महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1804, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा शल्य विजानीषे एवमेतदसंशयम् । अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ॥ ५४ ॥ ‘महाराज शल्य! आप अपने विषयमें जैसा समझते हैं ऐसी ही बात है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। मेरा कोई और ही अभिप्राय है, उसे ध्यान देकर सुनिये ॥ ५४ ॥ न कर्णोऽभ्यधिकस्त्वत्तो न शङ्के त्वां च पार्थिव । न हि मद्रेश्वरो राजा कुर्याद् यदनृतं भवेत् ॥ ५५ ॥ ‘भूपाल! न तो कर्ण आपसे श्रेष्ठ है और न आपके प्रति मैं संदेह ही करता हूँ। मद्रदेशके स्वामी राजा शल्य कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकते, जो उनकी सत्य प्रतिज्ञाके विपरीत हो ॥ ५५ ॥ ऋतमेव हि पूर्वास्ते वदन्ति पुरुषोत्तमाः । तस्मादार्तायनिः प्रोक्तो भवानिति मतिर्मम ॥ ५६ ॥ ‘आपके पूर्वज श्रेष्ठ पुरुष थे और सदा सत्य ही बोला करते थे, इसीलिये आप ‘आर्तायनि’ कहलाते हैं; मेरी ऐसी ही धारणा है ॥ ५६ ॥ शल्यभूतस्तु शत्रूणां यस्मात्त्वं युधि मानद । तस्माच्छल्यो हि ते नाम कथ्यते पृथिवीतले ॥ ५७ ॥