी ही बात है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। मेरा कोई और ही अभिप्राय है, उसे ध्यान देकर सुनिये ॥ ५४ ॥ न कर्णोऽभ्यधिकस्त्वत्तो न शङ्के त्वां च पार्थिव । न हि मद्रेश्वरो राजा कुर्याद् यदनृतं भवेत् ॥ ५५ ॥ ‘भूपाल! न तो कर्ण आपसे श्रेष्ठ है और न आपके प्रति मैं संदेह ही करता हूँ। मद्रदेशके स्वामी राजा शल्य कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकते, जो उनकी सत्य प्रतिज्ञाके विपरीत हो ॥ ५५ ॥ ऋतमेव हि पूर्वास्ते वदन्ति पुरुषोत्तमाः । तस्मादार्तायनिः प्रोक्तो भवानिति मतिर्मम ॥ ५६ ॥ ‘आपके पूर्वज श्रेष्ठ पुरुष थे और सदा सत्य ही बोला करते थे, इसीलिये आप ‘आर्तायनि’ कहलाते हैं; मेरी ऐसी ही धारणा है ॥ ५६ ॥ शल्यभूतस्तु शत्रूणां यस्मात्त्वं युधि मानद । तस्माच्छल्यो हि ते नाम कथ्यते पृथिवीतले ॥ ५७ ॥

‘मानद! आप युद्धस्थलमें शत्रुओंके लिये शल्य (काँटे)-के समान हैं, इसीलिये इस भूतपर आपका शल्य नाम विख्यात है॥ ५७॥
यदेतद् व्याहृतं पूर्वं भवता भूरिदक्षिण।
तदेव कुरु धर्मज्ञ मदर्थं यद् यदुच्यते॥ ५८॥
‘यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले धर्मज्ञ नरेश्वर! आपने पहले यह जो कुछ कहा है और इस समय जो कुछ कह रहे हैं, उसीको मेरे लिये पूर्ण करें॥ ५८॥
न च त्वत्तो हि राधेयो न चाहमपि वीर्यवान्।
वृणेऽहं त्वां हयाग्र्याणां यन्तारमिह संयुगे॥ ५९॥
‘आपकी अपेक्षा न तो राधापुत्र कर्ण बलवान् है और न मैं ही। आप उत्तम अश्वोंके सर्वश्रेष्ठ संचालक (अश्वविद्याके सर्वोत्तम ज्ञाता) हैं, इसलिये इस युद्धस्थलमें आपका वरण कर रहा हूँ॥ ५९॥
मन्ये चाभ्यधिकं शल्य गुणैः कर्णं धनंजयात्।
भवन्तं वासुदेवाच्च लोकोऽयमिति मन्यते॥ ६०॥
‘शल्य! मैं कर्णको अर्जुनसे अधिक गुणवान् मानता हूँ और यह सारा जगत् आपको वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णसे श्रेष्ठ मानता है॥ ६०॥
कर्णो ह्यभ्यधिकः पार्थादस्त्रैरेव नरर्षभ।
भवानभ्यधिकः कृष्णादश्वज्ञाने बले तथा॥ ६१॥
‘नरश्रेष्ठ! कर्ण तो अर्जुनसे केवल अस्त्र-ज्ञानमें ही बढ़ा-चढ़ा है, परंतु आप श्रीकृष्णसे अश्वविद्या और बल दोनोंमें बड़े हैं॥ ६१॥
यथाश्वहृदयं वेद वासुदेवो महामनाः।
द्विगुणं त्वं तथा वेत्सि मद्रराजेश्वरत्मज॥ ६२॥
‘मद्रराजकुमार! महामनस्वी श्रीकृष्ण जिस प्रकार अश्वविद्याका रहस्य जानते हैं, वैसा ही, बल्कि उससे भी दूना आप जानते हैं’॥ ६२॥

शल्य उवाच
यन्मां ब्रवीषि गान्धारे मध्ये सैन्यस्य कौरव।
विशिष्टं देवकीपुत्रात् प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि॥ ६३॥
**शल्यने कहा—**कौरव! गान्धारीपुत्र! तुम सारी सेनाके बीचमें जो मुझे देवकीनन्दन श्रीकृष्णसे भी बढ़कर बता रहे हो, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ ६३॥
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः।
युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे॥ ६४॥
वीर! जैसा तुम चाहते हो उसके अनुसार मैं पाण्डव-शिरोमणि अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए यशस्वी कर्णका सारथिकर्म अब स्वीकार किये लेता हूँ॥ ६४॥

समयश्च हि मे वीर कश्चिद् वैकर्तनं प्रति ।
उत्सृजेयं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य संनिधौ ॥ ६५ ॥
परंतु वीरवर! कर्णके साथ मेरी एक शर्त रहेगी। 'मैं इसके समीप, जैसी मेरी इच्छा हो, वैसी बातें कर सकता हूँ' ॥ ६५ ॥

संजय उवाच
तथेति राजन् पुत्रस्ते सह कर्णेन भारत ।
अब्रवीन्मद्रराजस्य मतं भरतसत्तम ॥ ६६ ॥
संजयने कहा— भारत! भरतभूषण नरेश! इसपर कर्णसहित आपके पुत्रने 'बहुत अच्छा' कहकर शल्यकी शर्त स्वीकार कर ली ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसारथ्ये द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यका सारथिकर्मविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६६ १/३ श्लोक हैं)

दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकि स्तुति करना

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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकि स्तुति करना

दुर्योधन उवाच

भूय एव तु मद्रेश यत्ते वक्ष्यामि तच्छृणु ।
यथा पुरावृत्तमिदं युद्धे देवासुरे विभो ॥ १ ॥
यदुक्तवान् पितुर्मह्यं मार्कण्डेयो महानृषिः ।
तदशेषेण ब्रुवतो मम राजर्षिसत्तम ॥ २ ॥
निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा ।
**दुर्योधन बोला—**मद्रराज! मैं पुनः आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १-२ १/२ ॥

देवानामसुर्राणां च परस्परजिगीषया ॥ ३ ॥
बभूव प्रथमो राजन् संग्रामस्तारकामयः ।
राजन्! देवताओं और असुरोंमें परस्पर विजय पानेकी इच्छासे सर्वप्रथम तारकामय संग्राम हुआ था ॥

निर्जिताश्च तदा दैत्या दैवतैरिति नः श्रुतम् ॥ ४ ॥
निर्जितेषु च दैत्येषु तारकस्य सुतास्त्रयः ।
ताराक्षः कमलाक्षश्च विद्युन्माली च पार्थिव ॥ ५ ॥
तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः ।
उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन्! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे ॥ ४-५ १/२ ॥

तपसा कर्शयामासुर्देहान् स्वान् शत्रुतापन ॥ ६ ॥
दमेन तपसा चैव नियमेन समाधिना ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उन तीनोंने तपस्याके द्वारा अपने शरीरोंको सुखा दिया। वे इन्द्रिय-संयम, तप, नियम और समाधिसे संयुक्त रहने लगे ॥ ६ १/२ ॥

तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरम् ॥ ७ ॥
अवध्यत्वं च ते राजन् सर्वभूतस्य सर्वदा ।
सहिता वरयामासुः सर्वलोकपितामहम् ॥ ८ ॥
राजन्! उनपर प्रसन्न होकर वरदायक भगवान् ब्रह्मा उन्हें वर देनेको उद्यत हुए। उस समय उन तीनोंने एक साथ होकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मासे यह वर माँगा कि ‘हम सदा सम्पूर्ण भूतोंसे अवध्य हों’ ॥
तानब्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरीश्वरः ।
नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमितोऽसुराः ॥ ९ ॥
अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते ।
तब लोकनाथ भगवान् ब्रह्माने उनसे कहा—‘असुरो! सबके लिये अमरत्व सम्भव नहीं है। तुम इस तपस्यासे निवृत्त हो जाओ और दूसरा कोई वर जैसा तुम्हें रुचे माँग लो’ ॥ ९ १/२ ॥
ततस्ते सहिता राजन् सम्प्रधार्यासकृत् प्रथम् ॥ १० ॥
सर्वलोकेश्वरं वाक्यं प्रणम्येदमथाब्रुवन् ।
राजन्! तब उन सबने एक साथ बारंबार विचार करके सर्वलोकेश्वर भगवान् ब्रह्माको शीश नवाकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १० १/२ ॥
अस्मभ्यं त्वं वरं देव सम्प्रयच्छ पितामह ॥ ११ ॥
(वस्तुमिच्छाम नगरं कृत्वा कामगमं शुभम् ।
सर्वकामसमृद्धार्थमवध्यं देवदानवैः ॥
यक्षरक्षोरगगणैर्नानाजातिभिरेव च ।
न कृत्याभिर्न शस्त्रैश्च न शापैर्ब्रह्मवादिनाम् ॥
वध्येत त्रिपुरं देव प्रसन्ने त्वयि सादरम् ॥
‘पितामह! देव! हम सबको आप वर प्रदान कीजिये। हमलोग इच्छानुसार चलनेवाला नगराकार सुन्दर विमान बनाकर उसमें निवास करना चाहते हैं। हमारा वह पुर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंसे सम्पन्न तथा देवताओं और दानवोंके लिये अवध्य हो। देव! आपके सादर प्रसन्न होनेसे हमारे तीनों पुर यक्ष, राक्षस, नाग तथा नाना जातिके अन्य प्राणियोंद्वारा भी विनष्ट न हों। उन्हें न तो कृत्याएँ नष्ट कर सकें, न शस्त्र छिन्न-भिन्न कर सकें और न ब्रह्मवादियोंके शापोंद्वारा ही इनका विनाश हो’ ॥ ११ ॥

ब्रह्मोवाच
विलयः समयस्यान्ते मरणं जीवितस्य च ।
इति वित्त वधोपायं कञ्चिदेव निशाम्यत ॥)

**ब्रह्माजीने कहा—**दैत्यो! समय पूरा होनेपर सबका लय होता है। जो आज जीवित है, उसकी भी एक दिन मृत्यु होती है। इस बातको अच्छी तरह समझ लो और इन तीनों पुरोंके वधका कोई निमित्त कह सुनाओ।

दैत्या ऊचुः
वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम् ।
विचरिष्याम लोकेऽस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृताः ॥ १२ ॥
**दैत्य बोले—**भगवन्! हम तीनों पुरोंमें ही रहकर इस पृथ्वीपर एवं इस जगत्में आपके कृपा-प्रसादसे विचरेंगे ॥ १२ ॥
ततो वर्षसहस्रे तु समेष्यामः परस्परम् ।
एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येत़ानि चानघ ॥ १३ ॥
समागतानि चैतानि यो हन्याद् भगवंस्तदा ।
एकेषुणा देववरः स नो मृत्युर्भविष्यति ॥ १४ ॥
अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक-दूसरेसे मिलेंगे। भगवन्! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जायँ, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा ॥ १३-१४ ॥
एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद् दिवम् ।
ते तु लब्धवराः प्रीताः सम्प्रधार्य परस्परम् ॥ १५ ॥
पुरत्रयविसृष्ट्यर्थं मयं वव्रेर्महासुरम् ।
विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम् ॥ १६ ॥
‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) यों कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने धामको चले गये। वरदान पाकर वे तीनों असुर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर विचार करके उन्होंने दैत्य-दानव-पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा महान् असुर मयका तीन पुरोंके निर्माणके लिये वरण किया ॥ १५-१६ ॥
ततो मयः स्वतपसा चक्रे धीमान् पुराणि च ।
त्रीणि काञ्चनमेकं वै रौप्यं कार्ष्णायसं तथा ॥ १७ ॥
तब बुद्धिमान् मयासुरने अपनी तपस्याद्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उनमेंसे एक सोनेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा पुर लोहेका बना था ॥ १७ ॥
काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम् ।
आयसं चाभवद् भौमं चक्रस्थं पृथिवीपते ॥ १८ ॥
पृथिवीपते! सोनेका बना हुआ पुर स्वर्गलोकमें स्थित हुआ। चाँदीका अन्तरिक्षलोकमें और लोहेका भूलोकमें स्थित हुआ; जो आज्ञाके अनुसार सर्वत्र विचरनेवाला था ॥
एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समम् ।

गृहाट्टालकसंयुक्तं बहुप्राकारतोरणम् ॥ १९ ॥ प्रत्येक नगरकी लंबाई-चौड़ाई बराबर-बराबर सौ योजनकी थी। सबमें बड़े-बड़े महल और अट्टालिकाएँ थीं। अनेकानेक प्राकार (परकोटे) और तोरण (फाटक) सुशोभित थे ॥ १९ ॥

गृहप्रवरसम्बाधमसम्बाधमहापथम् । प्रासादैर्विविधैश्चापि द्वारैश्चैवोपशोभितम् ॥ २० ॥ बड़े-बड़े घरोंसे वह नगर भरा था। उसकी विशाल सड़कें संकीर्णतासे रहित एवं विस्तृत थीं। नाना प्रकारके प्रासाद और द्वार उन पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २० ॥

पुरेषु चाभवन् राजन् राजानो वै पृथक् पृथक् । काञ्चनं तारकाक्षस्य चित्रमासीन्महात्मनः ॥ २१ ॥ राजन्! उन तीनों पुरोंके राजा अलग-अलग थे। सुवर्णमय विचित्र पुर महामना तारकाक्षके अधिकारमें था ॥ २१ ॥

रजतं कमलाक्षस्य विद्युन्मालिन आयसम् । त्रयस्ते दैत्यराजानस्त्रींल्लोकानस्त्रतेजसा ॥ २२ ॥ आक्रम्य तस्थुरुचुश्च कश्च नाम प्रजापतिः । चाँदीका बना हुआ पुर कमलाक्षके और लोहेका विद्युन्मालीके अधिकारमें था। वे तीनों दैत्यराज अपने अस्त्रोंके तेजसे तीनों लोकोंको दबाकर रहते और कहते थे कि 'प्रजापति कौन है?' ॥ २२ १/२ ॥

तेषां दानवमुख्यानां प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ २३ ॥ कोट्यश्चाप्रतिवीराणां समाजग्मुस्तस्ततः । उन दानवशिरोमणियोंके पास लाखों, करोड़ों और अरबों अप्रतिम वीर दैत्य इधर-उधरसे आ गये थे ॥

मांसाशिनः सुदृप्ताश्च सुरैर्विप्रकृताः पुरा ॥ २४ ॥ महदैश्वर्यमिच्छन्तस्त्रिपुरं दुर्गमाश्रिताः । वे सब-के-सब मांसभक्षी और अत्यन्त अभिमानी थे। पूर्वकालमें देवताओंने उनके साथ बहुत छल-कपट किया था। अतः वे महान् ऐश्वर्यकी इच्छा रखते हुए त्रिपुर-दुर्गके आश्रयमें आये थे ॥ २४ १/२ ॥

सर्वेषां च पुनश्चैषां सर्वयोगवहो मयः ॥ २५ ॥ तमाश्रित्य हि ते सर्वे वर्तयन्तेऽकुतोभयाः । मयासुर इन सबको सब प्रकारकी अप्राप्त वस्तुएँ प्राप्त कराता था। उसका आश्रय लेकर वे सम्पूर्ण दैत्य निर्भय होकर रहते थे ॥ २५ १/२ ॥

यो हि यन्मनसा कामं दध्यौ त्रिपुरसंश्रयः ॥ २६ ॥ तस्मै कामं मयस्तं वै विदधे मायया तदा ।

उक्त तीनों पुरोंमें निवास करनेवाला जो भी असुर अपने मनसे जिस अभीष्ट भोगका चिन्तन करता था, उसके लिये मयासुर अपनी मायासे वह-वह भोग तत्काल प्रस्तुत कर देता था ।। २६ १/२ ।।
तारकाक्षसुतो वीरो हरिर्नाम महाबलः ।। २७ ।।
तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत् पितामहः ।
तारकाक्षका महाबली वीर पुत्र 'हरि' नामसे प्रसिद्ध था, उसने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे ब्रह्माजी उसपर संतुष्ट हो गये ।। २७ १/२ ।।
संतुष्टमवृणोद् देवं वापी भवतु नः पुरे ।। २८ ।।
शस्त्रैर्विनिहता यत्र क्षिप्ताः स्युर्बलवत्तराः ।
संतुष्ट हुए ब्रह्माजीसे उसने यह वर माँगा कि 'हमारे पुरोंमें एक-एक ऐसी बावड़ी हो जाय, जिसके भीतर डाल दिये जानेपर शस्त्रोंके आघातसे मरे हुए दैत्य वीर और भी प्रबल होकर जीवित हो उठें' ।। २८ १/२ ।।
स तु लब्ध्वा वरं वीरस्तारकाक्षसुतो हरिः ।। २९ ।।
ससृजे तत्र वापीं तां मृतानां जीवनीं प्रभो ।
प्रभो! वह वरदान पाकर तारकाक्षके वीर पुत्र हरिने उन पुरोंमें एक-एक बावड़ीका निर्माण किया, जो मृतकोंको जीवन प्रदान करनेवाली थी ।। २९ १/२ ।।
येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह ।। ३० ।।
मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान् ।
जो दैत्य जिस रूप और जैसे वेषमें रहता था, मरनेपर उस बावड़ीमें डालनेके पश्चात् वैसे ही रूप और वेषसे सम्पन्न होकर प्रकट हो जाता था ।। ३० १/२ ।।
तां प्राप्य ते पुनस्तांस्तु लोकान् सर्वान् बबाधिरे ।। ३१ ।।
महता तपसा सिद्धाः सुराणां भयवर्धनाः ।
न तेषामभवद् राजन् क्षयो युद्धे कदाचन ।। ३२ ।।
उस वापीमें पहुँच जानेपर नया जीवन धारण करके वे दैत्य पुनः उन सभी लोकोंको बाधा पहुँचाने लगते थे। राजन्! वे महान् तपसे सिद्ध हुए असुर देवताओंका भय बढ़ा रहे थे। युद्धमें कभी उनका विनाश नहीं होता था ।। ३१-३२ ।।
ततस्ते लोभमोहाभ्यामभिभूता विचेतसः ।
निर्ह्रीकाः संस्थिताः सर्वे स्थापिताः समलुलुपन् ।। ३३ ।।
उन पुरोंमें बसाये गये सभी दैत्य लोभ और मोहके वशीभूत हो विवेकहीन और निर्लज्ज होकर सब ओर लूटपाट करने लगे ।। ३३ ।।
विद्राव्य सगणान् देवांस्तत्र तत्र तदा तदा ।
विचेरुः स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिताः ।। ३४ ।।