भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1827

नात्र किंचिन्मृषा वाक्यं यदुक्तं त्रिदिवौकसः ।। ७५ ।।
संयच्छामि हयानेष युध्यतो वै कपर्दिनः ।
**पितामह बोले—**देवताओ! तुमने जो कुछ कहा है, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। मैं युद्ध करते समय भगवान् शंकरके घोड़ोंको काबूमें रखूँगा ।। ७५½ ।।

ततः स भगवान् देवो लोकस्रष्टा पितामहः ।। ७६ ।।
(एवमुक्त्वा जटाभारं संयम्य प्रपितामहः ।
परिधायाजिनं गाढं संन्यस्य च कमण्डलुम् ।।
प्रतोदपाणिर्भगवानारुरोह रथ तदा ।)
तदनन्तर लोकस्रष्टा भगवान् पितामह देवने जो जगत्के प्रपितामह हैं, उपर्युक्त बात कहकर अपनी जटाओंके बोझको बाँध लिया और मृगचर्मके वस्त्रको अच्छी तरह कसकर कमण्डलुको अलग रख दिया। तत्पश्चात् वे भगवान् ब्रह्मा हाथमें चाबुक लेकर तत्काल उस रथपर जा चढ़े ।। ७६ ।।

सारथ्ये कल्पितो देवैरीशानस्य महात्मनः ।
तस्मिन्नारोहति क्षिप्रं स्यन्दने लोकपूजिते ।। ७७ ।।
शिरोभिरगमन् भूमिं ते हया वातरंहसः ।
इस प्रकार देवताओंने भगवान् शंकरके सारथिके पदपर उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया। जब उस लोकपूजित रथपर ब्रह्माजी चढ़ रहे थे, उस समय वायुके समान वेगशाली घोड़े धरतीपर माथा टेककर बैठ गये थे ।। ७७½ ।।

आरुह्य भगवान् देवो दीप्यमानः स्वतेजसा ।। ७८ ।।
अभीषून् हि प्रतोदं च संजग्राह पितामहः ।
अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् ब्रह्माने रथारूढ़ होकर घोड़ोंकी बागडोर और चाबुक दोनों वस्तुएँ अपने हाथमें ले लीं ।। ७८½ ।।

तत उत्थाप्य भगवांस्तान् हयाननिलोपमान् ।। ७९ ।।
बभाषे च तदा स्थाणुमारोहेति सुरोत्तमः ।
तत्पश्चात् वायुके समान तीव्रगतिवाले उन घोड़ोंको उठाकर सुरश्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने महादेवजीसे कहा—'अब आप रथपर आरूढ़ होइये' ।। ७९½ ।।

ततस्तमिषुमादाय विष्णुसोमाग्निसम्भवम् ।। ८० ।।
आरुरोह तदा स्थाणुर्धनुषा कम्पयन् परान् ।
तब विष्णु, चन्द्रमा और अग्निसे उत्पन्न हुए उस बाणको हाथमें लेकर महादेवजी अपने धनुषके द्वारा शत्रुओंको कम्पित करते हुए उस रथपर चढ़ गये ।। ८०½ ।।

तमारूढं तु देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः ।। ८१ ।।
गन्धर्वा देवसंघाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ।