महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1819, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंबड़े-बड़े नगरोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे युक्त, प्राणियोंकी आधारभूता पृथ्वीदेवीको उस समय देवताओंने रथ बनाया ।। १९१/२ ।। मन्दरः पर्वतश्चाक्षो जङ्घा तस्य महानदी ।। २० ।। दिशश्च प्रदिशश्चैव परिवारो रथस्य तु । मन्दराचल उस रथका धुरा था, महानदी गङ्गा जंघा (धुरेका आश्रय) बनी थीं, दिशाएँ और विदिशाएँ उस रथका आवरण थीं ।। २०१/२ ।। ईषा नक्षत्रवंशश्च युगः कृतयुगोऽभवत् ।। २१ ।। कूबरश्च रथस्यासीद् वासुकिर्भुजगोत्तमः । अपस्करमधिष्ठाने हिमवान् विन्ध्यपर्वतः । उदयास्तावधिष्ठाने गिरी चक्रुः सुरोत्तमाः ।। २२ ।। नक्षत्रोंका समूह ईषादण्ड हुआ और कृतयुगने जूएका रूप धारण किया। नागराज वासुकि उस रथका कूबर बन गये थे। हिमालय पर्वत अपस्कर (रथके पीछेका काठ) और विन्ध्याचलने उसके आधारकाष्ठका रूप धारण किया। उदयाचल और अस्ताचल दोनोंको उन श्रेष्ठ देवताओंने पहियोंका आधारभूत काष्ठ बनाया ।। २१-२२ ।। समुद्रमक्षमसृजन् दानवालयमुत्तमम् । सप्तर्षिमण्डलं चैव रथस्यासीत् परिष्करः ।। २३ ।। दानवोंके उत्तम निवासस्थान समुद्रको बन्धनरज्जु बनाया। सप्तर्षियोंका समुदाय रथका परिस्कर (चक्ररक्षा आदिका साधन) बन गया ।। २३ ।। गङ्गा सरस्वती सिन्धुर्धुमाकाशमेव च । उपस्करो रथस्यासन्नापः सर्वाश्च निम्नगाः ।। २४ ।। गंगा, सरस्वती और सिंधु—इन तीनों नदियोंके साथ आकाश त्रिवेणुकाष्ठयुक्त धुरेका भाग हुआ। उस रथके बन्धन आदिकी सामग्री जल तथा सम्पूर्ण नदियाँ थीं ।। २४ ।। अहोरात्रं कलाश्चैव काष्ठाश्च ऋतवस्तथा । अनुकर्षं ग्रहा दीप्ता वरूथं चापि तारकाः ।। २५ ।। दिन, रात, कला, काष्ठा और छहों ऋतुएँ उस रथका अनुकर्ष (नीचेका काष्ठ) बन गयीं। चमकते हुए ग्रह और तारे वरूथ (रथकी रक्षाके लिये आवरण) हुए ।। २५ ।। धर्मार्थकामं संयुक्तं त्रिवेणुं दारु बन्धुरम् । ओषधीर्वीरुधश्चैव घण्टाः पुष्पफलोपगाः ।। २६ ।। त्रिवेणु-तुल्य धर्म, अर्थ और काम—तीनोंको संयुक्त करके रथकी बैठक बनाया। फल और फूलोंसे युक्त ओषधियों एवं लताओंको घण्टाका रूप दिया ।। २६ ।। सूर्याचन्द्रमसौ कृत्वा चक्रे रथवरोत्तमे । पक्षौ पूर्वापरौ तत्र कृते सत्यहनी शुभे ।। २७ ।।