महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1811, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउक्त तीनों पुरोंमें निवास करनेवाला जो भी असुर अपने मनसे जिस अभीष्ट भोगका चिन्तन करता था, उसके लिये मयासुर अपनी मायासे वह-वह भोग तत्काल प्रस्तुत कर देता था ।। २६ १/२ ।।
तारकाक्षसुतो वीरो हरिर्नाम महाबलः ।। २७ ।।
तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत् पितामहः ।
तारकाक्षका महाबली वीर पुत्र 'हरि' नामसे प्रसिद्ध था, उसने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे ब्रह्माजी उसपर संतुष्ट हो गये ।। २७ १/२ ।।
संतुष्टमवृणोद् देवं वापी भवतु नः पुरे ।। २८ ।।
शस्त्रैर्विनिहता यत्र क्षिप्ताः स्युर्बलवत्तराः ।
संतुष्ट हुए ब्रह्माजीसे उसने यह वर माँगा कि 'हमारे पुरोंमें एक-एक ऐसी बावड़ी हो जाय, जिसके भीतर डाल दिये जानेपर शस्त्रोंके आघातसे मरे हुए दैत्य वीर और भी प्रबल होकर जीवित हो उठें' ।। २८ १/२ ।।
स तु लब्ध्वा वरं वीरस्तारकाक्षसुतो हरिः ।। २९ ।।
ससृजे तत्र वापीं तां मृतानां जीवनीं प्रभो ।
प्रभो! वह वरदान पाकर तारकाक्षके वीर पुत्र हरिने उन पुरोंमें एक-एक बावड़ीका निर्माण किया, जो मृतकोंको जीवन प्रदान करनेवाली थी ।। २९ १/२ ।।
येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह ।। ३० ।।
मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान् ।
जो दैत्य जिस रूप और जैसे वेषमें रहता था, मरनेपर उस बावड़ीमें डालनेके पश्चात् वैसे ही रूप और वेषसे सम्पन्न होकर प्रकट हो जाता था ।। ३० १/२ ।।
तां प्राप्य ते पुनस्तांस्तु लोकान् सर्वान् बबाधिरे ।। ३१ ।।
महता तपसा सिद्धाः सुराणां भयवर्धनाः ।
न तेषामभवद् राजन् क्षयो युद्धे कदाचन ।। ३२ ।।
उस वापीमें पहुँच जानेपर नया जीवन धारण करके वे दैत्य पुनः उन सभी लोकोंको बाधा पहुँचाने लगते थे। राजन्! वे महान् तपसे सिद्ध हुए असुर देवताओंका भय बढ़ा रहे थे। युद्धमें कभी उनका विनाश नहीं होता था ।। ३१-३२ ।।
ततस्ते लोभमोहाभ्यामभिभूता विचेतसः ।
निर्ह्रीकाः संस्थिताः सर्वे स्थापिताः समलुलुपन् ।। ३३ ।।
उन पुरोंमें बसाये गये सभी दैत्य लोभ और मोहके वशीभूत हो विवेकहीन और निर्लज्ज होकर सब ओर लूटपाट करने लगे ।। ३३ ।।
विद्राव्य सगणान् देवांस्तत्र तत्र तदा तदा ।
विचेरुः स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिताः ।। ३४ ।।