महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1803, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मक्षत्रस्य विहिताः सूता वै परिचारकाः । न क्षत्रियो वै सूतानां शृणुयाच्च कथञ्चन ॥ ४८ ॥ सूतजातिके लोग ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके सेवक नियुक्त किये गये हैं, क्षत्रिय सूतोंका सेवक हो, यह कोई किसी प्रकार कहीं नहीं सुन सकता ॥ ४८ ॥
अहं मूर्धाभिषिक्तो हि राजर्षिकुलजो नृपः । महारथः समाख्यातः सेव्यः स्तुत्यश्च वन्दिनाम् ॥ ४९ ॥ मैं राजर्षियोंके कुलमें उत्पन्न हुआ मूर्द्धाभिषिक्त नरेश हूँ, विश्वविख्यात महारथी हूँ, सूतोंद्वारा सेव्य और वन्दीजनोंद्वारा स्तुतिके योग्य हूँ ॥ ४९ ॥
सोऽहमेतादृशो भूत्वा नेहारिबलसूदनः । सूतपुत्रस्य संग्रामे सारथ्यं कर्तुमुत्सहे ॥ ५० ॥ ऐसा प्रतिष्ठित एवं शत्रुसेनाका संहार करनेमें समर्थ होकर मैं यहाँ युद्धस्थलमें एक सूतपुत्रके सारथिका कार्य कदापि नहीं कर सकता ॥ ५० ॥
अवमानमहं प्राप्य न योत्स्यामि कथञ्चन । आपृच्छे त्वाद्य गान्धारे गमिष्यामि गृहाय वै ॥ ५१ ॥ गान्धारीनन्दन! आज इस अपमानको पाकर अब मैं किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। अतः तुमसे आज्ञा चाहता हूँ। आज ही अपने घरको लौट जाऊँगा ॥ ५१ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा महाराज शल्यः समितिशोभनः । उत्थाय प्रययौ तूर्णं राजमध्यादमर्षितः ॥ ५२ ॥ **संजय कहते हैं—**महाराज! ऐसा कहकर युद्धमें शोभा पानेवाले शल्य अमर्षमें भर गये और राजाओंके बीचसे उठकर तुरंत चल दिये ॥ ५२ ॥
प्रणयाद् बहुमानाच्च तं निगृह्य सुतस्तव । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साम्ना सर्वार्थसाधकम् ॥ ५३ ॥ तब आपके पुत्रने बड़े प्रेम और आदरसे उन्हें रोका तथा सान्त्वनापूर्ण मधुर स्वरमें उनसे यह सर्वार्थसाधक वचन कहा— ॥ ५३ ॥