भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1821, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1821

वषट्कारः प्रतोदोऽभूद् गायत्री शीर्षबन्धना ।। ३५ ।। वषट्कार घोड़ोंका चाबुक हुआ और गायत्री उस रथके ऊपरी भागकी बन्धन-रज्जु बनीं ।। ३५ ।। यो यज्ञे विहितः पूर्वमीशानस्य महात्मनः । संवत्सरो धनुस्तद् वै सावित्री ज्या महास्वना ।। ३६ ।। पूर्वकालमें जो महात्मा महादेवजीके यज्ञमें निर्मित हुआ था, वह संवत्सर ही उनके लिये धनुष बना और सावित्री उस धनुषकी महान् टंकार करनेवाली प्रत्यंचा बनी ।। ३६ ।। दिव्यं च वर्म विहितं महार्हं रत्नभूषितम् । अभेद्यं विरजस्कं वै कालचक्रबहिष्कृतम् ।। ३७ ।। महादेवजीके लिये एक दिव्य कवच तैयार किया गया जो बहुमूल्य, रत्नभूषित, रजोगुणरहित (अथवा धूलरहित स्वच्छ), अभेद्य तथा कालचक्रकी पहुँचसे परे था ।। ३७ ।। ध्वजयष्टिरभून्मेरुः श्रीमान् कनकपर्वतः । पताकाश्चाभवन् मेघास्तडिद्भिः समलङ्कृताः ।। ३८ ।। रेजुरध्वर्युमध्यस्था ज्वलन्त इव पावकाः । कान्तिमान् कनकमय मेरु पर्वत रथके ध्वजका दण्ड बना था। बिजलियोंसे विभूषित बादल ही पताकाओंका काम दे रहे थे, जो यजुर्वेदी ऋत्विजोंके बीचमें स्थित हुई अग्नियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ३८ १/२ ।। क्लृप्तं तु तं रथं दृष्ट्वा विस्मिता देवताऽभवन् ।। ३९ ।। सर्वलोकस्य तेजांसि दृष्ट्वैकस्थानि मारिष । युक्तं निवेदयामासुर्देवास्तस्मै महात्मने ।। ४० ।। मान्यवर! वह रथ क्या था, सम्पूर्ण जगत्के तेजका पुंज एकत्र हो गया था। उसे निर्मित हुआ देख सम्पूर्ण देवता आश्चर्यचकित हो उठे। फिर उन्होंने महात्मा महादेवजीसे यह निवेदन किया कि रथ तैयार है ।। ३९-४० ।। एवं तस्मिन् महाराज कल्पिते रथसत्तमे । देवैर्मनुजशार्दूल द्विषतामभिमर्दने ।। ४१ ।। स्वान्यायुधानि मुख्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे । ध्वजयष्टिं वियत् कृत्वा स्थापयामास गोवृषम् ।। ४२ ।। पुरुषसिंह! महाराज! इस प्रकार देवताओंद्वारा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले उस श्रेष्ठ रथका निर्माण हो जानेपर भगवान् शंकरने उसके ऊपर अपने मुख्य-मुख्य अस्त्र-शस्त्र रख दिये और ध्वजदण्डको आकाशव्यापी बनाकर उसके ऊपर अपने वृषभ नन्दीको स्थापित कर दिया ।। ४१-४२ ।। ब्रह्मदण्डः कालदण्डो रुद्रदण्डस्तथा ज्वरः । परिस्कन्दा रथस्यासन् सर्वतोदिशमुद्यताः ।। ४३ ।।