महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1824, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब महादेवजी दानवोंके वधके लिये प्रयत्नशील हो देवताओंको भी डराते और पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से उस रथको थामकर उसपर चढ़ने लगे ॥ ५८ ॥ तमारुरुक्षुं देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः । गन्धर्वा दैवसङ्घाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५९ ॥ देवेश्वर शिव रथपर चढ़ना चाहते हैं, यह देखकर महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने उनकी स्तुति की ॥ ५९ ॥ ब्रह्मर्षिभिः स्तूयमानो वन्द्यमानश्च वन्दिभिः । तथैवाप्सरसां वृन्दैर्नृत्यद्भिर्नृत्यकोविदैः ॥ ६० ॥ स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी । हसन्निवाब्रवीद् देवान् सारथिः को भविष्यति ॥ ६१ ॥ ब्रह्मर्षियोंद्वारा प्रशंसित, वन्दीजनोंद्वारा वन्दित तथा नाचती हुई नृत्य-कुशल अप्सराओंसे सुशोभित होते हुए वरदायक भगवान् शिव खड्ग, बाण और धनुष ले देवताओंसे हँसते हुए-से बोले—‘मेरा सारथि कौन होगा?’ ॥ ६०-६१ ॥ तमब्रुवन् देवगणा यं भवान् संनियोक्ष्यते । स भविष्यति देवेश सारथिस्ते न संशयः ॥ ६२ ॥ यह सुनकर देवताओंने उनसे कहा—‘देवेश! आप जिसको इस कार्यमें नियुक्त करेंगे, वही आपका सारथि होगा, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ६२ ॥ तानब्रवीत् पुनर्देवो मत्तः श्रेष्ठतरो हि यः । तं सारथिं कुरुध्वं मे स्वयं संचिन्त्य मा चिरम् ॥ ६३ ॥ तब महादेवजीने फिर कहा—‘तुमलोग स्वयं ही सोच-विचारकर जो मुझसे भी श्रेष्ठतर हो, उसे मेरा सारथि बना दो, विलम्ब न करो’ ॥ ६३ ॥ एतच्छ्रुत्वा ततो देवा वाक्यमुक्तं महात्मना । गत्वा पितामहं देवाः प्रसाद्येदं वचोऽब्रुवन् ॥ ६४ ॥ उन महात्माके कहे हुए इस वचनको सुनकर सब देवता ब्रह्माजीके पास गये और उन्हें प्रसन्न करके इस प्रकार बोले— ॥ ६४ ॥ यथा त्वत्कथितं देव त्रिदशारिविनिग्रहे । तथा च कृतमस्माभिः प्रसन्नो नो वृषध्वजः ॥ ६५ ॥ ‘देव! देवशत्रुओंका दमन करनेके विषयमें आपने जैसा कहा था, वैसा ही हमने किया है। भगवान् शंकर हमलोगोंपर प्रसन्न हैं’ ॥ ६५ ॥ रथश्च विहितोऽस्माभिर्विचित्रायुधसंवृतः । सारथिं च न जानीमः कः स्यात् तस्मिन् रथोत्तमे ॥ ६६ ॥ ‘हमने उनके लिये विचित्र आयुधोंसे सम्पन्न रथ तैयार कर दिया है; परंतु उस उत्तम रथपर कौन सारथि होकर बैठेगा? यह हम नहीं जानते हैं’ ॥ ६६ ॥