महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1830, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृषभस्यास्य निनदं श्रुत्वा भयकरं महत् ।
विनाशमगमंस्तत्र तारकाः सुरशत्रवः ॥ ९८ ॥
उस वृषभका वह अत्यन्त भयंकर सिंहनाद सुनकर बहुत-से देवशत्रु तारक नामवाले दैत्यगण वहीं विनष्ट हो गये ॥ ९८ ॥
अपरेऽवस्थितास्तत्र युद्धायाभिमुखास्तदा ।
ततः स्थाणुर्महाराज शूलधृक् क्रोधमूर्च्छितः ॥ ९९ ॥
दूसरे जो दैत्य वहाँ खड़े थे, वे युद्धके लिये महादेवजीके सामने आये। महाराज! तब त्रिशूलधारी महादेवजी क्रोधसे आतुर हो उठे ॥ ९९ ॥
त्रस्तानि सर्वभूतानि त्रैलोक्यं भूः प्रकम्पते ।
निमित्तानि च घोराणि तत्र संदधतः शरम् ॥ १०० ॥
तस्मिन् सोमाग्निविष्णूनां क्षोभेण ब्रह्मरुद्रयोः ।
स रथो धनुषः क्षोभादतीव ह्यवसीदति ॥ १०१ ॥
फिर तो समस्त प्राणी भयभीत हो उठे। सारी त्रिलोकी और भूमि काँपने लगी। जब वे वहाँ धनुषपर बाणका संधान करने लगे, तब उसमें चन्द्रमा, अग्नि, विष्णु, ब्रह्मा और रुद्रके क्षोभसे बड़े भयंकर निमित्त प्रकट हुए। धनुषके क्षोभसे वह रथ अत्यन्त शिथिल होने लगा ॥ १००-१०१ ॥
ततो नारायणस्तस्माच्छरभागाद् विनिःसृतः ।
वृषरूपं समास्थाय उज्जहार महारथम् ॥ १०२ ॥
तब भगवान् नारायणने उस बाणके एक भागसे बाहर निकलकर वृषभका रूप धारण करके भगवान् शिवके विशाल रथको ऊपर उठाया ॥ १०२ ॥
सीदमाने रथे चैव नर्दमानेषु शत्रुपु ।
स सम्भ्रमात् तु भगवान् नादं चक्रे महाबलः ॥ १०३ ॥
जब रथ शिथिल होने लगा और शत्रु गर्जना करने लगे, तब महाबली भगवान् शिवने बड़े वेगसे घोर गर्जना की ॥ १०३ ॥
वृषभस्य स्थितो मूर्ध्नि हयपृष्ठे च मानद ।
तदा स भगवान् रुद्रो निरैक्षद् दानवं पुरम् ॥ १०४ ॥
वृषभस्यास्थितो रुद्रो हयस्य च नरोत्तम ।
स्तनांस्तदाऽशातयत खुरांश्चैव द्विधाकरोत् ॥ १०५ ॥
मानद! उस समय वे वृषभके मस्तक और घोड़ेकी पीठपर खड़े थे। नरोत्तम! भगवान् रुद्रने वृषभ तथा घोड़ेकी भी पीठपर सवार हो उस दानव-नगरको देखा। तब उन्होंने वृषभके खुरोंको चीरकर उन्हें दो भागोंमें बाँट दिया और घोड़ोंके स्तन काट डाले ॥ १०४-१०५ ॥
ततःप्रभृति भद्रं ते गवां द्वैधीकृताः खुराः ।