महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1809, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें**ब्रह्माजीने कहा—**दैत्यो! समय पूरा होनेपर सबका लय होता है। जो आज जीवित है, उसकी भी एक दिन मृत्यु होती है। इस बातको अच्छी तरह समझ लो और इन तीनों पुरोंके वधका कोई निमित्त कह सुनाओ।
दैत्या ऊचुः
वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम् ।
विचरिष्याम लोकेऽस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृताः ॥ १२ ॥
**दैत्य बोले—**भगवन्! हम तीनों पुरोंमें ही रहकर इस पृथ्वीपर एवं इस जगत्में आपके कृपा-प्रसादसे विचरेंगे ॥ १२ ॥
ततो वर्षसहस्रे तु समेष्यामः परस्परम् ।
एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येत़ानि चानघ ॥ १३ ॥
समागतानि चैतानि यो हन्याद् भगवंस्तदा ।
एकेषुणा देववरः स नो मृत्युर्भविष्यति ॥ १४ ॥
अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक-दूसरेसे मिलेंगे। भगवन्! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जायँ, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा ॥ १३-१४ ॥
एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद् दिवम् ।
ते तु लब्धवराः प्रीताः सम्प्रधार्य परस्परम् ॥ १५ ॥
पुरत्रयविसृष्ट्यर्थं मयं वव्रेर्महासुरम् ।
विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम् ॥ १६ ॥
‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) यों कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने धामको चले गये। वरदान पाकर वे तीनों असुर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर विचार करके उन्होंने दैत्य-दानव-पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा महान् असुर मयका तीन पुरोंके निर्माणके लिये वरण किया ॥ १५-१६ ॥
ततो मयः स्वतपसा चक्रे धीमान् पुराणि च ।
त्रीणि काञ्चनमेकं वै रौप्यं कार्ष्णायसं तथा ॥ १७ ॥
तब बुद्धिमान् मयासुरने अपनी तपस्याद्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उनमेंसे एक सोनेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा पुर लोहेका बना था ॥ १७ ॥
काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम् ।
आयसं चाभवद् भौमं चक्रस्थं पृथिवीपते ॥ १८ ॥
पृथिवीपते! सोनेका बना हुआ पुर स्वर्गलोकमें स्थित हुआ। चाँदीका अन्तरिक्षलोकमें और लोहेका भूलोकमें स्थित हुआ; जो आज्ञाके अनुसार सर्वत्र विचरनेवाला था ॥
एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समम् ।