महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1810, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहाट्टालकसंयुक्तं बहुप्राकारतोरणम् ॥ १९ ॥ प्रत्येक नगरकी लंबाई-चौड़ाई बराबर-बराबर सौ योजनकी थी। सबमें बड़े-बड़े महल और अट्टालिकाएँ थीं। अनेकानेक प्राकार (परकोटे) और तोरण (फाटक) सुशोभित थे ॥ १९ ॥
गृहप्रवरसम्बाधमसम्बाधमहापथम् । प्रासादैर्विविधैश्चापि द्वारैश्चैवोपशोभितम् ॥ २० ॥ बड़े-बड़े घरोंसे वह नगर भरा था। उसकी विशाल सड़कें संकीर्णतासे रहित एवं विस्तृत थीं। नाना प्रकारके प्रासाद और द्वार उन पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २० ॥
पुरेषु चाभवन् राजन् राजानो वै पृथक् पृथक् । काञ्चनं तारकाक्षस्य चित्रमासीन्महात्मनः ॥ २१ ॥ राजन्! उन तीनों पुरोंके राजा अलग-अलग थे। सुवर्णमय विचित्र पुर महामना तारकाक्षके अधिकारमें था ॥ २१ ॥
रजतं कमलाक्षस्य विद्युन्मालिन आयसम् । त्रयस्ते दैत्यराजानस्त्रींल्लोकानस्त्रतेजसा ॥ २२ ॥ आक्रम्य तस्थुरुचुश्च कश्च नाम प्रजापतिः । चाँदीका बना हुआ पुर कमलाक्षके और लोहेका विद्युन्मालीके अधिकारमें था। वे तीनों दैत्यराज अपने अस्त्रोंके तेजसे तीनों लोकोंको दबाकर रहते और कहते थे कि 'प्रजापति कौन है?' ॥ २२ १/२ ॥
तेषां दानवमुख्यानां प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥ २३ ॥ कोट्यश्चाप्रतिवीराणां समाजग्मुस्तस्ततः । उन दानवशिरोमणियोंके पास लाखों, करोड़ों और अरबों अप्रतिम वीर दैत्य इधर-उधरसे आ गये थे ॥
मांसाशिनः सुदृप्ताश्च सुरैर्विप्रकृताः पुरा ॥ २४ ॥ महदैश्वर्यमिच्छन्तस्त्रिपुरं दुर्गमाश्रिताः । वे सब-के-सब मांसभक्षी और अत्यन्त अभिमानी थे। पूर्वकालमें देवताओंने उनके साथ बहुत छल-कपट किया था। अतः वे महान् ऐश्वर्यकी इच्छा रखते हुए त्रिपुर-दुर्गके आश्रयमें आये थे ॥ २४ १/२ ॥
सर्वेषां च पुनश्चैषां सर्वयोगवहो मयः ॥ २५ ॥ तमाश्रित्य हि ते सर्वे वर्तयन्तेऽकुतोभयाः । मयासुर इन सबको सब प्रकारकी अप्राप्त वस्तुएँ प्राप्त कराता था। उसका आश्रय लेकर वे सम्पूर्ण दैत्य निर्भय होकर रहते थे ॥ २५ १/२ ॥
यो हि यन्मनसा कामं दध्यौ त्रिपुरसंश्रयः ॥ २६ ॥ तस्मै कामं मयस्तं वै विदधे मायया तदा ।