महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1826, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें(त्वं देव शक्तो लोकेऽस्मिन् नियन्तुं प्रद्रुतानिमान् । वेदाश्वांस् चोपनिषदः सारथिर्भव नः स्वयम् ॥ ‘देव! आप ही इस जगत्में इन भागते हुए उपनिषत्सहित वेदरूपी अश्वोंको नियन्त्रणमें रख सकते हैं; अतः आप स्वयं ही सारथि हो जाइये। योद्धुं बलेन सत्त्वेन वीर्येण विनयेन च । अधिकः सारथिः कार्यो नास्ति चान्दोऽधिको भवात् ॥ ‘बल, धैर्य, पराक्रम और विनय इन सभी गुणोंद्वारा जो रथीसे भी श्रेष्ठ हो, उसे ही युद्धके लिये सारथि बनाना चाहिये; दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो भगवान् शंकरसे भी बढ़कर हो। स भवांस्तारयत्वस्मान् कुरु सारथ्यमव्ययम् । भवानभ्यधिकस्त्वत्तो नान्योऽस्तीह पितामह ॥ ‘पितामह! आप अक्षय सारथिकर्म कीजिये और हमें इस संकटसे उबारिये। आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं; आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। त्वं हि देवेश सर्वैस्तु विशिष्टो वदतां वर ।) स रथं तूर्णमारुह्य संयच्छ परमान् हयान् ॥ ७३ ॥ जयाय त्रिदिवेशानां वधाय त्रिदशद्विषाम् । ‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! आप सभी गुणोंसे श्रेष्ठ हैं; इसलिये देवद्रोहियोंके वध और देवताओंकी विजयके लिये तुरंत रथपर आरूढ़ होकर इन उत्तम घोड़ोंको काबूमें रखिये ।। ७३ ।। (तव प्रसादाद् वध्येरन् देव दैवतकण्टकाः । स नो रक्ष महाबाहो दैत्येभ्यो महतो भयात् ।। ‘देव! आपके प्रसादसे देवताओंके लिये यह कण्टकरूप दैत्य मारे जायँगे। महाबाहो! आप दैत्योंके महान् भयसे हमारी रक्षा करें। त्वं हि नो गतिरव्यग्र त्वं नो गोप्ता महाव्रत । त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे पूज्यन्ते त्रिदिवे प्रभो ॥) ‘व्यग्रताशून्य महान् व्रतधारी प्रभो! आप ही हमारे आश्रय तथा संरक्षक हैं; आपकी कृपासे ही समस्त देवता स्वर्गलोकमें पूजित होते हैं’। इति ते शिरसा गत्वा त्रिलोकेशं पितामहम् ।। ७४ ।। देवाः प्रसादयामासुः सारथ्यायेति नः श्रुतम् । इस प्रकार देवताओंने तीनों लोकोंके ईश्वर पितामह ब्रह्माजीके आगे मस्तक टेककर उन्हें सारथि बननेके लिये प्रसन्न किया। यह बात हमारे सुननेमें आयी है ।। ७४ १/२ ।।
पितामह उवाच