भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1817, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1817

हन्तव्याः शत्रवः सर्वे युष्माकमिति मे मतिः । न त्वेक उत्सहे हन्तुं बलस्था हि सुरद्विषः ॥ ६ ॥ भगवान् शिवने कहा—देवताओ! मेरा ऐसा विचार है कि तुम्हारे सभी शत्रुओंका वध किया जाय, परंतु मैं अकेला ही उन सबको नहीं मार सकता; क्योंकि वे देवद्रोही दैत्य बड़े बलवान् हैं ॥ ६ ॥

ते यूयं संहताः सर्वे मदीयेनार्धतेजसा । जयध्वं युधि ताञ्शत्रून् संहता हि महाबलाः ॥ ७ ॥ अतः तुम सब लोग एक साथ संघ बनाकर मेरे आधे तेजसे पुष्ट हो युद्धमें उन शत्रुओंको जीत लो; क्योंकि जो संघटित होते हैं वे महान् बलशाली हो जाते हैं ॥ ७ ॥

देवा ऊचुः अस्मत्तेजोबलं यावत् तावद्द्विगुणमाहवे । तेषामिति हि मन्यामो दृष्टतेजोबला हि ते ॥ ८ ॥ देवता बोले—प्रभो! युद्धमें हमलोगोंका जितना भी तेज और बल है, उससे दूना उन दैत्योंका है, ऐसा हम मानते हैं; क्योंकि उनके तेज और बलको हमने देख लिया है ॥ ८ ॥

स्थाणुरुवाच वध्यास्ते सर्वतः पापा ये युष्मास्वपराधिनः । मम तेजोबलार्धेन सर्वान् निघ्नत शात्रवान् ॥ ९ ॥ भगवान् शिव बोले—देवताओ! जो पापी तुम-लोगोंके अपराधी हैं, वे सब प्रकारसे वधके ही योग्य हैं। मेरे तेज और बलके आधे भागसे युक्त हो तुमलोग समस्त शत्रुओंको मार डालो ॥ ९ ॥

देवा ऊचुः बिभर्तुं भवतोऽर्धं तु न शक्ष्यामो महेश्वर । सर्वेषां नो बलार्धेन त्वमेव जहि शात्रवान् ॥ १० ॥ देवताओँने कहा—महेश्वर! हम आपका आधा बल धारण नहीं कर सकते; अतः आप ही हम सब लोगोंके आधे बलसे युक्त हो शत्रुओंका वध कीजिये ॥ १० ॥

स्थाणुरुवाच यदि शक्तिर्न वः काचिद् बिभर्तुं मामकं बलम् । अहमेतान् हनिष्यामि युष्मत्तेजोऽर्धबृंहितः ॥ ११ ॥ भगवान् शिव बोले—देवगण! यदि मेरे बलको धारण करनेमें तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है तो मैं ही तुमलोगोंके आधे तेजसे परिपुष्ट हो इन दैत्योंका वध करूँगा ॥ ११ ॥

ततस्तथेति देवेशस्तैरुक्तो राजसत्तम ।

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 1817, कुल 3237 में से · BharatKosha