महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1823, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभृग्वङ्गिरोमन्युभवं क्रोधाग्निमतिदुःसहम् ॥ ५१ ॥ महेश्वरने उस बाणमें अपने असह्य एवं प्रचण्ड कोपको तथा भृगु और अंगिराके रोषसे उत्पन्न हुई अत्यन्त दुःसह क्रोधाग्निको भी स्थापित कर दिया ॥ ५१ ॥
स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासाभयंकरः । आदित्यायुतसंकाशस्तेजोज्वालावृतो ज्वलन् ॥ ५२ ॥ तत्पश्चात् धूम्रवर्ण, व्याघ्रचर्मधारी, देवताओंको अभय तथा दैत्योंको भय देनेवाले, सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी नीललोहित भगवान् शिव तेजोमयी ज्वालासे आवृत हो प्रकाशित होने लगे ॥ ५२ ॥
दुश्च्यावच्यावनो जेता हन्ता ब्रह्मद्विषां हरः । नित्यं त्राता च हन्ता च धर्माधर्माश्रितान् नरान् ॥ ५३ ॥ जिस लक्ष्यको मार गिराना अत्यन्त कठिन है, उसको भी गिरानेमें समर्थ, विजयशील, ब्रह्मद्रोहियोंके विनाशक भगवान् शिव धर्मका आश्रय लेनेवाले मनुष्योंकी सदा रक्षा और पापियोंका विनाश करनेवाले हैं ॥ ५३ ॥
प्रमाथिभिर्भीमबलैर्भीमरूपैर्मनोजवैः । विभाति भगवान् स्थाणुस्तैरेवात्मगुणैर्वृतः ॥ ५४ ॥ उनके जो अपने उपयोगमें आनेवाले रथ आदि गुणवान् उपकरण थे, वे शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, भयानक बलशाली, भयंकररूपधारी और मनके समान वेगवान् थे। उनसे घिरे हुए भगवान् शिवकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥
तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत् । जङ्गमाजङ्गमं राजन् शुशुभेऽद्भुतदर्शनम् ॥ ५५ ॥ राजन्! उनके पंचभूतस्वरूप अंगोंका आश्रय लेकर ही यह अद्भुत दिखायी देनेवाला सारा चराचर जगत् स्थित एवं सुशोभित है ॥ ५५ ॥
दृष्ट्वा तु तं रथं युक्तं कवची स शरासनी । बाणमादाय तं दिव्यं सोमविष्ण्वग्निसम्भवम् ॥ ५६ ॥ उस रथको जुता हुआ देख भगवान् शंकर कवच और धनुषसे युक्त हो चन्द्रमा, विष्णु और अग्निसे प्रकट हुए उस दिव्य बाणको लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए ॥ ५६ ॥
तस्य राजंस्तदा देवाः कल्पयाञ्चक्रिरे प्रभो । पुण्यगन्धवहं राजन् श्वसनं देवसत्तमम् ॥ ५७ ॥ राजन्! प्रभो! उस समय देवताओंने पवित्र सुगन्ध वहन करनेवाले देवश्रेष्ठ वायुको उनके लिये हवा करनेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५७ ॥
तमास्थाय महादेवस्त्रासयन् दैवतान्यपि । आरुरोह तदा यत्तः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ५८ ॥