महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वरदान पानेके कारण उनका घमंड बढ़ गया था। वे विभिन्न स्थानोंमें देवताओं और उनके गणोंको भगाकर वहाँ अपनी इच्छाके अनुसार विचरते थे॥ ३४॥ देवोद्यानानि सर्वाणि प्रियाणि च दिवौकसाम्। ऋषीणामाश्रमान् पुण्यान् रम्याञ्जनपदांस्तथा ॥ ३५ ॥ व्यनाशयन्मर्यादा दानवा दुष्टचारिणः। स्वर्गवासियोंके परम प्रिय समस्त देवोद्यानों, ऋषियोंके पवित्र आश्रमों तथा रमणीय जनपदोंको भी वे मर्यादाशून्य दुराचारी दानव नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे॥ ३५ १/२॥ (निःस्थानाश्च कृता देवा ऋषयः पितृभिः सह। दैत्यैस्त्रिभिस्त्रयो लोका ह्याक्रान्तास्तैः सुरेतरैः ॥) उन देवविरोधी तीनों दैत्योंने देवताओं, पितरों और ऋषियोंको भी उनके स्थानोंसे हटाकर निराश्रय कर दिया। वे ही नहीं, तीनों लोकोंके निवासी उनके द्वारा पददलित हो रहे थे॥ पीड्यमानेषु लोकेषु ततः शक्रो मरुद्वृतः ॥ ३६ ॥ पुराण्यायोधयांचक्रे वज्रपातैः समन्ततः। जब सम्पूर्ण लोकोंके प्राणी पीड़ित होने लगे, तब देवताओंसहित इन्द्र चारों ओरसे वज्रपात करते हुए उन तीनों पुरोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ३६ १/२॥ नाशकत् तान्यभेद्यानि यदा भेत्तुं पुरंदरः ॥ ३७ ॥ पुराणि वरदत्तानि धात्रा तेन नराधिप। तदा भीतः सुरपतिर्मुक्त्वा तानि पुराण्यथ ॥ ३८ ॥ तैरेव विबुधैः सार्धं पितामहमरिंदम। जगामाथ तदाख्यातुं विप्रकारं सुरेतरैः ॥ ३९ ॥ शत्रुदमननरेश्वर! जब देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका वर पाये हुए उन अभेद्य पुरोंका भेदन न कर सके, तब वे भयभीत हो उन पुरोंको छोड़कर उन्हीं देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास उन दैत्योंका अत्याचार बतानेके लिये गये॥ ३७—३९॥ ते तत्त्वं सर्वमाख्याय शिरोभिः सम्प्रणम्य च। वधोपायमपृच्छन्त भगवन्तं पितामहम् ॥ ४० ॥ उन्होंने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम किया और सारी बातें ठीक-ठीक बताकर उनसे उन दैत्योंके वधका उपाय पूछा॥ ४०॥ श्रुत्वा तद् भगवान् देवो देवानिदमुवाच ह। ममापि सोऽपराध्नोति यो युष्माकमसौम्यकृत् ॥ ४१ ॥ वह सब सुनकर भगवान् ब्रह्माने उन देवताओंसे इस प्रकार कहा—'देवगण! जो तुम्हारी बुराई करता है, वह मेरा भी अपराधी है॥ ४१॥ असुरा हि दुरात्मानः सर्व एव सुरद्विषः।
अपराध्यन्ति सततं ये युष्मान् पीडयन्त्युत ॥ ४२ ॥ ‘वे समस्त देवद्रोही दुरात्मा असुर, जो सदा तुम्हें पीड़ा देते रहते हैं, निश्चय ही मेरा भी महान् अपराध करते हैं’॥ ४२ ॥ अहं हि तुल्यः सर्वेषां भूतानां नात्र संशयः । अधार्मिकास्तु हन्तव्या इति मे वतमाहितम् ॥ ४३ ॥ ‘इसमें संशय नहीं कि समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा समान भाव है, तथापि मैंने यह व्रत ले रखा है कि पापात्माओंका वध कर दिया जाय’॥ ४३ ॥ एकेषुणा विभेद्यानि तानि दुर्गाणि नान्यथा । न च स्थाणुमृते शक्तो भेत्तुमेकेषुणा पुरः ॥ ४४ ॥ ‘वे तीनों पुर एक ही बाणसे वेध दिये जायँ तो नष्ट हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उन तीनोंको एक साथ एक ही बाणसे वेध सके’॥ ४४ ॥ ते यूयं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् । योद्धारं वृणुतादित्याः स तान् हन्ता सुरेतरान् ॥ ४५ ॥ ‘अतः अदितिकुमारो! तुमलोग अनायास ही महान् कर्म करनेवाले, विजयशील, ईश्वर, महादेवजीका योद्धाके रूपमें वरण करो। वे ही उन दैत्योंको मार सकते हैं’॥ ४५ ॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः । ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा वृषाङ्कं शरणं ययुः ॥ ४६ ॥ उनकी यह बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता ब्रह्माजीको आगे करके महादेवजीकी शरणमें गये ॥ ४६ ॥ तपो नियममास्थाय गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम् । ऋषिभिः सह धर्मज्ञा भवं सर्वात्मना गताः ॥ ४७ ॥ तप और नियमका आश्रय ले ऋषियोंसहित धर्मज्ञ देवता सनातन ब्रह्मस्वरूप महादेवजीकी स्तुति करते हुए सम्पूर्ण हृदयसे उनकी शरणमें गये ॥ ४७ ॥ तुष्टुवुर्वाग्भिरिष्टाभिर्भयेष्वभयदं नृप । सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं सर्वमात्मना ॥ ४८ ॥ नरेश्वर! जिन्होंने आत्मस्वरूपसे सबको व्याप्त कर रखा है तथा जो भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, उन सर्वात्मा, महात्मा भगवान् शिवकी उन देवताओंने अभीष्ट वाणीद्वारा स्तुति की ॥ ४८ ॥ तपोविशेषैर्विविधैर्यौगं यो वेद चात्मनः । यः सांख्यमात्मनो वेत्ति यस्य चात्मा वशे सदा ॥ ४९ ॥ तं ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम् । अनन्यसदृशं लोके भगवन्तमकल्मषम् ॥ ५० ॥
जो नाना प्रकारकी विशेष तपस्याओंद्वारा मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंके निरोधका उपाय जानते हैं, जिन्हें अपनी ज्ञानस्वरूपताका बोध नित्य बना रहता है, जिनका अन्तःकरण सदा अपने वशमें रहता है, जगत्में जिनकी कहीं भी तुलना नहीं है, उन निष्पाप, तेजोराशि, महेश्वर भगवान् उमापतिका उन देवताओंने दर्शन किया ॥ ४९-५० ॥
एकं च भगवन्तं ते नानारूपमकल्पयन् ।
आत्मनः प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि ॥ ५१ ॥
परस्परस्य चापश्यन् सर्वे परमविस्मिताः ।
उन्होंने एक ही भगवान् शिवको अपनी भावनाके अनुसार अनेक रूपोंमें कल्पित किया। उन परमात्मामें अपने तथा दूसरोंके प्रतिबिम्ब देखे। यह सब देखकर परस्पर दृष्टिपात करके वे सब-के-सब अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ५१ ½ ॥
सर्वभूतमयं दृष्ट्वा तमजं जगतः प्रतिम् ॥ ५२ ॥
देवा ब्रह्मर्षयश्चैव शिरोभिर्धरणीं गताः ।
उन सर्वभूतमय अजन्मा जगदीश्वरको देखकर सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंने धरतीपर मस्तक टेक दिये ॥ ५२ ½ ॥
तान् स्वस्तिवादेनाभ्यर्च्य समुत्थाप्य च शङ्करः ॥ ५३ ॥
ब्रूत ब्रूतेति भगवान् स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
तब भगवान् शंकरने 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहकर उनका समादर करते हुए उनको उठाया और मुसकराते हुए कहा—'बोलो, बोलो; क्या है?' ॥ ५३ ½ ॥
त्र्यम्बकेणाभ्यनुज्ञातास्ततस्ते स्वस्थचेतसः ॥ ५४ ॥
नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रभो इत्यब्रुवन् वचः ।
भगवान् त्रिलोचनकी आज्ञा पाकर स्वस्थचित्त हुए वे देवगण इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे—'प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ५४ ½ ॥
नमो देवाधिदेवाय धन्विने वनमालिने ॥ ५५ ॥
प्रजापतिमखघ्नाय प्रजापतिभिरीड्यते ।
नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय शम्भवे ॥ ५६ ॥
'आप देवताओंके अधिदेवता, धनुर्धर और वनमालाधारी हैं। आपको नमस्कार है। आप दक्षप्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं, प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं, सबके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है, आप ही स्तुतिके योग्य हैं तथा सब लोग आपकी ही स्तुति करते हैं। आप कल्याणस्वरूप शम्भुको नमस्कार है ॥ ५५-५६ ॥
विलोहिताय रुद्राय नीलग्रीवाय शूलिने ।
अमोघाय मृगाक्षाय प्रवरायुधयोधिने ॥ ५७ ॥
'आप विशेषतः लाल वर्णके हैं, पापियोंको रुलानेवाले रुद्र हैं, नीलकण्ठ और त्रिशूलधारी हैं, आपका दर्शन अमोघ फल देनेवाला है, आपके नेत्र मृगोंके समान हैं तथा
आप श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा युद्ध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५७ ॥ अर्हाय चैव शुद्धाय क्षयाय क्रथनाय च । दुर्वारणाय शुक्राय ब्रह्मणे ब्रह्मचारिणे ॥ ५८ ॥ ईशानायाप्रमेयाय नियन्त्रे चर्मवाससे । तपोरताय पिङ्गाय व्रतिने कृत्तिवाससे ॥ ५९ ॥ ‘आप पूजनीय, शुद्ध, प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले हैं। आपको रोकना या पराजित करना सर्वथा कठिन है। आप शुक्लवर्ण, ब्रह्म, ब्रह्मचारी, ईशान, अप्रमेय, नियन्ता तथा व्याघ्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले, पिंगलवर्ण, व्रतधारी और कृत्तिवासा हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५८-५९ ॥ कुमारपित्रे त्र्यक्षाय प्रवरायुधधारिणे । प्रपन्नार्तिविनाशाय ब्रह्मद्विट्संघघातिने ॥ ६० ॥ ‘आप कुमार कार्तिकेयके पिता, त्रिनेत्रधारी, उत्तम आयुध धारण करनेवाले शरणागतदुःखभंजन तथा ब्रह्मद्रोहियोंके समुदायका विनाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ६० ॥ वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः । गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः ॥ ६१ ॥ ‘आप वनस्पतियोंके पालक और मनुष्योंके अधिपति हैं। आप ही गौओंके स्वामी और सदा यज्ञोंके अधीश्वर हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ६१ ॥ नमोऽस्तु ते ससैन्याय त्र्यम्बकायामितौजसे । मनोवाक्कर्मभिर्देव त्वां प्रपन्नान् भजस्व नः ॥ ६२ ॥ ‘सेनासहित आप अमिततेजस्वी भगवान् त्र्यम्बकको नमस्कार है। देव! हम मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपकी शरणमें आये हैं। आप हमें अपनाइये’ ॥ ६२ ॥ ततः प्रसन्नो भगवान् स्वागतेनाभिनन्द्य च । प्रोवाच व्येतु वस्त्र्रासो ब्रूत किं करवाणि वः ॥ ६३ ॥ तब भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर स्वागत-सत्कारके द्वारा देवताओंको आनन्दित करके कहा—‘देवगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये; बोलो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ?’ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुराख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुराख्यानविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६७ १/३ श्लोक हैं)
दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात क
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना
दुर्योधन उवाच
पितृदेवर्षिसंघेभ्योऽभये दत्ते महात्मना ।
सत्कृत्य शङ्करं प्राह ब्रह्मा लोकहितं वचः ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**राजन्! परमात्मा शिवने जब देवताओं, पितरों तथा ऋषियोंके समुदायको अभय दे दिया, तब ब्रह्माजीने उन भगवान् शंकरका सत्कार करके यह लोकहितकारी वचन कहा— ॥ १ ॥
तवातिसर्गाद् देवेश प्राजापत्यमिदं पदम् ।
मयाधितिष्ठता दत्तो दानवेभ्यो महान् वरः ॥ २ ॥
‘देवेश्वर! आपके आदेशसे इस प्रजापतिपदपर स्थित रहते हुए मैंने दानवोंको एक महान् वर दे दिया है ॥
तानतिक्रान्तमर्यादान् नान्यः संहर्तुमर्हति ।
त्वामृते भूतभव्येश त्वं ह्येषां प्रत्यरिर्वधे ॥ ३ ॥
‘उस वरको पाकर वे मर्यादाका उल्लंघन कर चुके हैं। भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी महेश्वर! आपके सिवा दूसरा कोई भी उनका संहार नहीं कर सकता। उनके वधके लिये आप ही प्रतिपक्षी शत्रु हो सकते हैं ॥ ३ ॥
स त्वं देव प्रपन्नानां याचतां च दिवौकसाम् ।
कुरु प्रसादं देवेश दानवाञ्जहि शङ्कर ॥ ४ ॥
‘देव! हम सब देवता आपकी शरणमें आकर याचना करते हैं। देवेश्वर शंकर! आप हमपर कृपा कीजिये और इन दानवोंको मार डालिये ॥ ४ ॥
त्वत्प्रसादाज्जगत् सर्वं सुखमैधत मानद ।
शरण्यस्त्वं हि लोकेश ते वयं शरणं गताः ॥ ५ ॥
‘मानद! आपके प्रसादसे सम्पूर्ण जगत् सुखपूर्वक उन्नति करता आया है, लोकेश्वर! आप ही आश्रयदाता हैं; इसलिये हम आपकी शरणमें आये हैं’ ॥ ५ ॥
स्थाणुरुवाच
हन्तव्याः शत्रवः सर्वे युष्माकमिति मे मतिः । न त्वेक उत्सहे हन्तुं बलस्था हि सुरद्विषः ॥ ६ ॥ भगवान् शिवने कहा—देवताओ! मेरा ऐसा विचार है कि तुम्हारे सभी शत्रुओंका वध किया जाय, परंतु मैं अकेला ही उन सबको नहीं मार सकता; क्योंकि वे देवद्रोही दैत्य बड़े बलवान् हैं ॥ ६ ॥
ते यूयं संहताः सर्वे मदीयेनार्धतेजसा । जयध्वं युधि ताञ्शत्रून् संहता हि महाबलाः ॥ ७ ॥ अतः तुम सब लोग एक साथ संघ बनाकर मेरे आधे तेजसे पुष्ट हो युद्धमें उन शत्रुओंको जीत लो; क्योंकि जो संघटित होते हैं वे महान् बलशाली हो जाते हैं ॥ ७ ॥
देवा ऊचुः अस्मत्तेजोबलं यावत् तावद्द्विगुणमाहवे । तेषामिति हि मन्यामो दृष्टतेजोबला हि ते ॥ ८ ॥ देवता बोले—प्रभो! युद्धमें हमलोगोंका जितना भी तेज और बल है, उससे दूना उन दैत्योंका है, ऐसा हम मानते हैं; क्योंकि उनके तेज और बलको हमने देख लिया है ॥ ८ ॥
स्थाणुरुवाच वध्यास्ते सर्वतः पापा ये युष्मास्वपराधिनः । मम तेजोबलार्धेन सर्वान् निघ्नत शात्रवान् ॥ ९ ॥ भगवान् शिव बोले—देवताओ! जो पापी तुम-लोगोंके अपराधी हैं, वे सब प्रकारसे वधके ही योग्य हैं। मेरे तेज और बलके आधे भागसे युक्त हो तुमलोग समस्त शत्रुओंको मार डालो ॥ ९ ॥
देवा ऊचुः बिभर्तुं भवतोऽर्धं तु न शक्ष्यामो महेश्वर । सर्वेषां नो बलार्धेन त्वमेव जहि शात्रवान् ॥ १० ॥ देवताओँने कहा—महेश्वर! हम आपका आधा बल धारण नहीं कर सकते; अतः आप ही हम सब लोगोंके आधे बलसे युक्त हो शत्रुओंका वध कीजिये ॥ १० ॥
स्थाणुरुवाच यदि शक्तिर्न वः काचिद् बिभर्तुं मामकं बलम् । अहमेतान् हनिष्यामि युष्मत्तेजोऽर्धबृंहितः ॥ ११ ॥ भगवान् शिव बोले—देवगण! यदि मेरे बलको धारण करनेमें तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है तो मैं ही तुमलोगोंके आधे तेजसे परिपुष्ट हो इन दैत्योंका वध करूँगा ॥ ११ ॥
ततस्तथेति देवेशस्तैरुक्तो राजसत्तम ।
अर्धमादाय सर्वेषां तेजसाभ्यधिकोऽभवत् ।। १२ ।। नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर देवताओंने देवेश्वर भगवान् शिवसे 'तथास्तु' कह दिया और सबके तेजका आधा भाग लेकर वे अधिक तेजस्वी हो गये ।। १२ ।। स तु देवो बलेनासीत् सर्वेभ्यो बलवत्तरः । महादेव इति ख्यातस्ततः प्रभृति शङ्करः ।। १३ ।। वे देवबलके द्वारा उन सबकी अपेक्षा अधिक बलशाली हो गये। इसलिये उसी समयसे उन भगवान् शंकरका महादेव नाम विख्यात हो गया ।। १३ ।। ततोऽब्रवीन्महादेवो धनुर्बाणधरो ह्यहम् । हनिष्यामि रथेनाजौ तान् रिपून् वो दिवौकसः ।। १४ ।। तत्पश्चात् महादेवजीने कहा—'देवताओ! मैं धनुष-बाण धारण करके रथपर बैठकर युद्धस्थलमें तुम्हारे उन शत्रुओंका वध करूँगा ।। १४ ।। ते यूयं मे रथं चैव धनुर्बाणं तथैव च । पश्यध्वं यावदद्यैतान् पातयामि महीतले ।। १५ ।। 'अतः तुमलोग मेरे लिये रथ और धनुष-बाणकी खोज करो, जिसके द्वारा आज इन दैत्योंको भूतलपर मार गिराऊँ?' ।। १५ ।।
देवा ऊचुः
मूर्तीः सर्वाः समाधाय त्रैलोक्यस्य ततस्ततः । रथं ते कल्पयिष्यामो देवेश्वर सुवर्चसम् ।। १६ ।। तथैव बुद्ध्या विहितं विश्वकर्मकृतं शुभम् । **देवता बोले—**देवेश्वर! हमलोग तीनों लोकोंके तेजकी सारी मात्राओंको एकत्र करके आपके लिये परम तेजस्वी रथका निर्माण करेंगे। विश्वकर्माका बुद्धिपूर्वक बनाया हुआ वह रथ बहुत ही सुन्दर होगा ।। १६ १/२ ।। ततो विबुधशार्दूलास्ते रथं समकल्पयन् ।। १७ ।। विष्णुं सोमं हुताशं च तस्येषुं समकल्पयन् । तदनन्तर उन देवसंघोंने रथका निर्माण किया और विष्णु, चन्द्रमा तथा अग्नि—इन तीनोंको उनका बाण बनाया ।। १७ १/२ ।। शृङ्गमग्निर्बभूवास्य भल्लः सोमो विशाम्पते ।। १८ ।। कुड्मलश्चाभवद् विष्णुस्तस्मिन्निषुवरे तदा । प्रजानाथ! उस बाणका शृंग (गाँठ) अग्नि हुए। उसका भल्ल (फल) चन्द्रमा हुए और उस श्रेष्ठ बाणके अग्रभागमें भगवान् विष्णु प्रतिष्ठित हुए ।। १८ १/२ ।। रथं वसुन्धरां देवीं विशालपुरमालिनीम् ।। १९ ।। सपर्वतवनद्वीपां चक्रुर्भूतधरां तदा ।
बड़े-बड़े नगरोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे युक्त, प्राणियोंकी आधारभूता पृथ्वीदेवीको उस समय देवताओंने रथ बनाया ।। १९१/२ ।। मन्दरः पर्वतश्चाक्षो जङ्घा तस्य महानदी ।। २० ।। दिशश्च प्रदिशश्चैव परिवारो रथस्य तु । मन्दराचल उस रथका धुरा था, महानदी गङ्गा जंघा (धुरेका आश्रय) बनी थीं, दिशाएँ और विदिशाएँ उस रथका आवरण थीं ।। २०१/२ ।। ईषा नक्षत्रवंशश्च युगः कृतयुगोऽभवत् ।। २१ ।। कूबरश्च रथस्यासीद् वासुकिर्भुजगोत्तमः । अपस्करमधिष्ठाने हिमवान् विन्ध्यपर्वतः । उदयास्तावधिष्ठाने गिरी चक्रुः सुरोत्तमाः ।। २२ ।। नक्षत्रोंका समूह ईषादण्ड हुआ और कृतयुगने जूएका रूप धारण किया। नागराज वासुकि उस रथका कूबर बन गये थे। हिमालय पर्वत अपस्कर (रथके पीछेका काठ) और विन्ध्याचलने उसके आधारकाष्ठका रूप धारण किया। उदयाचल और अस्ताचल दोनोंको उन श्रेष्ठ देवताओंने पहियोंका आधारभूत काष्ठ बनाया ।। २१-२२ ।। समुद्रमक्षमसृजन् दानवालयमुत्तमम् । सप्तर्षिमण्डलं चैव रथस्यासीत् परिष्करः ।। २३ ।। दानवोंके उत्तम निवासस्थान समुद्रको बन्धनरज्जु बनाया। सप्तर्षियोंका समुदाय रथका परिस्कर (चक्ररक्षा आदिका साधन) बन गया ।। २३ ।। गङ्गा सरस्वती सिन्धुर्धुमाकाशमेव च । उपस्करो रथस्यासन्नापः सर्वाश्च निम्नगाः ।। २४ ।। गंगा, सरस्वती और सिंधु—इन तीनों नदियोंके साथ आकाश त्रिवेणुकाष्ठयुक्त धुरेका भाग हुआ। उस रथके बन्धन आदिकी सामग्री जल तथा सम्पूर्ण नदियाँ थीं ।। २४ ।। अहोरात्रं कलाश्चैव काष्ठाश्च ऋतवस्तथा । अनुकर्षं ग्रहा दीप्ता वरूथं चापि तारकाः ।। २५ ।। दिन, रात, कला, काष्ठा और छहों ऋतुएँ उस रथका अनुकर्ष (नीचेका काष्ठ) बन गयीं। चमकते हुए ग्रह और तारे वरूथ (रथकी रक्षाके लिये आवरण) हुए ।। २५ ।। धर्मार्थकामं संयुक्तं त्रिवेणुं दारु बन्धुरम् । ओषधीर्वीरुधश्चैव घण्टाः पुष्पफलोपगाः ।। २६ ।। त्रिवेणु-तुल्य धर्म, अर्थ और काम—तीनोंको संयुक्त करके रथकी बैठक बनाया। फल और फूलोंसे युक्त ओषधियों एवं लताओंको घण्टाका रूप दिया ।। २६ ।। सूर्याचन्द्रमसौ कृत्वा चक्रे रथवरोत्तमे । पक्षौ पूर्वापरौ तत्र कृते सत्यहनी शुभे ।। २७ ।।
उस श्रेष्ठ रथमें सूर्य और चन्द्रमाको दोनों पहिये बनाकर सुन्दर रात्रि और दिनको वहाँ पूर्वपक्ष और अपरपक्षके रूपमें प्रतिष्ठित किया ।। २७ ।।
दश नागपतीनीषां धृतराष्ट्रमुखांस्तदा ।
योक्त्राणि चक्रुर्नागांश्च निःश्वसन्तो महोरगान् ।। २८ ।।
धृतराष्ट्र आदि दस नागराजोंको भी ईषादण्डमें ही स्थान दिया। फुफकारते हुए बड़े-बड़े सर्पोंको उस रथके जोत बनाये ।। २८ ।।
द्यां युगं युगचर्माणि संवर्तकबलाहकान् ।
कालपृष्ठोऽथ नहुषः कर्कोटकधनंजयौ ।। २९ ।।
इतरे चाभवन् नागा हयानां बालबन्धनाः ।
दिशश्च प्रदिशश्चैव रश्मयो रथवाजिनाम् ।। ३० ।।
द्युलोकको भी जूएमें ही स्थान दिया। प्रलयकालके मेघोंको युगचर्म बनाया। कालपृष्ठ, नहुष, कर्कोटक, धनंजय तथा दूसरे-दूसरे नाग घोड़ोंके केसर बाँधनेकी रस्सी बनाये गये। दिशाओं और विदिशाओंने रथमें जुते हुए घोड़ोंकी बागडोरका भी रूप धारण किया ।। २९-३० ।।
संध्यां धृतिं च मेधां च स्थितिं संनतिमेव च ।
ग्रहनक्षत्रताराभिश्चर्म चित्रं नभस्तलम् ।। ३१ ।।
संध्या, धृति, मेधा, स्थिति और संनतिसहित आकाशको, जो ग्रह, नक्षत्र और तारोंसे विचित्र शोभा धारण करता है, चर्म (रथका ऊपरी आवरण) बनाया ।। ३१ ।।
सुराम्बुप्रेतवित्तानां पतींल्लोकैश्वरान् हयान् ।
सिनीवालीमनुमतिं कुहूं राकां च सुव्रताम् ।। ३२ ।।
योक्त्राणि चक्रुर्वाहानां रोहकांस्तत्र कण्टकान् ।
इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर—इन चार लोकपालोंको देवताओंने उस रथके घोड़े बनाये। सिनीवाली, अनुमति, कुहू तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली राका इनकी अधिष्ठात्री देवियोंको घोड़ोंके जोतेका रूप दिया और इनके अधिकारी देवताओंको घोड़ोंकी लगामोंके काँटे बनाया ।। ३२ १/२ ।।
धर्मः सत्यं तपोऽर्थश्च विहितास्तत्र रश्मयः ।। ३३ ।।
अधिष्ठानं मनश्चासीत् परिरथ्या सरस्वती ।
नानावर्णाश्च चित्राश्च पताकाः पवनेरिताः ।। ३४ ।।
विद्युदिन्द्रधनुर्नद्धं रथं दीप्तं व्यदीपयन् ।
धर्म, सत्य, तप और अर्थ—इनको वहाँ लगाम बनाया गया। रथकी आधारभूमि मन हुआ और सरस्वती देवी रथके आगे बढ़नेका मार्ग थीं। नाना रंगोंकी विचित्र पताकाएँ पवनसे प्रेरित होकर फहरा रही थीं, जो बिजली और इन्द्रधनुषसे बँधे हुए उस देदीप्यमान रथकी शोभा बढ़ाती थीं ।। ३३-३४ १/२ ।।
वषट्कारः प्रतोदोऽभूद् गायत्री शीर्षबन्धना ।। ३५ ।। वषट्कार घोड़ोंका चाबुक हुआ और गायत्री उस रथके ऊपरी भागकी बन्धन-रज्जु बनीं ।। ३५ ।। यो यज्ञे विहितः पूर्वमीशानस्य महात्मनः । संवत्सरो धनुस्तद् वै सावित्री ज्या महास्वना ।। ३६ ।। पूर्वकालमें जो महात्मा महादेवजीके यज्ञमें निर्मित हुआ था, वह संवत्सर ही उनके लिये धनुष बना और सावित्री उस धनुषकी महान् टंकार करनेवाली प्रत्यंचा बनी ।। ३६ ।। दिव्यं च वर्म विहितं महार्हं रत्नभूषितम् । अभेद्यं विरजस्कं वै कालचक्रबहिष्कृतम् ।। ३७ ।। महादेवजीके लिये एक दिव्य कवच तैयार किया गया जो बहुमूल्य, रत्नभूषित, रजोगुणरहित (अथवा धूलरहित स्वच्छ), अभेद्य तथा कालचक्रकी पहुँचसे परे था ।। ३७ ।। ध्वजयष्टिरभून्मेरुः श्रीमान् कनकपर्वतः । पताकाश्चाभवन् मेघास्तडिद्भिः समलङ्कृताः ।। ३८ ।। रेजुरध्वर्युमध्यस्था ज्वलन्त इव पावकाः । कान्तिमान् कनकमय मेरु पर्वत रथके ध्वजका दण्ड बना था। बिजलियोंसे विभूषित बादल ही पताकाओंका काम दे रहे थे, जो यजुर्वेदी ऋत्विजोंके बीचमें स्थित हुई अग्नियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ३८ १/२ ।। क्लृप्तं तु तं रथं दृष्ट्वा विस्मिता देवताऽभवन् ।। ३९ ।। सर्वलोकस्य तेजांसि दृष्ट्वैकस्थानि मारिष । युक्तं निवेदयामासुर्देवास्तस्मै महात्मने ।। ४० ।। मान्यवर! वह रथ क्या था, सम्पूर्ण जगत्के तेजका पुंज एकत्र हो गया था। उसे निर्मित हुआ देख सम्पूर्ण देवता आश्चर्यचकित हो उठे। फिर उन्होंने महात्मा महादेवजीसे यह निवेदन किया कि रथ तैयार है ।। ३९-४० ।। एवं तस्मिन् महाराज कल्पिते रथसत्तमे । देवैर्मनुजशार्दूल द्विषतामभिमर्दने ।। ४१ ।। स्वान्यायुधानि मुख्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे । ध्वजयष्टिं वियत् कृत्वा स्थापयामास गोवृषम् ।। ४२ ।। पुरुषसिंह! महाराज! इस प्रकार देवताओंद्वारा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले उस श्रेष्ठ रथका निर्माण हो जानेपर भगवान् शंकरने उसके ऊपर अपने मुख्य-मुख्य अस्त्र-शस्त्र रख दिये और ध्वजदण्डको आकाशव्यापी बनाकर उसके ऊपर अपने वृषभ नन्दीको स्थापित कर दिया ।। ४१-४२ ।। ब्रह्मदण्डः कालदण्डो रुद्रदण्डस्तथा ज्वरः । परिस्कन्दा रथस्यासन् सर्वतोदिशमुद्यताः ।। ४३ ।।
तत्पश्चात् ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड तथा ज्वर—ये उस रथके पार्श्वरक्षक बनकर चारों ओर शस्त्र लेकर खड़े हो गये ॥ ४३ ॥ अथर्वाङ्गिरसावास्तां चक्ररक्षौ महात्मनः । ऋग्वेदः सामवेदश्च पुराणं च पुरःसराः ॥ ४४ ॥ अथर्वा और अंगिरा महात्मा शिवके उस रथके पहियोंकी रक्षा करने लगे। ऋग्वेद, सामवेद और समस्त पुराण उस रथके आगे चलनेवाले योद्धा हुए ॥ ४४ ॥ इतिहासयजुर्वेदौ पृष्ठरक्षौ बभूवतुः । दिव्या वाचश्च विद्याश्च परिपार्श्वचराः स्थिताः ॥ ४५ ॥ इतिहास और यजुर्वेद पृष्ठरक्षक हो गये तथा दिव्य वाणी और विद्याएँ पार्श्ववर्ती बनकर खड़ी हो गयीं ॥ ४५ ॥ स्तोत्रादयश्च राजेन्द्र वषट्कारस्तथैव च । ओंकारश्च मुखे राजन्नतिशोभाकरोऽभवत् ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! स्तोत्र-कवच आदि, वषट्कार तथा ओंकार—ये मुखभागमें स्थित होकर अत्यन्त शोभा बढ़ाने लगे ॥ ४६ ॥ विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः । छायामेवात्मनश्चक्रे धनुर्ज्यामक्षयां रणे ॥ ४७ ॥ छहों ऋतुओंसे युक्त संवत्सरको विचित्र धनुष बनाकर अपनी छायाको ही महादेवजीने उस धनुषकी प्रत्यंचा बनायी, जो रणभूमिमें कभी नष्ट होनेवाली नहीं थी ॥ ४७ ॥ कालो हि भगवान् रुद्रस्तस्य संवत्सरो धनुः । तस्माद् रौद्री कालरात्रिर्ज्या कृता धनुषोऽजरा ॥ ४८ ॥ भगवान् रुद्र ही काल हैं, अतः कालका अवयवभूत संवत्सर ही उनका धनुष हुआ। कालरात्रि भी रुद्रका ही अंश है, अतः उसीको उन्होंने अपने धनुषकी अटूट प्रत्यंचा बना लिया ॥ ४८ ॥ इषुश्चाप्यभवद् विष्णुर्ज्वलनः सोम एव च । अग्नीषोमौ जगत् कृत्स्नं वैष्णवं चोच्यते जगत् ॥ ४९ ॥ भगवान् विष्णु, अग्नि और चन्द्रमा—ये ही बाण हुए थे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोमका ही स्वरूप है। साथ ही सारा संसार वैष्णव (विष्णुमय) भी कहा जाता है ॥ ४९ ॥ विष्णुश्चात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः । तस्माद् धनुर्ज्यासंस्पर्शं न विषेहुर्हरस्य ते ॥ ५० ॥ अमिततेजस्वी भगवान् शंकरके आत्मा हैं विष्णु। अतः वे दैत्य भगवान् शिवके धनुषकी प्रत्यंचा एवं बाणका स्पर्श न सह सके ॥ ५० ॥ तस्मिन् शरे तिग्ममन्युं मुमोचासह्यमीश्वरः ।
भृग्वङ्गिरोमन्युभवं क्रोधाग्निमतिदुःसहम् ॥ ५१ ॥ महेश्वरने उस बाणमें अपने असह्य एवं प्रचण्ड कोपको तथा भृगु और अंगिराके रोषसे उत्पन्न हुई अत्यन्त दुःसह क्रोधाग्निको भी स्थापित कर दिया ॥ ५१ ॥
स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासाभयंकरः । आदित्यायुतसंकाशस्तेजोज्वालावृतो ज्वलन् ॥ ५२ ॥ तत्पश्चात् धूम्रवर्ण, व्याघ्रचर्मधारी, देवताओंको अभय तथा दैत्योंको भय देनेवाले, सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी नीललोहित भगवान् शिव तेजोमयी ज्वालासे आवृत हो प्रकाशित होने लगे ॥ ५२ ॥
दुश्च्यावच्यावनो जेता हन्ता ब्रह्मद्विषां हरः । नित्यं त्राता च हन्ता च धर्माधर्माश्रितान् नरान् ॥ ५३ ॥ जिस लक्ष्यको मार गिराना अत्यन्त कठिन है, उसको भी गिरानेमें समर्थ, विजयशील, ब्रह्मद्रोहियोंके विनाशक भगवान् शिव धर्मका आश्रय लेनेवाले मनुष्योंकी सदा रक्षा और पापियोंका विनाश करनेवाले हैं ॥ ५३ ॥
प्रमाथिभिर्भीमबलैर्भीमरूपैर्मनोजवैः । विभाति भगवान् स्थाणुस्तैरेवात्मगुणैर्वृतः ॥ ५४ ॥ उनके जो अपने उपयोगमें आनेवाले रथ आदि गुणवान् उपकरण थे, वे शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, भयानक बलशाली, भयंकररूपधारी और मनके समान वेगवान् थे। उनसे घिरे हुए भगवान् शिवकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥
तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत् । जङ्गमाजङ्गमं राजन् शुशुभेऽद्भुतदर्शनम् ॥ ५५ ॥ राजन्! उनके पंचभूतस्वरूप अंगोंका आश्रय लेकर ही यह अद्भुत दिखायी देनेवाला सारा चराचर जगत् स्थित एवं सुशोभित है ॥ ५५ ॥
दृष्ट्वा तु तं रथं युक्तं कवची स शरासनी । बाणमादाय तं दिव्यं सोमविष्ण्वग्निसम्भवम् ॥ ५६ ॥ उस रथको जुता हुआ देख भगवान् शंकर कवच और धनुषसे युक्त हो चन्द्रमा, विष्णु और अग्निसे प्रकट हुए उस दिव्य बाणको लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए ॥ ५६ ॥
तस्य राजंस्तदा देवाः कल्पयाञ्चक्रिरे प्रभो । पुण्यगन्धवहं राजन् श्वसनं देवसत्तमम् ॥ ५७ ॥ राजन्! प्रभो! उस समय देवताओंने पवित्र सुगन्ध वहन करनेवाले देवश्रेष्ठ वायुको उनके लिये हवा करनेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५७ ॥
तमास्थाय महादेवस्त्रासयन् दैवतान्यपि । आरुरोह तदा यत्तः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ५८ ॥
तब महादेवजी दानवोंके वधके लिये प्रयत्नशील हो देवताओंको भी डराते और पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से उस रथको थामकर उसपर चढ़ने लगे ॥ ५८ ॥ तमारुरुक्षुं देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः । गन्धर्वा दैवसङ्घाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५९ ॥ देवेश्वर शिव रथपर चढ़ना चाहते हैं, यह देखकर महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने उनकी स्तुति की ॥ ५९ ॥ ब्रह्मर्षिभिः स्तूयमानो वन्द्यमानश्च वन्दिभिः । तथैवाप्सरसां वृन्दैर्नृत्यद्भिर्नृत्यकोविदैः ॥ ६० ॥ स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी । हसन्निवाब्रवीद् देवान् सारथिः को भविष्यति ॥ ६१ ॥ ब्रह्मर्षियोंद्वारा प्रशंसित, वन्दीजनोंद्वारा वन्दित तथा नाचती हुई नृत्य-कुशल अप्सराओंसे सुशोभित होते हुए वरदायक भगवान् शिव खड्ग, बाण और धनुष ले देवताओंसे हँसते हुए-से बोले—‘मेरा सारथि कौन होगा?’ ॥ ६०-६१ ॥ तमब्रुवन् देवगणा यं भवान् संनियोक्ष्यते । स भविष्यति देवेश सारथिस्ते न संशयः ॥ ६२ ॥ यह सुनकर देवताओंने उनसे कहा—‘देवेश! आप जिसको इस कार्यमें नियुक्त करेंगे, वही आपका सारथि होगा, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ६२ ॥ तानब्रवीत् पुनर्देवो मत्तः श्रेष्ठतरो हि यः । तं सारथिं कुरुध्वं मे स्वयं संचिन्त्य मा चिरम् ॥ ६३ ॥ तब महादेवजीने फिर कहा—‘तुमलोग स्वयं ही सोच-विचारकर जो मुझसे भी श्रेष्ठतर हो, उसे मेरा सारथि बना दो, विलम्ब न करो’ ॥ ६३ ॥ एतच्छ्रुत्वा ततो देवा वाक्यमुक्तं महात्मना । गत्वा पितामहं देवाः प्रसाद्येदं वचोऽब्रुवन् ॥ ६४ ॥ उन महात्माके कहे हुए इस वचनको सुनकर सब देवता ब्रह्माजीके पास गये और उन्हें प्रसन्न करके इस प्रकार बोले— ॥ ६४ ॥ यथा त्वत्कथितं देव त्रिदशारिविनिग्रहे । तथा च कृतमस्माभिः प्रसन्नो नो वृषध्वजः ॥ ६५ ॥ ‘देव! देवशत्रुओंका दमन करनेके विषयमें आपने जैसा कहा था, वैसा ही हमने किया है। भगवान् शंकर हमलोगोंपर प्रसन्न हैं’ ॥ ६५ ॥ रथश्च विहितोऽस्माभिर्विचित्रायुधसंवृतः । सारथिं च न जानीमः कः स्यात् तस्मिन् रथोत्तमे ॥ ६६ ॥ ‘हमने उनके लिये विचित्र आयुधोंसे सम्पन्न रथ तैयार कर दिया है; परंतु उस उत्तम रथपर कौन सारथि होकर बैठेगा? यह हम नहीं जानते हैं’ ॥ ६६ ॥
तस्माद् विधीयतां कश्चित् सारथिर्देवसत्तम ।
सफलां तां गिरं देव कर्तुमर्हसि नो विभो ॥ ६७ ॥
‘अतः देवश्रेष्ठ प्रभो! आप किसीको सारथि बनाइये। देव! आपने हमें जो वचन दिया है, उसे सफल कीजिये ॥
एवमस्मासु हि पुरा भगवन्नुक्तवानसि ।
हितकर्तास्मि भवतामिति तत् कर्तुमर्हसि ॥ ६८ ॥
‘भगवन्! आपने पहले हमलोगोंसे कहा था कि ‘मैं तुमलोगोंका हित करूँगा।’ अतः उसे पूर्ण कीजिये ॥
स देव युक्तो रथसत्तमो नो
दुराधरो द्रावणः शात्रवाणाम् ।
पिनाकपाणिर्विहितोऽत्र योद्धा
विभीषयन् दानवानुद्यतोऽसौ ॥ ६९ ॥
‘देव! हमारा तैयार किया हुआ वह श्रेष्ठ रथ शत्रुओंको मार भगानेवाला और दुर्धर्ष है। पिनाकपाणि भगवान् शंकरको उसपर योद्धा बनाकर बैठा दिया गया है और वे दानवोंको भयभीत करते हुए युद्धके लिये उद्यत हैं ॥ ६९ ॥
तथैव वेदाश्चतुरो हयाग्र्या
धरा सशैला च रथो महात्मनः ।
नक्षत्रवंशानुगतो वरूथी
हरो योद्धा सारथिर्नाभिलक्ष्यः ॥ ७० ॥
‘इसी प्रकार चारों वेद उन महात्माके उत्तम घोड़े हैं और पर्वतोंसहित पृथ्वी उनका उत्तम रथ बनी हुई है। नक्षत्रसमुदायरूपी ध्वजसे युक्त तथा आवरणसे सुशोभित भगवान् शिव उस रथपर रथी योद्धा बनकर बैठे हुए हैं; परंतु कोई सारथि नहीं दिखायी देता ॥ ७० ॥
तत्र सारथिरेष्टव्यः सर्वैरेतैर्विशेषवान् ।
तत्प्रतिष्ठो रथो देव हया योद्धा तथैव च ॥ ७१ ॥
‘देव! उस रथके लिये ऐसे सारथिका अनुसंधान करना चाहिये जो इन सबसे बढ़कर हो; क्योंकि रथ, घोड़े और योद्धा इन सबकी प्रतिष्ठा सारथिपर ही निर्भर है ॥ ७१ ॥
कवचानि सशस्त्राणि कार्मुकं च पितामह ।
त्वामृते सारथिं तत्र नान्यं पश्यामहे वयम् ॥ ७२ ॥
त्वं हि सर्वगुणैर्युक्तो दैवतेभ्योऽधिकः प्रभो ।
‘पितामह! कवच, शस्त्र और धनुषकी सफलता भी सारथिपर ही निर्भर है। हमलोग आपके सिवा दूसरे किसीको वहाँ सारथि होनेके योग्य नहीं देखते हैं। प्रभो! क्योंकि आप सभी देवताओंसे श्रेष्ठ और सर्वगुणसम्पन्न हैं ॥ ७२ ३/२ ॥
(त्वं देव शक्तो लोकेऽस्मिन् नियन्तुं प्रद्रुतानिमान् । वेदाश्वांस् चोपनिषदः सारथिर्भव नः स्वयम् ॥ ‘देव! आप ही इस जगत्में इन भागते हुए उपनिषत्सहित वेदरूपी अश्वोंको नियन्त्रणमें रख सकते हैं; अतः आप स्वयं ही सारथि हो जाइये। योद्धुं बलेन सत्त्वेन वीर्येण विनयेन च । अधिकः सारथिः कार्यो नास्ति चान्दोऽधिको भवात् ॥ ‘बल, धैर्य, पराक्रम और विनय इन सभी गुणोंद्वारा जो रथीसे भी श्रेष्ठ हो, उसे ही युद्धके लिये सारथि बनाना चाहिये; दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो भगवान् शंकरसे भी बढ़कर हो। स भवांस्तारयत्वस्मान् कुरु सारथ्यमव्ययम् । भवानभ्यधिकस्त्वत्तो नान्योऽस्तीह पितामह ॥ ‘पितामह! आप अक्षय सारथिकर्म कीजिये और हमें इस संकटसे उबारिये। आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं; आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। त्वं हि देवेश सर्वैस्तु विशिष्टो वदतां वर ।) स रथं तूर्णमारुह्य संयच्छ परमान् हयान् ॥ ७३ ॥ जयाय त्रिदिवेशानां वधाय त्रिदशद्विषाम् । ‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! आप सभी गुणोंसे श्रेष्ठ हैं; इसलिये देवद्रोहियोंके वध और देवताओंकी विजयके लिये तुरंत रथपर आरूढ़ होकर इन उत्तम घोड़ोंको काबूमें रखिये ।। ७३ ।। (तव प्रसादाद् वध्येरन् देव दैवतकण्टकाः । स नो रक्ष महाबाहो दैत्येभ्यो महतो भयात् ।। ‘देव! आपके प्रसादसे देवताओंके लिये यह कण्टकरूप दैत्य मारे जायँगे। महाबाहो! आप दैत्योंके महान् भयसे हमारी रक्षा करें। त्वं हि नो गतिरव्यग्र त्वं नो गोप्ता महाव्रत । त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे पूज्यन्ते त्रिदिवे प्रभो ॥) ‘व्यग्रताशून्य महान् व्रतधारी प्रभो! आप ही हमारे आश्रय तथा संरक्षक हैं; आपकी कृपासे ही समस्त देवता स्वर्गलोकमें पूजित होते हैं’। इति ते शिरसा गत्वा त्रिलोकेशं पितामहम् ।। ७४ ।। देवाः प्रसादयामासुः सारथ्यायेति नः श्रुतम् । इस प्रकार देवताओंने तीनों लोकोंके ईश्वर पितामह ब्रह्माजीके आगे मस्तक टेककर उन्हें सारथि बननेके लिये प्रसन्न किया। यह बात हमारे सुननेमें आयी है ।। ७४ १/२ ।।
पितामह उवाच
नात्र किंचिन्मृषा वाक्यं यदुक्तं त्रिदिवौकसः ।। ७५ ।।
संयच्छामि हयानेष युध्यतो वै कपर्दिनः ।
**पितामह बोले—**देवताओ! तुमने जो कुछ कहा है, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। मैं युद्ध करते समय भगवान् शंकरके घोड़ोंको काबूमें रखूँगा ।। ७५½ ।।
ततः स भगवान् देवो लोकस्रष्टा पितामहः ।। ७६ ।।
(एवमुक्त्वा जटाभारं संयम्य प्रपितामहः ।
परिधायाजिनं गाढं संन्यस्य च कमण्डलुम् ।।
प्रतोदपाणिर्भगवानारुरोह रथ तदा ।)
तदनन्तर लोकस्रष्टा भगवान् पितामह देवने जो जगत्के प्रपितामह हैं, उपर्युक्त बात कहकर अपनी जटाओंके बोझको बाँध लिया और मृगचर्मके वस्त्रको अच्छी तरह कसकर कमण्डलुको अलग रख दिया। तत्पश्चात् वे भगवान् ब्रह्मा हाथमें चाबुक लेकर तत्काल उस रथपर जा चढ़े ।। ७६ ।।
सारथ्ये कल्पितो देवैरीशानस्य महात्मनः ।
तस्मिन्नारोहति क्षिप्रं स्यन्दने लोकपूजिते ।। ७७ ।।
शिरोभिरगमन् भूमिं ते हया वातरंहसः ।
इस प्रकार देवताओंने भगवान् शंकरके सारथिके पदपर उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया। जब उस लोकपूजित रथपर ब्रह्माजी चढ़ रहे थे, उस समय वायुके समान वेगशाली घोड़े धरतीपर माथा टेककर बैठ गये थे ।। ७७½ ।।
आरुह्य भगवान् देवो दीप्यमानः स्वतेजसा ।। ७८ ।।
अभीषून् हि प्रतोदं च संजग्राह पितामहः ।
अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् ब्रह्माने रथारूढ़ होकर घोड़ोंकी बागडोर और चाबुक दोनों वस्तुएँ अपने हाथमें ले लीं ।। ७८½ ।।
तत उत्थाप्य भगवांस्तान् हयाननिलोपमान् ।। ७९ ।।
बभाषे च तदा स्थाणुमारोहेति सुरोत्तमः ।
तत्पश्चात् वायुके समान तीव्रगतिवाले उन घोड़ोंको उठाकर सुरश्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने महादेवजीसे कहा—'अब आप रथपर आरूढ़ होइये' ।। ७९½ ।।
ततस्तमिषुमादाय विष्णुसोमाग्निसम्भवम् ।। ८० ।।
आरुरोह तदा स्थाणुर्धनुषा कम्पयन् परान् ।
तब विष्णु, चन्द्रमा और अग्निसे उत्पन्न हुए उस बाणको हाथमें लेकर महादेवजी अपने धनुषके द्वारा शत्रुओंको कम्पित करते हुए उस रथपर चढ़ गये ।। ८०½ ।।
तमारूढं तु देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः ।। ८१ ।।
गन्धर्वा देवसंघाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ।
रथपर आरूढ़ हुए देवेश्वर शिवकी महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने स्तुति की॥ ८१ ½ ॥ स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी ॥ ८२ ॥ प्रदीपयन् रथे तस्थौ त्रीँल्लोकान् स्वेन तेजसा। खड्ग, धनुष और बाण लेकर शोभा पाते हुए वरदायक महादेवजी अपने तेजसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करते हुए रथपर स्थित हो गये॥ ८२ ½ ॥ ततो भूयोऽब्रवीद् देवो देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ८३ ॥ न हन्यादिति कर्तव्यो न शोको वः कथञ्चन। हतानित्येव जानीत बाणेनानेन चासुरान् ॥ ८४ ॥ तब महादेवजीने पुनः इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—'शायद ये दैत्योंको न मारें' ऐसा समझकर तुम्हें किसी प्रकार भी शोक नहीं करना चाहिये। तुमलोग असुरोंको इस बाणसे 'मरा हुआ' ही समझो'॥ ८३-८४॥ ते देवाः सत्यमित्याहुर्निहता इति चाब्रुवन्। न च तद् वचनं मिथ्या यदाह भगवान् प्रभुः ॥ ८५ ॥ इति संचिन्त्य वै देवाः परां तुष्टिमवाप्नुवन्। यह सुनकर उन देवताओंने कहा—'प्रभो! आपका कथन सत्य है। अवश्य ही वे दैत्य मारे गये। शक्तिशाली भगवान् जो कुछ कह रहे हैं, वह वचन मिथ्या नहीं हो सकता' यह सोचकर देवताओंको बड़ा संतोष हुआ॥ ८५ ½ ॥ ततः प्रयातो देवेशः सर्वैर्देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥ रथेन महता राजन्नुपमा नास्ति यस्य ह। राजन्! तदनन्तर जिसकी कहीं उपमा नहीं थी, उस विशाल रथके द्वारा देवेश्वर महादेवजी समस्त देवताओंसे घिरे हुए वहाँसे चल दिये॥ ८६ ½ ॥ स्वैश्च पारिषदैर्देवः पूज्यमानो महायशाः ॥ ८७ ॥ नृत्यद्भिरपरैश्चैव मांसभक्षैर्दुरासदैः। धावमानैः समन्ताच्च तर्जमानैः परस्परम् ॥ ८८ ॥ उस समय उनके अपने पार्षद भी महायशस्वी महादेवजीकी पूजा कर रहे थे। शिवके वे दुर्धर्ष पार्षद नृत्य करते और परस्पर एक-दूसरेको डाँटते हुए चारों ओर दौड़ लगाते थे। अन्य कितने ही पार्षद (भूत-प्रेतादि) मांसभक्षी थे॥ ८७-८८॥ ऋषयश्च महाभागास्तपोयुक्ता महागुणाः। आशंसुर्वे जना देवा महादेवस्य सर्वशः ॥ ८९ ॥ महान् भाग्यशाली और उत्तम गुणसम्पन्न तपस्वी ऋषियों, देवताओं तथा अन्य लोगोंने भी सब प्रकारसे महादेवजीकी विजयके लिये शुभाशंसा की॥ ८९॥ एवं प्रयाते देवेशे लोकानामभयंकरे।
तुष्टमासीज्जगत् सर्वं देवताश्च नरोत्तम ॥ ९० ॥ नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंको अभय देनेवाले देवेश्वर महादेवजीके इस प्रकार प्रस्थान करनेपर सारा जगत् संतुष्ट हो गया। देवता भी बड़े प्रसन्न हुए ॥ ९० ॥ ऋषयस्तत्र देवेशं स्तुवन्तो बहुभिः स्तवैः । तेजश्चास्मै वर्धयन्तो राजन्नासन् पुनः पुनः ॥ ९१ ॥ राजन्! ऋषिगण नाना प्रकारके स्तोत्रोंका पाठ करके देवेश्वर महादेवकी स्तुति करते हुए बारंबार उनका तेज बढ़ा रहे थे ॥ ९१ ॥ गन्धर्वाणां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । वादयन्ति प्रयाणेऽस्य वाद्यानि विविधानि च ॥ ९२ ॥ उनके प्रस्थानके समय सहस्रों, लाखों और अरबों गन्धर्व नाना प्रकारके बाजे बजा रहे थे ॥ ९२ ॥ ततोऽधिरूढे वरदे प्रयाते चासुरान् प्रति । साधु साध्विति विश्वेशः स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ९३ ॥ रथपर आरूढ़ हो वरदायक भगवान् शंकर जब असुरोंकी ओर चले, तब वे विश्वनाथ ब्रह्माजीको साधुवाद देते हुए मुसकराकर बोले— ॥ ९३ ॥ याहि देव यतो दैत्याश्चोदयाश्वानतन्द्रितः । पश्य बाह्वोर्बलं मेऽद्य निघ्नतः शात्रवान् रणे ॥ ९४ ॥ 'देव! जिस ओर दैत्य हैं, उधर ही चलिये और सावधान होकर घोड़ोंको हाँकिये। आज रणभूमिमें जब मैं शत्रुसेनाका संहार करने लगूँ, उस समय आप मेरी इन दोनों भुजाओंका बल देखियेगा' ॥ ९४ ॥ ततोऽश्वांश्चोदयामास मनोमारुतरंहसः । येन तत् त्रिपुरं राजन् दैत्यदानवरक्षितम् ॥ ९५ ॥ राजन्! तब ब्रह्माजीने मन और पवनके समान वेगशाली घोड़ोंको उसी ओर बढ़ाया, जिस ओर दैत्यों और दानवोंद्वारा सुरक्षित वे तीनों पुर थे ॥ ९५ ॥ पिबद्भिरिव चाकाशं तैर्हयैर्लोकपूजितैः । जगाम भगवान् क्षिप्रं जयाय त्रिदिवौकसाम् ॥ ९६ ॥ वे लोकपूजित अश्व ऐसे तीव्र वेगसे चल रहे थे, मानो सारे आकाशको पी जायँगे। उस समय भगवान् शिव उन अश्वोंके द्वारा देवताओंकी विजयके लिये बड़ी शीघ्रताके साथ जा रहे थे ॥ ९६ ॥ प्रयाते रथमास्थाय त्रिपुराभिमुखे भवे । ननाद सुमहानादं वृषभः पूरयन् दिशः ॥ ९७ ॥ रथपर आरूढ़ हो जब महादेवजी त्रिपुरकी ओर प्रस्थित हुए, उस समय नन्दी वृषभने सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ९७ ॥
वृषभस्यास्य निनदं श्रुत्वा भयकरं महत् ।
विनाशमगमंस्तत्र तारकाः सुरशत्रवः ॥ ९८ ॥
उस वृषभका वह अत्यन्त भयंकर सिंहनाद सुनकर बहुत-से देवशत्रु तारक नामवाले दैत्यगण वहीं विनष्ट हो गये ॥ ९८ ॥
अपरेऽवस्थितास्तत्र युद्धायाभिमुखास्तदा ।
ततः स्थाणुर्महाराज शूलधृक् क्रोधमूर्च्छितः ॥ ९९ ॥
दूसरे जो दैत्य वहाँ खड़े थे, वे युद्धके लिये महादेवजीके सामने आये। महाराज! तब त्रिशूलधारी महादेवजी क्रोधसे आतुर हो उठे ॥ ९९ ॥
त्रस्तानि सर्वभूतानि त्रैलोक्यं भूः प्रकम्पते ।
निमित्तानि च घोराणि तत्र संदधतः शरम् ॥ १०० ॥
तस्मिन् सोमाग्निविष्णूनां क्षोभेण ब्रह्मरुद्रयोः ।
स रथो धनुषः क्षोभादतीव ह्यवसीदति ॥ १०१ ॥
फिर तो समस्त प्राणी भयभीत हो उठे। सारी त्रिलोकी और भूमि काँपने लगी। जब वे वहाँ धनुषपर बाणका संधान करने लगे, तब उसमें चन्द्रमा, अग्नि, विष्णु, ब्रह्मा और रुद्रके क्षोभसे बड़े भयंकर निमित्त प्रकट हुए। धनुषके क्षोभसे वह रथ अत्यन्त शिथिल होने लगा ॥ १००-१०१ ॥
ततो नारायणस्तस्माच्छरभागाद् विनिःसृतः ।
वृषरूपं समास्थाय उज्जहार महारथम् ॥ १०२ ॥
तब भगवान् नारायणने उस बाणके एक भागसे बाहर निकलकर वृषभका रूप धारण करके भगवान् शिवके विशाल रथको ऊपर उठाया ॥ १०२ ॥
सीदमाने रथे चैव नर्दमानेषु शत्रुपु ।
स सम्भ्रमात् तु भगवान् नादं चक्रे महाबलः ॥ १०३ ॥
जब रथ शिथिल होने लगा और शत्रु गर्जना करने लगे, तब महाबली भगवान् शिवने बड़े वेगसे घोर गर्जना की ॥ १०३ ॥
वृषभस्य स्थितो मूर्ध्नि हयपृष्ठे च मानद ।
तदा स भगवान् रुद्रो निरैक्षद् दानवं पुरम् ॥ १०४ ॥
वृषभस्यास्थितो रुद्रो हयस्य च नरोत्तम ।
स्तनांस्तदाऽशातयत खुरांश्चैव द्विधाकरोत् ॥ १०५ ॥
मानद! उस समय वे वृषभके मस्तक और घोड़ेकी पीठपर खड़े थे। नरोत्तम! भगवान् रुद्रने वृषभ तथा घोड़ेकी भी पीठपर सवार हो उस दानव-नगरको देखा। तब उन्होंने वृषभके खुरोंको चीरकर उन्हें दो भागोंमें बाँट दिया और घोड़ोंके स्तन काट डाले ॥ १०४-१०५ ॥
ततःप्रभृति भद्रं ते गवां द्वैधीकृताः खुराः ।
हयानां च स्तना राजंस्तदाप्रभृति नाभवन् ।। १०६ ।। पीडितानां बलवता रुद्रेणाद्भुतकर्मणा । राजन्! आपका कल्याण हो। तभीसे बैलोंके दो खुर हो गये और तभीसे अद्भुत कर्म करनेवाले बलवान् रुद्रके द्वारा पीड़ित हुए घोड़ोंके स्तन नहीं उगे ।। १०६ १/२ ।। अथाधिज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम् ।। १०७ ।। युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत् । तदनन्तर भगवान् रुद्रने धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसके ऊपर पूर्वोक्त बाणको रखा और उसे पाशुपतास्त्रसे संयुक्त करके तीनों पुरोंके एकत्र होनेका चिन्तन किया ।। १०७ १/२ ।। तस्मिन् स्थिते महाराज रुद्रे विधृतकार्मुके ।। १०८ ।। पुराणि तानि कालेन जग्मुरेवैकतां तदा । महाराज! इस प्रकार जब रुद्रदेव धनुष चढ़ाकर खड़े हो गये, उसी समय कालकी प्रेरणासे वे तीनों पुर मिलकर एक हो गये ।। १०८ १/२ ।। एकीभावं गते चैव त्रिपुरत्वमुपागते ।। १०९ ।। बभूव तुमुलॊ हर्षो देवतानां महात्मनाम् । जब तीनों एक होकर त्रिपुर-भावको प्राप्त हुए, तब महामनस्वी देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ ।। १०९ १/२ ।। ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।। ११० ।। जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तो महेश्वरम् । उस समय समस्त देवता, महर्षि और सिद्धगण महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनकी जय-जयकार करने लगे ।। ११० १/२ ।। ततोऽग्रतः प्रादुरभूत् त्रिपुरं निघ्नतोऽसुरान् ।। १११ ।। अनिर्देश्योग्रवपुषो देवस्यासह्यतेजसः । तब असुरोंका संहार करते हुए अवर्णनीय भयंकर रूपवाले असह्य तेजस्वी महादेवजीके सामने वह तीनों पुरोंका समुदाय सहसा प्रकट हो गया ।। १११ १/२ ।। स तद् विकृष्य भगवान् दिव्यं लोकेश्वरो धनुः ।। ११२ ।। त्रैलोक्यसारं तमिषुं मुमोच त्रिपुरं प्रति । फिर तो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् रुद्रने अपने उस दिव्य धनुषको खींचकर उसपर रखे हुए त्रिलोकीके सारभूत उस बाणको त्रिपुरपर छोड़ दिया ।। ११२ १/२ ।। उत्सृष्टे वै महाभाग तस्मिन्निषुवरे तदा ।। ११३ ।। महानार्तस्वरो ह्यासीत् पुराणां पततां भुवि । तान् सोऽसुरगणान् दग्ध्वा प्राक्षिपत् पश्चिमार्णवे ।। ११४ ।।