महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1815, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआप श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा युद्ध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५७ ॥ अर्हाय चैव शुद्धाय क्षयाय क्रथनाय च । दुर्वारणाय शुक्राय ब्रह्मणे ब्रह्मचारिणे ॥ ५८ ॥ ईशानायाप्रमेयाय नियन्त्रे चर्मवाससे । तपोरताय पिङ्गाय व्रतिने कृत्तिवाससे ॥ ५९ ॥ ‘आप पूजनीय, शुद्ध, प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले हैं। आपको रोकना या पराजित करना सर्वथा कठिन है। आप शुक्लवर्ण, ब्रह्म, ब्रह्मचारी, ईशान, अप्रमेय, नियन्ता तथा व्याघ्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले, पिंगलवर्ण, व्रतधारी और कृत्तिवासा हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५८-५९ ॥ कुमारपित्रे त्र्यक्षाय प्रवरायुधधारिणे । प्रपन्नार्तिविनाशाय ब्रह्मद्विट्संघघातिने ॥ ६० ॥ ‘आप कुमार कार्तिकेयके पिता, त्रिनेत्रधारी, उत्तम आयुध धारण करनेवाले शरणागतदुःखभंजन तथा ब्रह्मद्रोहियोंके समुदायका विनाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ६० ॥ वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः । गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः ॥ ६१ ॥ ‘आप वनस्पतियोंके पालक और मनुष्योंके अधिपति हैं। आप ही गौओंके स्वामी और सदा यज्ञोंके अधीश्वर हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ६१ ॥ नमोऽस्तु ते ससैन्याय त्र्यम्बकायामितौजसे । मनोवाक्कर्मभिर्देव त्वां प्रपन्नान् भजस्व नः ॥ ६२ ॥ ‘सेनासहित आप अमिततेजस्वी भगवान् त्र्यम्बकको नमस्कार है। देव! हम मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपकी शरणमें आये हैं। आप हमें अपनाइये’ ॥ ६२ ॥ ततः प्रसन्नो भगवान् स्वागतेनाभिनन्द्य च । प्रोवाच व्येतु वस्त्र्रासो ब्रूत किं करवाणि वः ॥ ६३ ॥ तब भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर स्वागत-सत्कारके द्वारा देवताओंको आनन्दित करके कहा—‘देवगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये; बोलो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ?’ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुराख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुराख्यानविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६७ १/३ श्लोक हैं)