भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1828

रथपर आरूढ़ हुए देवेश्वर शिवकी महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने स्तुति की॥ ८१ ½ ॥ स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी ॥ ८२ ॥ प्रदीपयन् रथे तस्थौ त्रीँल्लोकान् स्वेन तेजसा। खड्ग, धनुष और बाण लेकर शोभा पाते हुए वरदायक महादेवजी अपने तेजसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करते हुए रथपर स्थित हो गये॥ ८२ ½ ॥ ततो भूयोऽब्रवीद् देवो देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ८३ ॥ न हन्यादिति कर्तव्यो न शोको वः कथञ्चन। हतानित्येव जानीत बाणेनानेन चासुरान् ॥ ८४ ॥ तब महादेवजीने पुनः इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—'शायद ये दैत्योंको न मारें' ऐसा समझकर तुम्हें किसी प्रकार भी शोक नहीं करना चाहिये। तुमलोग असुरोंको इस बाणसे 'मरा हुआ' ही समझो'॥ ८३-८४॥ ते देवाः सत्यमित्याहुर्निहता इति चाब्रुवन्। न च तद् वचनं मिथ्या यदाह भगवान् प्रभुः ॥ ८५ ॥ इति संचिन्त्य वै देवाः परां तुष्टिमवाप्नुवन्। यह सुनकर उन देवताओंने कहा—'प्रभो! आपका कथन सत्य है। अवश्य ही वे दैत्य मारे गये। शक्तिशाली भगवान् जो कुछ कह रहे हैं, वह वचन मिथ्या नहीं हो सकता' यह सोचकर देवताओंको बड़ा संतोष हुआ॥ ८५ ½ ॥ ततः प्रयातो देवेशः सर्वैर्देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥ रथेन महता राजन्नुपमा नास्ति यस्य ह। राजन्! तदनन्तर जिसकी कहीं उपमा नहीं थी, उस विशाल रथके द्वारा देवेश्वर महादेवजी समस्त देवताओंसे घिरे हुए वहाँसे चल दिये॥ ८६ ½ ॥ स्वैश्च पारिषदैर्देवः पूज्यमानो महायशाः ॥ ८७ ॥ नृत्यद्भिरपरैश्चैव मांसभक्षैर्दुरासदैः। धावमानैः समन्ताच्च तर्जमानैः परस्परम् ॥ ८८ ॥ उस समय उनके अपने पार्षद भी महायशस्वी महादेवजीकी पूजा कर रहे थे। शिवके वे दुर्धर्ष पार्षद नृत्य करते और परस्पर एक-दूसरेको डाँटते हुए चारों ओर दौड़ लगाते थे। अन्य कितने ही पार्षद (भूत-प्रेतादि) मांसभक्षी थे॥ ८७-८८॥ ऋषयश्च महाभागास्तपोयुक्ता महागुणाः। आशंसुर्वे जना देवा महादेवस्य सर्वशः ॥ ८९ ॥ महान् भाग्यशाली और उत्तम गुणसम्पन्न तपस्वी ऋषियों, देवताओं तथा अन्य लोगोंने भी सब प्रकारसे महादेवजीकी विजयके लिये शुभाशंसा की॥ ८९॥ एवं प्रयाते देवेशे लोकानामभयंकरे।