महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1822, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड तथा ज्वर—ये उस रथके पार्श्वरक्षक बनकर चारों ओर शस्त्र लेकर खड़े हो गये ॥ ४३ ॥ अथर्वाङ्गिरसावास्तां चक्ररक्षौ महात्मनः । ऋग्वेदः सामवेदश्च पुराणं च पुरःसराः ॥ ४४ ॥ अथर्वा और अंगिरा महात्मा शिवके उस रथके पहियोंकी रक्षा करने लगे। ऋग्वेद, सामवेद और समस्त पुराण उस रथके आगे चलनेवाले योद्धा हुए ॥ ४४ ॥ इतिहासयजुर्वेदौ पृष्ठरक्षौ बभूवतुः । दिव्या वाचश्च विद्याश्च परिपार्श्वचराः स्थिताः ॥ ४५ ॥ इतिहास और यजुर्वेद पृष्ठरक्षक हो गये तथा दिव्य वाणी और विद्याएँ पार्श्ववर्ती बनकर खड़ी हो गयीं ॥ ४५ ॥ स्तोत्रादयश्च राजेन्द्र वषट्कारस्तथैव च । ओंकारश्च मुखे राजन्नतिशोभाकरोऽभवत् ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! स्तोत्र-कवच आदि, वषट्कार तथा ओंकार—ये मुखभागमें स्थित होकर अत्यन्त शोभा बढ़ाने लगे ॥ ४६ ॥ विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः । छायामेवात्मनश्चक्रे धनुर्ज्यामक्षयां रणे ॥ ४७ ॥ छहों ऋतुओंसे युक्त संवत्सरको विचित्र धनुष बनाकर अपनी छायाको ही महादेवजीने उस धनुषकी प्रत्यंचा बनायी, जो रणभूमिमें कभी नष्ट होनेवाली नहीं थी ॥ ४७ ॥ कालो हि भगवान् रुद्रस्तस्य संवत्सरो धनुः । तस्माद् रौद्री कालरात्रिर्ज्या कृता धनुषोऽजरा ॥ ४८ ॥ भगवान् रुद्र ही काल हैं, अतः कालका अवयवभूत संवत्सर ही उनका धनुष हुआ। कालरात्रि भी रुद्रका ही अंश है, अतः उसीको उन्होंने अपने धनुषकी अटूट प्रत्यंचा बना लिया ॥ ४८ ॥ इषुश्चाप्यभवद् विष्णुर्ज्वलनः सोम एव च । अग्नीषोमौ जगत् कृत्स्नं वैष्णवं चोच्यते जगत् ॥ ४९ ॥ भगवान् विष्णु, अग्नि और चन्द्रमा—ये ही बाण हुए थे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोमका ही स्वरूप है। साथ ही सारा संसार वैष्णव (विष्णुमय) भी कहा जाता है ॥ ४९ ॥ विष्णुश्चात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः । तस्माद् धनुर्ज्यासंस्पर्शं न विषेहुर्हरस्य ते ॥ ५० ॥ अमिततेजस्वी भगवान् शंकरके आत्मा हैं विष्णु। अतः वे दैत्य भगवान् शिवके धनुषकी प्रत्यंचा एवं बाणका स्पर्श न सह सके ॥ ५० ॥ तस्मिन् शरे तिग्ममन्युं मुमोचासह्यमीश्वरः ।