महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1818, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्धमादाय सर्वेषां तेजसाभ्यधिकोऽभवत् ।। १२ ।। नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर देवताओंने देवेश्वर भगवान् शिवसे 'तथास्तु' कह दिया और सबके तेजका आधा भाग लेकर वे अधिक तेजस्वी हो गये ।। १२ ।। स तु देवो बलेनासीत् सर्वेभ्यो बलवत्तरः । महादेव इति ख्यातस्ततः प्रभृति शङ्करः ।। १३ ।। वे देवबलके द्वारा उन सबकी अपेक्षा अधिक बलशाली हो गये। इसलिये उसी समयसे उन भगवान् शंकरका महादेव नाम विख्यात हो गया ।। १३ ।। ततोऽब्रवीन्महादेवो धनुर्बाणधरो ह्यहम् । हनिष्यामि रथेनाजौ तान् रिपून् वो दिवौकसः ।। १४ ।। तत्पश्चात् महादेवजीने कहा—'देवताओ! मैं धनुष-बाण धारण करके रथपर बैठकर युद्धस्थलमें तुम्हारे उन शत्रुओंका वध करूँगा ।। १४ ।। ते यूयं मे रथं चैव धनुर्बाणं तथैव च । पश्यध्वं यावदद्यैतान् पातयामि महीतले ।। १५ ।। 'अतः तुमलोग मेरे लिये रथ और धनुष-बाणकी खोज करो, जिसके द्वारा आज इन दैत्योंको भूतलपर मार गिराऊँ?' ।। १५ ।।
देवा ऊचुः
मूर्तीः सर्वाः समाधाय त्रैलोक्यस्य ततस्ततः । रथं ते कल्पयिष्यामो देवेश्वर सुवर्चसम् ।। १६ ।। तथैव बुद्ध्या विहितं विश्वकर्मकृतं शुभम् । **देवता बोले—**देवेश्वर! हमलोग तीनों लोकोंके तेजकी सारी मात्राओंको एकत्र करके आपके लिये परम तेजस्वी रथका निर्माण करेंगे। विश्वकर्माका बुद्धिपूर्वक बनाया हुआ वह रथ बहुत ही सुन्दर होगा ।। १६ १/२ ।। ततो विबुधशार्दूलास्ते रथं समकल्पयन् ।। १७ ।। विष्णुं सोमं हुताशं च तस्येषुं समकल्पयन् । तदनन्तर उन देवसंघोंने रथका निर्माण किया और विष्णु, चन्द्रमा तथा अग्नि—इन तीनोंको उनका बाण बनाया ।। १७ १/२ ।। शृङ्गमग्निर्बभूवास्य भल्लः सोमो विशाम्पते ।। १८ ।। कुड्मलश्चाभवद् विष्णुस्तस्मिन्निषुवरे तदा । प्रजानाथ! उस बाणका शृंग (गाँठ) अग्नि हुए। उसका भल्ल (फल) चन्द्रमा हुए और उस श्रेष्ठ बाणके अग्रभागमें भगवान् विष्णु प्रतिष्ठित हुए ।। १८ १/२ ।। रथं वसुन्धरां देवीं विशालपुरमालिनीम् ।। १९ ।। सपर्वतवनद्वीपां चक्रुर्भूतधरां तदा ।